साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकाशीतितमोऽध्यायः
एतेषां परवान् योगः संवत्सरतनुं स्थितः।
अष्टानामनुपूर्वेण भिन्नाभिन्नार्थवेदने ॥१॥
प्रतिलोमप्रधिः प्रोक्तो दीपयेत् स्पर्शयेत् क्रमात्।
चतुर्विंशत्तथा वह्नित्रिकयोगेन साधकः ॥२॥
व्यञ्जनं च विसर्गस्थमादावन्त उपाश्रितम्।
अन्ततो बिन्दुसंयुक्तमाकारेण तदेव तु ॥३॥
द्वाविंशत्यन्तरायुक्ता क्रूरेणैकादशेन च।
ओंकारं च वषट्कारं यदा नैतददीप्यते ॥४॥
ये सभी श्रेष्ठ योग संवत्सररूप तनु का आश्रय करके आनुपूर्विक आठ भिन्न तथा अभिन्न अर्थ जानने के लिये हैं। प्रतिलोम प्रधि का वर्णन किया गया है। उसे क्रम से दीप्त करे तथा स्पर्श कराये। ऐसा साधक तीन वह्नियों के योग से २४ बार स्पर्श करे। विसर्गस्थ व्यञ्जन आदि में तथा अन्त में उपाश्रित है। शेष बिन्दुसंयुक्त है। आकार के द्वारा भी वही है। २२ में एकादश क्रूरयुक्त हैं। जब वे दीप्त नहीं हुये तब ओंकार तथा वषट्कार प्रकाशित हुये।।१-४।।
अन्तःस्थाश्च शलाकान्ते संयोज्यादुष्मणापि च।
उत्तमस्पर्शयुक्तानि सुषुम्नान्तर्गतो मतः ॥५॥
क्षुरिका कर्तरी चैका लोका चैकस्तथान्तगाः।
प्रसवे योजयेदेतत्प्रतिमन्त्रत्रिकं तु वै ॥६॥
शलाकान्त में अन्तःस्थ वर्णों को ऊष्म वर्ण के साथ युक्त करे। उत्तम स्पर्शयुक्त वर्णों को सुषुम्ना के अन्तर्गत जाने। क्षुरिका, कर्तरी का लौकिक तथा अन्तग सृष्टि के समय योग करे, किन्तु यह प्रतिमन्त्र ३ करके होगा।।५-६।।
तिस्रस्तिस्रस्तथा चैवमेकैकस्य पृथक्-पृथक्।
ऊर्ध्वं तस्य च वक्त्रादेर्योगः स्यात् प्रतिनिर्मितः ॥७॥
मन्त्राणां साधनैः सूक्ष्माद् द्रव्याणां रक्षतः परः।
प्राणानां चालने चैव नित्यं योज्याद्यनुक्रमात् ॥८॥
तीन-तीन में इस प्रकार से एक-एक करके पृथक्-पृथक् हैं। उसके ऊर्ध्व में मुखादि का योग प्रतिनिर्मित है। मन्त्रों की साधना से सूक्ष्म से सूक्ष्म द्रव्यों की भी परम रक्षा होती है। प्राणों के चालन में अनुक्रम में नित्य युक्त करे।।७-८।।