साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनाशीतितमोऽध्यायः ३८७
पार्थिवः सकलीरग्नौ मन्त्रैर्होम्य शतं घृतम्।
वारुणेन ततो हुत्वा शेषं पानं यथा पुरा ॥८॥
बीजयोन्यां ततः स्तुत्वा पूजां कृत्वा प्रणम्य च।
अनुग्राह्योऽस्मि देवेश कामं सर्वसमृद्धये ॥९॥
पूर्वपक्षं क्षपा उक्ता नित्यं स्यात् समया यथा।
अनेन विधिना न्यासान्निवर्तनमनन्यथा ॥१०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे एकोनाशीतितमोऽध्यायः
अवशिष्ट १०० बार कहे। तदनन्तर उससे अधिक पान (?) करे। तदनन्तर प्रकृतिस्थ होकर दीक्षा की शक्ति प्राप्त करे। पार्थिव मन्त्र द्वारा एकत्र करके अग्नि में घृत से १०० होम करे। तदनन्तर वारुण मन्त्र से आहुति देकर अवशिष्ट का पूर्व के समान पान करे। बीजयोनि द्वारा स्तुति, पूजा तथा प्रणामोपरान्त कहे—'हे देवेश! यथेष्ट सर्व-समृद्धि के लिये मुझपर अनुग्रह करें। पूर्वपक्ष को क्षपा कहा गया है। वह नियमपूर्वक नित्य हो। इस विधानोक्त न्यास से निवर्त्तन होगा, अन्यथा नहीं होगा।।७-१०।।
श्री साम्ब पुराणोक्त ज्ञानोत्तर न्यास में निवर्त्तन नामक उन्यासीवाँ अध्याय समाप्त