साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशीतितमोऽध्यायः
(मुक्तिमार्गः)
अथवा संशयापन्नं सद्योमुक्तिं समाचरेत्।
देवं सम्पूज्य सम्यक्च दक्षिणामूर्तिमाश्रितः ॥१॥
अप्यतद्दर्शनाद्धीरः स्थिरचित्तो दृढव्रतः।
स्वहृदि पुरुषं न्यस्य यथापूर्वविधानतः ॥२॥
आचान्तः पुनराचम्य युञ्जन् मन्त्रान् यथाक्रमम्।
वायव्याऽग्निं निवेश्याथ ह्यात्मानं तत्र योजयेत् ॥३॥
ततः संहारदेवेन सृष्टिमाग्नेर्नियोजयेत्।
विशेच्च दीपमापन्नो योनिं भूतेशसंज्ञिताम् ॥४॥
अथवा संन्यासापन्न होकर सद्यः मुक्ति का आचरण करे। दक्षिणामूर्त्ति का आश्रय लेकर देवता का सम्यक् पूजन करे। तदनन्तर उनके दर्शनार्थ धीर व्यक्ति स्थिर चित्त तथा दृढ़व्रत होकर अपने हृदय में पुरुष का विन्यास करके पूर्वोक्त विधान से आचमनोपरान्त पुनः आचमन करे तथा यथाक्रम से मन्त्रों को युक्त करे। वायव्य अग्नि में निवेश करे, वहाँ आत्मा को युक्त करना चाहिये। तदनन्तर संहार देव के साथ सृष्टि को अग्नि से युक्त करे। दीपलाभ करके भूतेश नामक योनि में प्रविष्ट हो जाय॥१-४॥
पापं दहति योनिः स संहारेण प्रचोदितः।
तत्त्वबीजस्य कात्स्थानात्क्षिप्तं विगतकल्मषः ॥५॥
दग्ध्वा भूतेशयोनिं स शिवयोनिं क्रमाद्विशेत्।
ततस्तु चैकसंयुक्तौ वायुना चाचलीकृतौ ॥६॥
संहार के द्वारा प्रचोदित होने से योनिपाप का दहन हो जाता है। तत्त्वबीज में भूमि स्थान से सत्वर पापमुक्ति हो जाती है। तदनन्तर भूतेश योनि को दग्ध करके क्रमशः शिवयोनि में प्रविष्ट हो जाय। तत्पश्चात् एकत्र संयुक्त होकर वायु के द्वारा अचलता में स्थित होना चाहिये॥५-६॥
शिवाग्नी चेरतुश्चैव सर्वभूतक्षयंकरौ।
ततस्तस्मिन् समीभूते हृदि प्रोक्ते ततोऽनले ॥७॥
दहेच्छरीरं सोष्माणि मन्त्राणि परमेष्ठिनः।
असम्भारस्ततो मन्त्री दह्यमानेन चेद् धृदि ॥८॥