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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

अशीतितमोऽध्यायः

(मुक्तिमार्गः)

अथवा संशयापन्नं सद्योमुक्तिं समाचरेत्।
देवं सम्पूज्य सम्यक्च दक्षिणामूर्तिमाश्रितः ॥१॥
अप्यतद्दर्शनाद्धीरः स्थिरचित्तो दृढव्रतः।
स्वहृदि पुरुषं न्यस्य यथापूर्वविधानतः ॥२॥
आचान्तः पुनराचम्य युञ्जन् मन्त्रान् यथाक्रमम्।
वायव्याऽग्निं निवेश्याथ ह्यात्मानं तत्र योजयेत् ॥३॥
ततः संहारदेवेन सृष्टिमाग्नेर्नियोजयेत्।
विशेच्च दीपमापन्नो योनिं भूतेशसंज्ञिताम् ॥४॥

अथवा संन्यासापन्न होकर सद्यः मुक्ति का आचरण करे। दक्षिणामूर्त्ति का आश्रय लेकर देवता का सम्यक् पूजन करे। तदनन्तर उनके दर्शनार्थ धीर व्यक्ति स्थिर चित्त तथा दृढ़व्रत होकर अपने हृदय में पुरुष का विन्यास करके पूर्वोक्त विधान से आचमनोपरान्त पुनः आचमन करे तथा यथाक्रम से मन्त्रों को युक्त करे। वायव्य अग्नि में निवेश करे, वहाँ आत्मा को युक्त करना चाहिये। तदनन्तर संहार देव के साथ सृष्टि को अग्नि से युक्त करे। दीपलाभ करके भूतेश नामक योनि में प्रविष्ट हो जाय॥१-४॥

पापं दहति योनिः स संहारेण प्रचोदितः।
तत्त्वबीजस्य कात्स्थानात्क्षिप्तं विगतकल्मषः ॥५॥
दग्ध्वा भूतेशयोनिं स शिवयोनिं क्रमाद्विशेत्।
ततस्तु चैकसंयुक्तौ वायुना चाचलीकृतौ ॥६॥

संहार के द्वारा प्रचोदित होने से योनिपाप का दहन हो जाता है। तत्त्वबीज में भूमि स्थान से सत्वर पापमुक्ति हो जाती है। तदनन्तर भूतेश योनि को दग्ध करके क्रमशः शिवयोनि में प्रविष्ट हो जाय। तत्पश्चात् एकत्र संयुक्त होकर वायु के द्वारा अचलता में स्थित होना चाहिये॥५-६॥

शिवाग्नी चेरतुश्चैव सर्वभूतक्षयंकरौ।
ततस्तस्मिन् समीभूते हृदि प्रोक्ते ततोऽनले ॥७॥
दहेच्छरीरं सोष्माणि मन्त्राणि परमेष्ठिनः।
असम्भारस्ततो मन्त्री दह्यमानेन चेद् धृदि ॥८॥

अशीतितमोऽध्यायः ३८९

शिव तथा अग्नि विचरण करते हैं। वे समस्त प्राणीगण के क्षयकारक हैं। तत्पश्चात् हृदयउसमें मिलित हो जाते है। उष्मा शरीर को दग्ध कर देती है। यह परमेष्ठी का ऊष्म मन्त्र है। हृदय दह्यमान हो जाने पर मन्त्री मानरहित हो जाता है॥७-८॥

नात्मना विशयेदस्त्रं विसर्गास्त्रमकारजम्। द्वाराणां शीर्षरापानां विधाना च व्युपस्थितः ॥१९॥

आत्मा द्वारा अस्त्र प्रवेश न कराये (?) विसर्गान्त मकारजात है (इस श्लोक में आगे अर्थ अस्पष्ट है अतः बाकी का अनुवाद करने में असमर्थता है)॥१९॥

भित्वा मूर्ध्नि कपालं तु विधिना व्ययमीश्वरम्। यं प्राप्य न निवर्तेत योगिनः परमं शिवम् ॥२०॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे अशीतितमोऽध्यायः

तदनन्तर मार्ग रुद्ध हो जाने पर वह्नि यज्ञशत का विनाश करती है। मस्तक में कपाल भेदन करके अव्यय ईश्वर में प्रवेश मिलता है। जो परा शिव को प्राप्त कर लेते हैं, वे योगी पुनः जन्म ग्रहण चक्र से मुक्त हो जाते हैं॥२०॥

श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में मुक्तिमार्ग नामक अस्सीवाँ अध्याय समाप्त

एकाशीतितमोऽध्यायः

एतेषां परवान् योगः संवत्सरतनुं स्थितः।
अष्टानामनुपूर्वेण भिन्नाभिन्नार्थवेदने ॥१॥
प्रतिलोमप्रधिः प्रोक्तो दीपयेत् स्पर्शयेत् क्रमात्।
चतुर्विंशत्तथा वह्नित्रिकयोगेन साधकः ॥२॥
व्यञ्जनं च विसर्गस्थमादावन्त उपाश्रितम्।
अन्ततो बिन्दुसंयुक्तमाकारेण तदेव तु ॥३॥
द्वाविंशत्यन्तरायुक्ता क्रूरेणैकादशेन च।
ओंकारं च वषट्कारं यदा नैतददीप्यते ॥४॥

ये सभी श्रेष्ठ योग संवत्सररूप तनु का आश्रय करके आनुपूर्विक आठ भिन्न तथा अभिन्न अर्थ जानने के लिये हैं। प्रतिलोम प्रधि का वर्णन किया गया है। उसे क्रम से दीप्त करे तथा स्पर्श कराये। ऐसा साधक तीन वह्नियों के योग से २४ बार स्पर्श करे। विसर्गस्थ व्यञ्जन आदि में तथा अन्त में उपाश्रित है। शेष बिन्दुसंयुक्त है। आकार के द्वारा भी वही है। २२ में एकादश क्रूरयुक्त हैं। जब वे दीप्त नहीं हुये तब ओंकार तथा वषट्कार प्रकाशित हुये।।१-४।।

अन्तःस्थाश्च शलाकान्ते संयोज्यादुष्मणापि च।
उत्तमस्पर्शयुक्तानि सुषुम्नान्तर्गतो मतः ॥५॥
क्षुरिका कर्तरी चैका लोका चैकस्तथान्तगाः।
प्रसवे योजयेदेतत्प्रतिमन्त्रत्रिकं तु वै ॥६॥

शलाकान्त में अन्तःस्थ वर्णों को ऊष्म वर्ण के साथ युक्त करे। उत्तम स्पर्शयुक्त वर्णों को सुषुम्ना के अन्तर्गत जाने। क्षुरिका, कर्तरी का लौकिक तथा अन्तग सृष्टि के समय योग करे, किन्तु यह प्रतिमन्त्र ३ करके होगा।।५-६।।

तिस्रस्तिस्रस्तथा चैवमेकैकस्य पृथक्-पृथक्।
ऊर्ध्वं तस्य च वक्त्रादेर्योगः स्यात् प्रतिनिर्मितः ॥७॥
मन्त्राणां साधनैः सूक्ष्माद् द्रव्याणां रक्षतः परः।
प्राणानां चालने चैव नित्यं योज्याद्यनुक्रमात् ॥८॥

तीन-तीन में इस प्रकार से एक-एक करके पृथक्-पृथक् हैं। उसके ऊर्ध्व में मुखादि का योग प्रतिनिर्मित है। मन्त्रों की साधना से सूक्ष्म से सूक्ष्म द्रव्यों की भी परम रक्षा होती है। प्राणों के चालन में अनुक्रम में नित्य युक्त करे।।७-८।।

एकाशीतितमोऽध्यायः ३९१

आसने क्षुरिकां दत्त्वा ततो मन्त्रं प्रयोजयेत् ।
शलाका पूजने योज्या दत्त्वा चैवानुकर्तरी ॥९॥
अग्नेरर्चाविधानेषु दीपने चाभिषेचने ।
जपेत्तथा वै ध्यानेषु मन्त्रे च परमो विधिः ॥१०॥
शमी बिल्वपलाशं च तथा दूर्वासितास्तिलाः ।
दर्भा सुमनसां चैव गणाः स्याच्छान्तिकर्मणि ॥११॥

आसन में क्षुरिका देकर तब मन्त्रों का प्रयोग करे। शलाका-पूजन में अनुकर्तरी से योग करे। अग्नि के पूजाविधान, दीपन तथा अभिषेक के विषय में जप करना चाहिये। इसी प्रकार ध्यान तथा मन्त्र में भी यह श्रेष्ठ विधि है। शमी, बिल्व, पलाश की लकड़ी, दूर्वा, काला तिल, कुश एवं पुष्प शान्ति कर्म में प्रशस्त हैं॥९-११॥

योज्या क्षीरेण च तथाप्यापुष्पवृक्षयोनयः ।
अवृक्षः किंशुकॊ वृक्षो नित्यमेव धनप्रदः ॥१२॥
करवीरो कनकश्चैव कलक्षेत्रं च दायकः ।
प्रियङ्गुलोध्रपुष्पं च मृत्योस्तैलविपास्यता ॥१३॥

इन सबों से दुग्ध का योग करना चाहिये। ऐसे ही अपुष्प वृक्षयोनि, अवृक्ष, किंजल्क वृक्ष—ये सब नित्य धन देने वाले हैं। कनेर, कनक (धतूरा), कलक्षेत्र, दायक, प्रियंगु तथा लोध्र के पुष्प की (आहुति द्वारा) मृत्यु से रक्षा हो जाती है॥१२-१३॥

शतपुष्पाणि बीजानि लवणं मांसमेव च ।
मल्लिकादिजपैः सर्वैः योज्यः स्याद्धोमकर्मणि ॥१४॥
काकोलूकस्य पक्षाणि येषां द्वे पञ्च सर्वदा ।
द्वन्द्वानान्तु तथा तेषां मृगजैर्द्धे वनान्तरम् ॥१५॥
विभीतकः खादिरश्च सहचरो वासकस्तथा ।
विद्वेषे तु तथा क्रूरे इत्थं तूच्चाटनेषु च ॥१६॥

शतपुष्प, बीज, नमक, मांस, मल्लिकादि पुष्प, सभी प्रकार का जवापुष्प होमकर्म में युक्त करे। काक तथा उलूक के पंख तथा ऐसे सभी प्राणी, जिनमें परस्पर में द्वेष विपरीतता चलती है, ऐसे मृगज (पशु जैसे—मृग-व्याघ्र), विभीतक एवं खदिर, सहचर तथा वासक का विद्वेष कार्य में व्यवहार करे॥१४-१६॥

उक्ताः स्वल्पविधानेषु परतन्त्रेषु ये च वै ।
सर्वे तेनैव सिध्यन्ति विधियुक्तोदितैः परैः ॥१७॥
अरसा बाह्यबीजा वा योज्याश्च सर्वकर्मणि ।
दृष्ट्वा तु विधिना मन्त्रं व्योमस्थं वा महीगतम् ॥१८॥

३९२ श्रीसाम्बपुराणम्

तत्सर्वं साधयेत्तूर्णं यदुक्तं कल्पकल्पकैः।
न च शक्तिपरीचारे मन्त्रान्ते क्रमशस्ततः ॥१९॥

यहाँ अल्प विधान का वर्णन किया गया हैं। अन्यान्य तन्त्रों में (विस्तार में) इनका वर्णन है। यथाविधि प्रयुक्त होने पर इनसे सिद्धि मिलती है। रसविहीन अथवा बाह्य बीज सर्वकार्य में युक्त करे। व्योमस्थ अथवा पृथिवीगत मन्त्र का शीघ्र साधन करे; जैसा कि कल्प-कल्प में (विधि में) कहा गया है। किन्तु शक्ति-परिचार में शीघ्रता न करे। मन्त्रान्त में क्रमशः करना होगा।।१७-१९।।

मन्त्रसम्पुटयोगेन साधयेच्च शलाकया।
शक्रं तु कमले योगस्पर्शैः शक्तिं निरावृत्तम् ॥२०॥

मन्त्रसम्पुट योग में शलाका से साधना करनी चाहिये। इन्द्र की साधना कमल से करे। योग स्पर्श से शक्ति निरावृत हो जाती है।।२०।।

क्षुरिकाकर्त्तरीयुक्ता दक्षिणा निर्वाणमावहेत्।
अग्निपञ्चकयोगान्ते लिङ्गे वै स्थण्डिलेऽथवा ॥२१॥
लक्षत्रयस्य वै योगात् साधयेत् परमेष्ठिनम्।
शिलातले तु वै श्रेष्ठः क्रियाकारणसाधकः ॥२२॥

क्षुरिका तथा कर्त्तरीयुक्त दक्षिणा (दक्षिणकाली) निर्वाण प्रदान करती है। पञ्चाग्नि योग के अन्त में लिंग अथवा स्थण्डिल में तीन लाख के योग से (आहुति से) परमेष्ठि-साधन करे। क्रिया करने में साधक श्रेष्ठ शिलातल पर साधना करे।।२१-२२।।

आदित्यस्य निमित्तात्स्यात्साधनमुन्मिलोक्षिकम्।
भूतेशं निशि वा घोरे वायुभक्षो जलाधितः ॥२३॥
साधयेत् साधनायुक्तो देहे मन्त्री च वै क्षणात्।
बीजेश्वर्या सर्वैव श्मशानभक्ष्यभोजनः ॥२४॥

आदित्य का साधन होता है उन्मीलोक्षिक (उन्मीलित आँखों से) अथवा घोर निशा के समय वायुभक्षी होकर अथवा जल पीकर भूतेश का साधन करे। साधनायुक्त होने पर साधक के शरीर में तत्काल ही समस्त श्रेष्ठ बीजों की विद्यमानता हो जाती है। श्मशान में भक्ष्य भोजन करना चाहिये।।२३-२४।।

अपक्वाशी लब्धप्रभुर्देही देहस्य साधने।
अशीतसिकता ज्येष्ठे जपेत् सृष्टिं घृतप्लुतः ॥२५॥
जपान्ते दीपयेन्मन्त्री दृष्टशान्तिर्यथा शिवः।
चरित्वा भस्मचर्यञ्च भस्मशायी यवाशनः ॥२६॥

एकाशीतितमोऽध्यायः ३९३

भस्मना सिद्धिमाप्नोति भस्मनिष्ठः सुसाधकः। भास्करस्य व्रतं ह्येतदन्ते ह्युक्तं क्रमागतम्॥२७॥

अपक्व द्रव्य भोजन करके यथालाभ से तुष्ट होकर देही देहसाधन करे। ज्येष्ठ की तप्त बालुका में घृत से लिप्त होकर सृष्टि का जप किया जाता है। जप के अन्त में मन्त्री अष्ट शान्तियुक्त शिव के समान दीप्त हो जाता है। भस्मधारी, भस्मशायी तथा यव का भोजन करके विचरण करे। भस्मनिष्ठ साधक भस्म से सिद्धिलाभ करते हैं। यह है—भास्कर का व्रत। बाकी क्रम से कहा जायेगा॥२५-२७॥

क्रमात्संक्रमणं चैव क्रमाद्विद्वेषतां व्रजेत्। संक्रमेद् देहमाक्षिप्य दृष्ट्वैवं क्रमयेत् परान्॥२८॥ इच्छया विचरेन् मन्त्री व्रतान्ते बीजवर्त्मनि। यदुक्तं मन्त्रकोष्ठे तु तस्मिन् शास्त्रे ह्यनेकशः॥२९॥ कन्दमूलफलं पत्रमस्विन्नं स्विन्नमेव च। अशक्तो विधिरुक्तो यमष्टौ ग्रासानुपानयेत्॥३०॥

क्रम से संक्रमण होता है। क्रम से विद्येश्वरत्व की प्राप्ति होती है। ऐसा देखकर अन्य का अतिक्रमण करे तथा देहत्याग करके (विद्येश्वरत्व में) संक्रमण करे। व्रत के अन्त में बीजवर्त्म में इच्छापूर्वक मन्त्रविचरण करके रहे, जैसा कि मन्त्रकोष्ठ में कहा गया है (उस प्रकार से)। उस शास्त्र में अनेक बार यह बतलाया गया है। भोजन में कन्द-मूल-फल-कच्चे पत्ते अथवा सूखे पत्ते ग्रहण करे। ऐसा करने में असमर्थ होने पर आठ ग्रास ग्रहण करना चाहिये॥२८-३०॥

भक्ष्यं वा विधिसम्पन्नं मन्त्रे सम्मानवर्जितम्। पावकं विधिवत्सिद्धं कुर्य्यान् मन्त्रस्य साधने॥३१॥ पूजामन्त्रस्य वै मन्त्री संवत्सरतनुस्थितैः। व्योमस्थं वा तथाग्निस्थं कुर्यात् पूर्वं यमेन वै॥३२॥

अथवा विधिसम्मत पानवर्जित भिक्षाद्रव्य मन्त्रों से ग्रहण करना चाहिये। मन्त्र के साधनार्थ यथाविधि अग्नि सिद्धि करे। जैसे पूर्व में यम ने व्योमस्थ अथवा अग्निस्थ मन्त्र का साधन किया था, वैसे ही संवत्सर तनुस्थित मन्त्रों द्वारा मन्त्री पूजामन्त्र की साधना करे॥३१-३२॥

अनुलोमाद्वयं स्यात् क्षुरिका कर्मभेदिनी। कर्त्तरीकवचं, घोरं शलाकात्रय एव च॥३३॥ अर्गलास्तु शिरः सौम्यः स्वाकायो निःशिखा पराः। प्रतिमास्थाः परा एता ह्यष्टौ ताः शक्तियोनयः॥३४॥

३९४ | श्रीसाम्बपुराणम्

अनुलोम में हृदय होता है। कर्मभेदिनी क्षुरिका, कर्त्तरी, कवच, घोर शलाकात्रय, अर्गल, शिर, सौम्य स्वकाय निःशिखा तथा परा, प्रतिमास्थित परा—ये आठ शक्तियोनि हैं।।३३-३४।।

पूर्वपश्चिमयोश्चैव दक्षिणोत्तरयोस्तथा।
विदिक्षु चानुपूर्वेण स्वरान् सम्पूजयेत् क्रमात् ॥३५॥
प्रत्यहं यजनं कुर्याद्रात्रौ वापि हि साधकः।
द्रव्याभावे जपेनापि साधयेन् मन्त्रतत्परः ॥३६॥

पूर्व तथा पश्चिम दिक्, दक्षिण तथा उत्तर एवं सभी विदिक् में आनुपूर्वीक स्वर-समूह के द्वारा आनुपूर्वीक क्रमानुरूप स्वरसमूह की सम्यक् पूजा करे। साधक नित्य यजन करे। रात्रि में भी करे। द्रव्य का अभाव होने पर जल से ही मन्त्रतत्पर होकर साधन करना चाहिये।।३५-३६।।

चतुष्कं साधयेन्नित्यमेकैकस्य पृथक्-पृथक्।
क्षुरिकादिशलाकान्तामर्गलां चैव साधकः ॥३७॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे साधनविधिर्नामाकाशीतितमोऽध्यायः

चतुष्क का (चार का) नित्य साधन करना चाहिये। एक-एक का पृथक् भाव से क्षुरिका, कर्त्तरी, कवच, घोर शलाकात्रय का एवं अर्गला का साधन करे।।३७।।

श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में साधनविधि नामक इक्यासीवाँ अध्याय समाप्त

द्व्यशीतितमोऽध्यायः

(हृदयपुष्पम्)

अथातः परं गुह्यं मन्त्रसारसमुद्भवम्।
यैर्व्याप्तिमखिलं सर्वं मन्त्रं वै स चराचरम् ॥१॥

सामान्या सर्वसैवास्ते चराणाङ्कः फलव्याधं समया तु मध्यो-मध्यो निविध्यो-मङ्किक्रो समनीनाम परम परम क्षुरिकास्क फट् ना अयथाना अयन्ताना अपवासि-नोऽपि किंषु महामुखो नामकर्त्तरी। यः फट् सम्पापीडायोगतश्च गायवान् रुचमाश्रि गां गीं गुं पञ्चक्रमेण नाम शलाका। परमेष्ठिनस्यैताध्यायन् प्रेतजिह्वामूलीयूपरम्। दक्षिणा। ततो हरा नाम योगशलाकार्कस्य चरणैताः। फटन्तु मूलजाह्रोषायह्लाङ्ग-ददेशवायव्यादिन्द्ररोचनानाम क्षुरिका। सर्वासां मंगला ह्येषा निरोधिनी नाडीनां चतुष्कला निरञ्जनस्य क्षुरिका सर्वमन्त्रहृदया सर्वान् संक्रामयति। सर्वव्रतैश्च स्यात्प्र-योनामन्त्राणां कर्मणि करोति। लक्षकविंशके क्षुरिका समाप्ताः।

अब मन्त्रसार समुद्भव की परम गुह्य कथा कहते हैं, जिसके द्वारा चराचर सकल मन्त्र व्याप्त हैं। सामान्य इत्यादि कर्त्तरी है। 'यः फट्' इत्यादि शलाका है। 'हरा' नाम इत्यादि क्षुरिका है। सर्वमंगळरूपा नाड़ियों में निवासिनी, निरंजन की चक्षुकला, सर्वमन्त्रों की हृदयरूपा क्षुरिका सभी मन्त्रों में संक्रमण करती है। समस्त व्रतों में प्रयुक्त होकर मन्त्रों का कर्म करती है। बीस लाख में क्षुरिका मन्त्र समाप्त है।

ब्रह्मोवाच
आलयः सर्वभूतानां लयनाल्लिङ्गमुच्यते।
हृदि भावमिदं लिङ्गं सर्वजन्मवतां स्थितम् ॥२॥

ब्रह्मा कहते हैं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति तथा विनाश के लिये उसे लिंग कहा जाता है। जो जन्म लाभ करते हैं, उन सबके हृदय में इस प्रकार से लिंग रहता है॥२॥

सदार्चयन्ति विद्वांसो भावपुष्पैर्हृदि स्थितैः।
भावजैः सुमनोभिश्च तमर्चेन्नान्यजैर्बुधैः ॥३॥
ब्रह्माक्षरपदैर्दिद्यैर्जरामरणकारकैः ।
प्रफुल्लपद्मसंस्थाने सुहृद्ये तिष्ठतो मुखे ॥४॥

विद्वान् गण सर्वदा हृदयस्थ भावपुष्पों से अर्चना करते हैं। विज्ञ व्यक्ति भावज पुष्पों से उनकी अर्चना करे; अन्य (वृक्षादि से उत्पन्न) पुष्पों से अर्चना न करे। जरा एवं मरण

३९६ श्रीसाम्बपुराणम्

को दिव्य ब्रह्माक्षर पद द्वारा प्रस्फुटित पद्मतुल्य सुन्दर हृदय में अवस्थित करके विज्ञजन को अर्चना करनी चाहिये॥३-४॥

हृदयं तु विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्।
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच महेश्वरः॥५॥

हृदय को विश्व का महत् आयतन जानना चाहिये। उनकी यह बात सुनकर प्रत्युत्तर में महेश्वर ने कहा॥५॥

शृणु यत्नेन वचनं पुष्पाणि कथयामि ते।
अहिंसा प्रथमं पुष्पं तथा चेन्द्रियनिग्रहः॥६॥
धृतिपुष्पं क्षमापुष्पं शौचं पुष्पं च पञ्चमम्।
अक्रोधः षष्ठपुष्पं तु ह्रीपुष्पं चैव सप्तमम्॥७॥

सयत्न मेरी बता सुनो। तुमको (हृदयस्थ) पुष्पों की बात बतलाता हूँ। अहिंसा प्रथम पुष्प है, इन्द्रियनिग्रह है—द्वितीय पुष्प। तृतीय है—धृति पुष्प। चतुर्थ है—क्षमा पुष्प। पञ्चम है—शौच पुष्प। षष्ठ को अक्रोध कहते हैं। सप्तम पुष्प है—लज्जा॥६-७॥

सत्यं चैवाष्टमं पुष्पमेभिः प्रीयेत वै शिवः।
एतान्यष्टौ च पुष्पाणि चाक्षयान्यव्ययानि च॥८॥
एतानि भावतो येन प्रकल्प्येन निवेदयेत्।
एभिर्यस्तु सदा पुष्पैर्चयेच्छिवमव्ययम्॥९॥

सत्य है—अष्टम पुष्प। इन सबसे शिव प्रसन्न होते हैं। ये आठो पुष्प अक्षय ऐवं अव्यय हैं। इन समस्त भावनारूप को जल से निवेदित करना चाहिये। इन समस्त पुष्पों द्वारा सर्वदा जो अव्यय शिव की अर्चना करते हैं॥८-९॥

उद्घाट्य तु तमोद्वारं शिवं पश्येन्निरञ्जनम्।
कृत्वा यमैस्तु लिङ्गं वै प्रत्याहारैस्तु वैदिकम्॥१०॥
ध्यानधारणपुष्पैस्तु चार्चयेच्छिवमव्ययम्।
शरीरे दीपयेदग्निं न्यासं कृत्वा तृणेन्धनम्॥११॥

वे तमोद्वार को पार करके निरंजन शिव का दर्शन प्राप्त करते हैं। यम से (संयम से) लिंग तथा प्रत्याहार द्वारा वैदिक (?) का (संयमन करके) ध्यान तथा धारणरूप पुष्पों से अव्यय शिव की अर्चना करनी चाहिये। शरीर में अग्नि प्रज्वलित करे, तृण काष्ठ के समान न्यासविधान से। (जैसे भौतिक अग्नि तृण-काष्ठ से प्रज्वलित होती है, वैसे शरीराग्नि न्यास विधान से प्रज्वलित होती है)॥१०-११॥

युञ्जयेदुद्गतान् दोषान् मनःकृत्वा सुनिश्चितम्।
विस्तीर्णाद्धारणाच्चैव नासाग्रे चिन्तयेच्छिवम्॥१२॥

द्व्यशीतितमोऽध्यायः ३९७

चिन्तयेच्च सदा ह्येवं कृत्वा पूजां तु देहजाम्।
क्षणाद्ध्रस्वत्वमायान्ति प्रकीर्णानीन्द्रियाणि च॥१३॥
शुद्धो दोषस्तथा मन्त्री ध्यायन् मन्त्री न लिप्यते।
ज्ञानशुद्धस्तथा मन्त्री विचरेद्विषयैरपि ॥१४॥
भावग्राह्यं मनः कृत्वा बुध्वा भोक्तारमीश्वरम्।
सदा समत्वमायाति सामान्यः सर्वगोचरः ॥१५॥
इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे हृदयपुष्पनाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः

मन को सुनिश्चित करके तद्गत दोषों को अग्नि में छोड़े अर्थात् दोषों का नाश करे। विस्तीर्ण धारणा से नासाग्र में शिवचिन्तन करना चाहिये।

ऐसी देहजात पूजा करके जो सदैव चिन्तन करता है, उसे क्षण काल में ह्रस्वत्व प्राप्त होता है तथा इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं। ऐसे दोषों को शुद्ध करके मन्त्री जब ध्यान में लिप्त नहीं होता, तब भी ज्ञानशुद्ध मन्त्रज्ञ साधक विषयों के साथ भी विचरण कर सकता है (तब भी वह उसमें लिप्त नहीं होता)॥१२-१५॥

श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में हृदयपुष्प नामक बयासीवाँ अध्याय समाप्त

त्र्यशीतितमोऽध्यायः

( तत्त्वनिरूपणम् )

त्रिविधं त्रिविधाकारं त्रिविधं पञ्चसंस्थितम्।
त्रिविधेन तु योगेन लभ्यते तत्त्वनिश्चलम् ॥१॥
यस्य योगः स्मृतः शास्त्रे परे तु परमोद्भवे।
लिङ्गं तस्य सदा योज्यं ज्ञानयोगाच्च कर्मतः ॥२॥
अहिंसा च क्षमा चैव धृतिरिन्द्रियनिग्रहः।
शौचमक्रोधनं सत्यं कर्मशास्त्रविदांवरम् ॥३॥
शास्त्रज्ञादथ योगाच्च गुरुदारेषु किल्विषात्।
मुक्तिस्तत्राविकल्पेन त्रिविधा परिकीर्तिता ॥४॥

तीन, तीन आकार तथा तीन पञ्च संस्थित त्रिविध योग से तत्त्व की स्थिरता मिलती है। परमोद्भव शास्त्र जिसका योग स्मृत हुआ है, ज्ञान योग द्वारा कर्म से उसका लिंग सदा युक्त रहता है। अहिंसा, क्षमा, धैर्य, इन्द्रियसयंम, शौच, अक्रोध तथा सत्य—ये सब शास्त्रविद्वण के श्रेष्ठ कर्म हैं। शास्त्रज्ञों से, योग से, गुरुदारादि (गमन) के पाप से अविकल्प तीन प्रकार की मुक्ति कही गयी है॥१-४॥

आसने च तथा पाने निश्वासोच्छ्वासदृष्टिषु।
त्रिषु वाप्यपचारेषु ज्ञानेन समता यदा ॥५॥
कारणानि निगृह्णीयाद्धटमानानि योगिनः।
प्रसूते तु तथा योगः क्रीडन्ति विषयोरगैः ॥६॥

आसन, पान तथा निश्वास-उच्छ्वास-दृष्टि विषय में तीन प्रकार के किये अप-आचरण में ज्ञान द्वारा जब समता प्राप्त हो जाती है, तब योगीगण घटमान कारणसमूह को निगृहीत करते हैं। ऐसा योग होने पर विषयरूप सर्प के साथ वे क्रीड़ा करते हैं (विषयरूप सर्प उनको डस नहीं पाते)॥५-६॥

निरुद्ध्य दग्धावासस्य गुरुपूजा च सर्वदा।
विना विज्ञानयोगाभ्यां मृतस्य न विपर्ययः ॥७॥
कर्मयोगं तु विज्ञानात् प्रवृत्तः सर्वदा दहेत् ॥८॥
ज्ञानेन केवलेनैव साधकः सर्वतश्चरेत्।
आत्मना हि स भेदज्ञः सुखं भिन्नः समाचरेत् ॥९॥

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ३९९

जो निरोध करके वासना को दग्ध करते हैं, उनकी गुरुपूजा सदा सार्थक होती है; विज्ञान तथा योग के विना कभी भी मृत्यु से छुटकारा नहीं होता। योग की तुलना में ज्ञान प्रशंसनीय है। लौकिक कर्म निकृष्ट है। विज्ञान द्वारा प्रवृत्त होकर सदा कर्मयोग (लौकिक कर्म) दग्ध होता है। (तत्त्वज्ञ) साधक को केवल ज्ञान द्वारा ही सर्वतोभावेन विचरण करना चाहिये। भेदज्ञ साधक आत्मा द्वारा आदि तत्त्व से अलग होकर सुख (की खोज) का आचरण करते हैं।।७-९।।

प्रकृतिं पुरुषं चैव ज्ञात्वा ज्ञानी न तप्यते।
तेषामुपरितः सूक्ष्मः सर्वव्यापी शिवोऽव्ययः ॥१०॥
विदित्वा ज्ञानबुद्ध्यन्तं जायते वेदवित्तमः।
ततः स्वकरणैः कार्यं न योगेन च कर्मणा ॥११॥
आत्मनो ज्ञानमात्रेण वीक्ष्यते तु चराचरम्।
प्रकृतौ पुरुषो लीनः पाशैस्तु प्रकृतिर्वृता ॥१२॥
परापरस्य ज्ञाता वै नरः कर्म परित्यजेत्।
प्रकृतेः पुरुषाश्चैव प्रज्ञानो परमो भवेत् ॥१३॥

ज्ञानी प्रकृति-पुरुष को जानकर कभी भी तृप्त नहीं होते; क्योंकि इसके ऊपर अवस्थित हैं—सर्वव्यापी अव्यय शिव। ज्ञान तथा बुद्धि का शेष जानकर वेदविद्गण उत्तम हो जाते हैं। तदनन्तर अपने करण द्वारा कार्य करना ही उचित है, यौगिक कर्म द्वारा उचित नहीं है। आत्मा के ज्ञानमात्र से चराचर का ज्ञान तथा दर्शन होने लगाता है। प्रकृति में पुरुष लीन हैं तथा पाशों से प्रकृति आवृत हैं। पर एवं अपर तत्त्व के ज्ञाता व्यक्ति कर्म का परित्याग कर देते हैं। प्रकृति से पृथक् होकर पुरुष परम प्रज्ञान हो जाता है।।१०-१३।।

पुमांसस्तेन मुच्यन्ते परावरविचारिणः।
विपर्यये पुनस्तेषां पूर्वस्यां प्रकृतौ स्थिताः ॥१४॥
एको यदि भवेज्जीवो बन्धः कस्य भवेत् पुनः।
कैवल्यं च कथं पुंसां बन्धः प्राधानिकौ यदि ॥१५॥
अथ चेन्नित्यताबन्धः पुंसस्तत्र निरर्थकः।
तस्माज्ज्ञानधरो योगी सर्वदा सुखमश्नुते ॥१६॥

स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्व में विचरण करने वाले पुरुषगण मुक्त हो जाते हैं। विपर्यय होने पर पुरुषगण पुनः प्रकृति में अवस्थान के लिये बाध्य हो जाते हैं। यदि जीव एक है, तब बन्धन किसका होगा? यदि पुरुष का बन्धन प्राधानिक है, तब कैवल्य किसका होगा? और यदि पुरुष नित्य है, तब पुरुष का बन्धन कहना अर्थहीन है। अतएव ज्ञानधर योगी सदा सुख (लौकिक सुख) का त्याग करते हैं।।१४-१६।।

४०० श्रीसाम्बपुराणम्

तारके ज्ञानसंस्कारे न प्रभुर्बध्यते क्वचित्।
इच्छया चरते ज्ञानी योगी कालान्तरेण तु ॥१७॥
दग्धे चैव तु पाशेऽस्मिन् गुरुणा शास्त्रमात्मना।
अभिव्यक्तं रसं दिव्यं भू प्राप्तं गुरुसंस्मरेत् ॥१८॥
एवं संज्ञानसंयोगाच्चाद्यपाशाद्विमुच्यते।
न हिंसेदात्मनात्मानं न हिंसेदिन्द्रियाणि च ॥१९॥
यथाभागं तु वै युंज्यादन्यथा तु विपर्ययैः।
दिशो यस्य तु वै श्रोत्रे जीवः श्रोत्रे व्यवस्थितः ॥२०॥

यदि तारक (ॐ) से ज्ञान-संचार होता है, तब समर्थवान् व्यक्ति कभी भी बद्ध नहीं होता। ज्ञानी स्वेच्छा से विचरण करते हैं, किन्तु योगी कालान्तर में भी विचरण कर सकते हैं। गुरु, शास्त्र तथा आत्मा से यह पाश दग्ध हो जाता है तब दिव्य रसाभिव्यक्ति होती है। ऐसे संज्ञान के संयोग से शीघ्र ही पाश से छुटकारा मिलता है। आत्मा द्वारा आत्मा की हिंसा न करे तथा इन्द्रियों की भी हिंसा न करे। यथाभाग योग करे; अन्यथा विपर्यय होगा। दिक् समूह जिनका श्रोत्र है, जीव उसी में स्थित है॥१७-२०॥

स पश्येदात्मना शुद्धः परमात्मानमात्मना।
त्यक्तवायुरिति प्रोक्तः स्पर्शस्तत्रात्मसम्भवः।
वायुश्च स्पर्शनं युक्तो स्पर्शनं त्वरितं जनः ॥२१॥
चक्षुषा गृह्यते रूपं चक्षुरूपं समुद्भवम्।
जायते शक्तिस्तस्तेन न परस्तेन लिप्यते ॥२२॥
रसज्ञा रसना जिह्वा रसस्तु वरुणात्मकः।
आशश्च परतस्तत्र वरुणश्चात्र सम्भवः ॥२३॥

जो शुद्ध साधक आत्मा द्वारा दर्शन करते हैं, वे उसी से परमात्मा को देखते हैं। त्यक्त वायु जहाँ है, वहाँ स्पर्श आत्मस्वरूप है। वायु का गुण है—स्पर्श। स्पर्श से लोक त्वरित होते हैं। चक्षु से रूप ग्रहण होता है अथवा उसी से (रूप से) चक्षु उत्पन्न है। (रस) वह शक्ति से उत्पन्न होता है। इसी से परवर्त्ती (चक्षु) उसमें लिप्त हो जाता है। जिह्वा रसज्ञा (रसना) है; किन्तु रस वरुणात्मक है। (रस) वह परमात्मा से व्याप्त है। वहीं से है—वरुण की उत्पत्ति॥२१-२३॥

पार्थिवस्तु तथा घ्राणे गन्धस्तु पृथिवी गुणः।
युक्तस्तु पुरुषो ह्यत्र न परः पृथिवीगतः ॥२४॥
अग्निः सर्वमिति प्रोक्तः सर्वस्मिन्नात्मनि स्थितः।
वायुरप्यत्र विज्ञेयो न परो लिप्यते तदा ॥२५॥

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ४०१

इन्द्रियस्येन्द्रगोप्तृत्वाद्धस्तौ चेन्द्रेण संयुतौ।
पुरुषः वापि संयुक्तो न परस्तेन लिप्यते ॥२६॥

पार्थिव वस्तु घ्राण से ग्राह्य होती है। गन्ध है—पृथिवी का गुण, जहाँ पुरुष युक्त होता है; परन्तु परमात्मा पृथिवीगत नहीं है। अग्नि को सर्व कहते हैं। वह सर्वस्वरूप आत्मा में स्थित है। यहाँ अग्नि के साथ वायु को जाना जाता है; किन्तु उसमें परमात्मा लिप्त नहीं होता। इन्द्रियों का रक्षक है—इन्द्र, इसीलिये हस्तद्वय इन्द्र के साथ युक्त हैं। पुरुष हस्त से युक्त है। परमात्मा उसमें लिप्त नहीं होता॥२४-२६॥

भोक्ता विष्णुश्च पापानामपानं स्थानमुच्यते।
पुरुषः पादसंयुक्तस्त्रिधा वै विश्वतोमुखः ॥२७॥
वायुर्वै वर्चसो मार्गस्स मित्रो मित्रयोगतः।
पुरुषश्चात्र संयुक्तो न परः पुरुषो यथा ॥२८॥
अनिन्दं नन्दयत्यस्य विश्वात्माऽसौ प्रजापतिः।
उद्देशान्मनसः श्रौतं परोपप्रस्थितो व्रजेत् ॥२९॥
मनसश्चात्र विज्ञेयं यत्र चैवात्मनः स्थितिः।
न परोऽनेनसंयुक्तश्चान्द्रं रागीयतन्मनः ॥३०॥

भोक्ता है—विष्णु; पापसमूह का स्थान अपान है। पुरुष पादयुक्त है। तीन प्रकार विश्वात्मा का मुख है। वायु है तेज का पथ। उसे समित्र कहते हैं; क्योंकि उसका योजन मित्र (सूर्य) के साथ है। पुरुष यहाँ संयुक्त है, किन्तु परमपुरुष संयुक्त नहीं है। वह विश्वात्मा प्रजापति अनिन्दनीय को आनन्द देता है। मन के उद्देश्य से श्रोत्र दूसरे के द्वारा प्रेरित होकर गमन करता है। मन को जानना चाहिये, जहाँ आत्मा की स्थिति है; उससे अलग नहीं, पाप-संयुक्त नहीं। चन्द्र के समान उसका मन अनुरञ्जित होता है॥२८-३०॥

अहङ्कर्तेऽत्यहंकारः स रौद्रपुरुषालयः।
अहङ्कारेण संयुक्तोऽसौ परो नात्र युज्यते ॥३१॥
परं सर्वात्मकं ब्रह्म ज्ञानब्रह्मेति बाध्यते।
तेन बुद्ध्यत्यथो बुद्धिर्ज्ञानेन विपर्ययः ॥३२॥
त्रैविध्यमन्तःकरणे योऽभिजानाति तत्त्ववित्।
दश च त्रीणि चैतानि यो विद्याद्वि स योगवित् ॥३३॥

‘मैं कर्त्ता हूँ’—यह है अहंकार, रौद्र तथा पुरुष का आलय। पुरुष अहंकार से संयुक्त होता है, परमात्मा इससे युक्त नहीं होता। परमात्मा है सर्वात्मक ब्रह्म। ज्ञान ब्रह्म द्वारा बाधित होता है। उस ज्ञान से उसे पहचाना जाता है। अज्ञान से इसका विपर्यय होता है। जो अन्तःकरण के त्रैविध्य को जानते हैं, वे हैं तत्त्वविद् और जो १०, ३ इनको जानते हैं, वे हैं—योगविद्॥३१-३३॥

साम्ब०—२६

४०२ श्रीसाम्बपुराणम्

एषां तत्त्वेन वै चात्मा नाभाव्यो भावचिन्तकैः ।
अभाव्यं भावयेद्भावं भावो भाव्यं न भावकैः ॥३४॥
भावस्य भावनाज्ञानात् प्रजानां चेद्विपर्ययः ।
त्रिंशकात्प्रभृति ज्ञानं स्याद्योगवित् भ्रमात् ॥३५॥
कर्मकृच्च विदित्वैतज्ज्ञात्वैतद्वै प्रमुच्यते ।
विस्तरेण तदा ज्ञेयं ज्ञानिनां दीक्षितेन च ॥३६॥
योगसाधनयोर्नित्यमविभ्रंशः प्रकीर्तितः ।
बहुपाशावृतोऽप्येष जीवः कर्मवशानुगः ॥३७॥

इस तत्त्व द्वारा आत्मा की भावचिन्तन से भावना न करे। अभाव्य वस्तु की भावना करे। भाव्य वस्तु भावना द्वारा न करे अर्थात् आत्मा भाव के अन्तर्गत नहीं है। आत्मा में भाव से भावना करने से (भावना ज्ञान से) प्रजा का (उत्पन्न जीवगण का) विपर्यय घटित होता है। त्रिंशक प्रभृति ज्ञान क्रम से साधक योगविद् हो जाता है। कर्मकर्त्ता यह जानकर इसी ज्ञान से मुक्त हो जाते हैं। ज्ञानीगण के पास से दीक्षित होकर इसे विस्तार से जानना होगा। योग तथा साधन से नित्य संलग्न रहे। भ्रष्ट न हो, यह कहा गया है। बहुत से पाशों में बंधा जीव कर्म के वशीभूत होकर उसी का अनुगत हो जाता है।।३४-३७।।

तद्योगात् स चरत्यत्र तद्योगात् केवलं भवेत् ।
सम्भवं प्रसवं चैव चालयं च पृथक्पृथक् ॥३८॥
करणान्याकृतिश्चित्तं त्रिकं च दशकं च तत् ।
तदेव भावयेच्छिन्नो ह्यच्छेद्यं छेद्यवित्तमः ॥३९॥

कर्म के योग में वह विचरण करता है। वह ज्ञानयोग के (अनुशीलन से) कारण मुक्त हो जाता है। जन्म, उत्पत्ति तथा लय पृथक्-पृथक् होते हैं। चित्त करण की आकृति पाकर ३-१० प्रकार का होता है। श्रेष्ठ छेदनकर्त्ता उस अच्छेद्य की छिन्न रूप में भावना करते हैं।

सर्वभावैरभाव्यं तद्भावयेच्छिवमव्ययम् ।
ज्ञानेन केवलेनास्य योगेनापि च भावयेत् ।
कर्मणि प्राकृते चापि क्वचिद् ध्यायंस्तु शास्त्रतः ॥४०॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे तत्त्वनिरूपणन्नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः

समस्त भाव से इस अभाव्य अव्यय शिव की भावना करे। प्राकृत कर्म का कभी-कभी शास्त्रानुसार ध्यान करके ज्ञान द्वारा तथा योग द्वारा शिव की भावना करे॥४०॥

श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर में तत्त्वनिरूपण नामक तिरासीवाँ अध्याय समाप्त

चतुरशीतितमोऽध्यायः

(फलश्रुतिः)

श्रीसाम्ब उवाच

भगवन् प्राणिनः सर्वे कुष्ठरोगाद्युपद्रवैः।
सदा हि पीड्यमानास्ते तिष्ठन्ति मुनिसत्तम ॥१॥
येन कर्मविपाकेन सम्भवन्ति महामते।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदांवर ॥२॥

साम्ब कहते हैं—भगवन् मुनिश्रेष्ठ! सकल प्राणीगण सर्वदा कुष्ठ रोगादि उपद्रव से पीड़ित होते हैं। हे महामते! जिस कर्म का विपाक ऐसा होता है, वह सब आपसे सुनने की इच्छा है। आप ब्रह्मविद्या जानने वालों में श्रेष्ठ हैं।।१-२।।

नारद उवाच

व्रतोपवासैर्भानुर्नान्यो जन्मनि तोषितः।
तेनैव हेतुना ते तु कुष्ठरोगादिभागिनः ॥३॥

नारद कहते हैं—हे यदुश्रेष्ठ! जिन्होंने अन्य जन्मों में व्रतोपवास से सूर्यदेव को सन्तुष्ट नहीं किया है, वे ही कुष्ठरोगादि को प्राप्त होते हैं।।३।।

साम्ब उवाच

तेषां रोगोपशमनं जायते च कथं मुने।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि सत्यं सत्य वदस्व मे ॥४॥

साम्ब कहते हैं—मुनि! उनके रोग की शान्ति कैसे होती है? वह सब सुनने की इच्छा है। मुझे बताईये।।४।।

नारद उवाच

शृणु साम्ब महाबाहो कर्तव्यं रविपूजनम्।
यत्कृत्वा सर्वरोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥५॥

नारद कहते हैं—महाबाहु साम्ब! सुनो। वे रवि का पूजन करें। जिसे करने से सभी रोगों से मुक्ति मिलती है। इसमें संशय नहीं है।।५।।

साम्ब उवाच

एतत्सर्वं त्वया ख्यातं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम्।
यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥६॥

४०४ || श्रीसाम्बपुराणम्

सूर्यमुद्दिश्य किं देयं पाठकाय महात्मने।
येन तुष्येत्तु भगवान् भास्करः पापतस्करः॥७॥

साम्ब कहते हैं—आपने अनेक अर्थयुक्त श्रुतिविस्तर यह सब कहा, जिसे सुनकर सब पापों से मुक्ति मिलती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। सूर्य के उद्देश्य से पाठक को (जो इस पुराण के पाठक हैं या सुना है) क्या देना उचित है, जिससे पापनाशक भगवान् भास्कर प्रसन्न हो जायें?॥६-७॥

नारद उवाच

शृणु साम्ब महाबाहो कथयामि तवानघ।
तमेव सूर्यं विज्ञाय पूजयित्वा यथाविधि॥८॥
गन्धपुष्पाक्षतैश्चैव धूपदीपैस्तथोत्तमैः।
स्वर्णालङ्कारवस्त्रैश्च शिरोरत्नविभूषणैः॥९॥
प्रपूज्य सूर्यरूपं तं देया च कपिला शुभा।
गोधूमयवधान्यानि माषमुद्गांस्तिलांस्तथा॥१०॥
गजाश्वमहिषीर्दद्याद्रत्नानि विविधानि च।
हिरण्यं रजतं चैव कांस्यं ताम्रस्य भाजनम्॥११॥
दासदास्यौ तथा दद्याद् भूमिं शस्यवतीं तथा।
पट्टवस्त्राण्यनेकानि दद्याद्वै शुद्धमानसः॥१२॥

नारद कहते हैं—महाबाहु साम्ब! सुनो! तुम जैसे निष्पाप से कहता हूँ। उन सूर्य को जानकर यथाविधि पूजन करे। तत्पश्चात् गन्ध-पुष्प-अक्षत-धूप-दीप-उत्तम द्रव्य, स्वर्ण, अलंकार, वस्त्र, मस्तक का रत्नविभूषण—इन सबसे सूर्यरूप उनकी पाठक पूजा करे तथा शुभ कपिला गौ प्रदान करे। गेहूँ-जौ-धान्य-मूँग-तिल, हाथी, घोड़ा, भैंस, विभिन्न रत्न तथा चाँदी-कास्य तथा ताम्रपात्र प्रदान करे॥८-१२॥

निक्षुभा च तथा राज्ञी द्वे भार्ये च विवस्वतः।
उद्दिश्य तानि देयानि वस्त्रालङ्करणानि च॥१३॥
एवं यः कुरुते भक्त्या स मर्त्योऽत्र महीतले।
पुत्रपौत्रादिसंयुक्तो हर्षनिर्भरमानसः॥१४॥

निक्षुभा तथा राज्ञी सूर्य की भार्या हैं। उनके लिये वस्त्र तथा अलंकार प्रदान करे। जो मरणधर्मा व्यक्ति भक्ति से ऐसा करते हैं, वे इस पृथ्वी में पुत्र-पौत्रादि से युक्त होकर आनन्द से निरुद्वेग चित्त हो जाते हैं॥१३-१४॥

अष्टादशपुराणानां श्रवणे यत्फलं लभेत्।

चतुरशीतितमोऽध्यायः ४०५

भुक्त्वा तु सकलान् भोगान् सूर्यलोके महीयते।
अष्टादशपुराणानां श्रवणे यत्फलं लभेत्।
तत्फलं समवाप्नोति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥१५॥

इति श्रीसाम्बपुराणे वशिष्ठबृहद्बलसंवादे
फलश्रुतिर्नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः

इस संसार में समस्त भोगों का उपभोग करके वे सूर्यलोक में पूजित होते हैं। १८ पुराणों के सुनने से जो फल मिलता है, वह सब इसके पाठ से मिलता है; तुमसे यह सत्य-सत्य कहता हूँ॥१५॥

श्री साम्ब पुराणोक्त वशिष्ठ-बृहद्दल संवाद में फलश्रुति
नामक चौरासीवाँ अध्याय समाप्त

शुभं भवतु
॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥

योगवासिष्ठः

(महारामायणम्)

भाषानुवादकारःसम्पादकौ
स्व. पण्डित श्री कृष्ण पन्त शास्त्री<br>अध्यक्ष, अच्युतग्रन्थमाला-काशीस्व. पण्डित श्री कृष्ण पन्त शास्त्री<br>स्व. पण्डित श्री मूलशङ्कर शास्त्री

भूमिकालेखकः संशोधकश्च
प्रोफेसर मदनमोहन अग्रवाल

योगवासिष्ठ, वेदान्तशास्त्र के मुख्य प्रमाणित ग्रन्थ प्रस्थानत्रयी = उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीतादि में एक संस्कृत भाषा का बृहत् ग्रन्थ है । बृहद् योगवासिष्ठ में लगभग बत्तीस हजार (32000) या तैंतीस हजार (33000) श्लोक है । यह ग्रन्थ योगवासिष्ठमहारामायण, महारामायण, आर्षरामायण, वासिष्ठ रामायण, ज्ञानवासिष्ठ और वासिष्ठ आदि नामों से भी ज्ञात है । यह ग्रन्थ अत्यन्त आदरणीय है, क्योंकि इसमें किसी सम्प्रदायविशेष का उल्लेख नहीं है । भारत के एक कोने से दूसरे काने तक इसका पाठ, मूल तथा भाषानुवाद में, चिरकाल से होता चला आ रहा है । जो महत्त्व भगवद् भक्तों के लिए भागवतपुराण और रामचरितमानस का है, तथा कर्मयोगियों के लिए भगवद्गीता का है, वही महत्त्व ज्ञानियों के लिए योगवासिष्ठ का है । सहस्रों स्त्री-पुरुष-राजा से रङ्क तक-इस अद्भुत ग्रन्थ के अध्ययन से प्रतिदिन के जीवन में आनन्द और शान्ति प्राप्त करते रहे हैं । इस ग्रन्थ में प्रायः सभी प्रकार के पाठकों के अनुयोग के लिए सामग्री प्रस्तुत हैं । जहाँ अबोध बालक भी इसकी कहानियाँ सुनकर प्रसन्न होते हैं, वहां बड़े-बड़े विद्वानों के लिए गहनतम दार्शनिक सिद्धान्तों का इसमें प्रतिपादन है । ऐसा कोई भी प्रश्न नहीं है, जिसका समाधान इसमें प्राप्त न हो । यह ऐसा अद्भुत ग्रन्थ है कि इसमें काव्य, उपाख्यान तथा दर्शन—सभी का आनन्द वर्तमान है यह सब श्रुतियों का सार एवं माण्डूकारिका का वार्तिक = व्याख्यान ग्रन्थ है । महर्षि वसिष्ठ ने स्वयं कहा है—
'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् । इमं समस्तविज्ञानशास्त्रकोशं विदुर्बुधाः ॥'
योगवासिष्ठ के प्रस्तुत संस्करण में संस्कृत के प्रत्येक श्लोकों की अत्यन्त सरल हिन्दी भाषा में सुन्दर विवेचना की गई है, जो इसकी प्रमुख विशेषता है । कोई भी व्यक्ति, जो संस्कृत से सर्वथा अपरिचित है, इसका सरलतापूर्वक अध्ययन कर योगवासिष्ठ के गूढ़दार्शनिक स्थलों को हृदयंगम कर सकेगा और उसको मुक्तिलाभ के लिए अन्य साधनों की अपेक्षा नहीं रह जाती है । मोक्षप्राप्ति के उपाय ढूँढने की चेष्टा में व्यक्ति को आत्मानुभव होता है । इस ग्रन्थ के अध्ययन से व्यक्ति के सम्पूर्ण क्लेशों - दुःखों का अन्त होकर उसके हृदय में अपूर्व शान्ति प्राप्त होगी । अध्ययनार्थी सांसारिक सुख-दुःख की परिधि से बाहर निकलकर परम आनन्द का अनुभव करेगा । मनोयोगपूर्वक अध्ययन करनेवाले निश्चय ही इस जीवन में ब्रह्मज्ञान कर मुक्ति को प्राप्त करेंगे । यह ग्रन्थ ज्ञान का भण्डार है । वेदान्त के ग्रन्थों में यह चमकता हुआ रत्न है । मुमुक्षु, के लिए यह ग्रन्थ नित्य स्वाध्याय-योग्य है । ग्रन्थ की मौलिक उपादेयता की दृष्टि से आशा की जा सकती है कि वेदान्त के सच्चे जिज्ञासुओं में इसका विशेष प्रचार होगा ।


प्रथम संस्करण : 2011मूल्य : 10000/- ( 1-6 भाग सम्पूर्ण )

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन-वाराणसी

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