साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 400, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनाशीतितमोऽध्यायः
(न्यासादिविनिर्वतनम्)
यदा निर्वेदमापन्नो यश्चेच्छापदमन्वगः।
दस्युभिर्निहिते राष्ट्रे शत्रुणा वा बलीयसा ॥१॥
प्रार्थितोऽपि नयेनाथ बलानां सम्भवादपि।
जीर्णो विगतचेष्टो वा सन्न्यासाद्विनिवर्त्तयेत् ॥२॥
अथागत्वाशुभं गोष्ठं संहारं च त्र्यहं जपेत्।
ततः सम्भाष्य योग्यः स्यान्नमस्कारादिपूजनैः ॥३॥
यतः स्नातः शुचिर्भूत्वा देवदेवं प्रणम्य च।
विज्ञापयेत् क्षमस्वेति रक्षां मम निवर्त्तय ॥४॥
जब निर्वेद प्राप्त होता है अथवा स्वेच्छाकृत भाव से अथवा जब दस्यु तथा बलवान शत्रु से राष्ट्र विपन्न हो जाता है, तब राजा द्वारा प्रार्थना करने पर, बलशालीगण का उद्भव होने पर अथवा स्वयं जीर्ण एवं निश्चेष्ट स्थिति में हो जाने पर संन्यास से लौट आये। तदनन्तर मंगलमय गोष्ठ में आकर तीन दिन संहार मन्त्र का जप करे। तदनन्तर नमस्कारादि पूजन द्वारा सम्भाषण करके योग्य हो जाय। तदनन्तर स्नान करके पवित्र स्थिति में देवदेव सूर्य को प्रणाम करके निवेदन करना चाहिये—‘हे देव! क्षमा करिये। मेरी रक्षा करिये’॥१-४॥
बीजयोन्यां समावाह्य पृथिवीं संन्यसेदतः।
न्यसेच्च वरुणं मूर्ध्नि यजेदेवं दशात्मना ॥५॥
संहारशक्तिमावाह्य चात्मन्यासं प्रयोजयेत्।
सकलीकृत्य भूतैश्च तथैतान् जुहुयात्ततः ॥६॥
बीजयोनि में आवाहन करके पृथ्वी का सम्यक् न्यास करे। मस्तक में वरुण का न्यास करे। ऐसे ही दशात्म द्वारा संहार शक्ति का आवाहन करके अंगन्यास करने के अनन्तर भूत-गण द्वारा सकलीकरण (एकत्रीकरण) करे। इसके पश्चात् उनकी आहुति देनी चाहिये॥५-६॥
शेषं तु शतमाभाभिरधिकं तु पिबेत्ततः।
ततः प्रकृतिमापन्नो दीक्षां शक्तिमवाप्नुयात् ॥७॥