साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः
(रवेः सर्वव्यापित्वनिरूपणम्)
साम्ब उवाच
तत्त्वतः श्रोतुमिच्छामि कथं सर्वगतो रविः।
कतिधा रश्मयस्तत्र मूर्त्तयश्च कति स्मृताः ॥१॥
का राज्ञी निक्षुभा का च कश्चायं दण्डनायकः।
पिङ्गलश्चापि कः प्रोक्तः किं चासौ लिखने सदा ॥२॥
साम्ब ने नारद से पूछा—मैं यह तत्त्वतः सुनना चाहता हूँ कि रवि सर्वगत क्यों हैं? उनकी कितनी किरणें तथा कितनी मूर्तियाँ कही गयी हैं? (तत्त्वविभाग का निरूपण सुनना चाहता हूँ) राज्ञी कौन हैं? निक्षुभा कौन है तथा वे दण्डनायक कौन हैं? पिङ्गला किसे कहा गया है? वे सदा क्या लिखने में व्यापृत रहते हैं? ।।१-२।।
राज्ञस्तोषौ च कौ द्वारे कौ च कल्माषपक्षिणौ।
किं दैवतञ्च तद्व्योम मेरोः सदृशलक्षणम् ॥३॥
को दण्डिर्नग्नको यश्च के देवा दिक्षु ये स्थिताः।
तत्त्वतो निगमञ्चैव विस्तरेण वदस्व मे ॥४॥
(सूर्य के) राजद्वार पर स्तोषद्वय कौन हैं? कल्माष पक्षिद्वय कौन हैं? मेरुशृङ्ग के समान उस व्योम में कौन देवता है? नग्नक नामक दण्डि कौन है? चारो ओर स्थित देवगण कौन हैं? कृपया इनका तत्त्वतः स्वरूप कहिये।।३-४।।
नारद उवाच
विस्तरेणानुपूर्व्या च सूर्यं निगदितं शृणु।
ततः शेषं प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य विवस्वते ॥५॥
नारद कहते हैं—विस्तृत रूप से मैं आनुपूर्वीक सूर्य का तत्त्व कहता हूँ, सुनो। तदनन्तर सूर्य को नमस्कार करके शेष तत्त्व कहूँगा।।५।।
अव्यक्तं कारणं यत्तत् नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिश्चेति तमाहुस्तत्त्वचिन्तकाः ॥६॥
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।
जगद्योनिं समुद्भूतं परं ब्रह्म सनातनम् ॥७॥