साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
सप्तमोऽध्यायः
(रवेः सर्वव्यापित्वनिरूपणम्)
साम्ब उवाच
तत्त्वतः श्रोतुमिच्छामि कथं सर्वगतो रविः।
कतिधा रश्मयस्तत्र मूर्त्तयश्च कति स्मृताः ॥१॥
का राज्ञी निक्षुभा का च कश्चायं दण्डनायकः।
पिङ्गलश्चापि कः प्रोक्तः किं चासौ लिखने सदा ॥२॥
साम्ब ने नारद से पूछा—मैं यह तत्त्वतः सुनना चाहता हूँ कि रवि सर्वगत क्यों हैं? उनकी कितनी किरणें तथा कितनी मूर्तियाँ कही गयी हैं? (तत्त्वविभाग का निरूपण सुनना चाहता हूँ) राज्ञी कौन हैं? निक्षुभा कौन है तथा वे दण्डनायक कौन हैं? पिङ्गला किसे कहा गया है? वे सदा क्या लिखने में व्यापृत रहते हैं? ।।१-२।।
राज्ञस्तोषौ च कौ द्वारे कौ च कल्माषपक्षिणौ।
किं दैवतञ्च तद्व्योम मेरोः सदृशलक्षणम् ॥३॥
को दण्डिर्नग्नको यश्च के देवा दिक्षु ये स्थिताः।
तत्त्वतो निगमञ्चैव विस्तरेण वदस्व मे ॥४॥
(सूर्य के) राजद्वार पर स्तोषद्वय कौन हैं? कल्माष पक्षिद्वय कौन हैं? मेरुशृङ्ग के समान उस व्योम में कौन देवता है? नग्नक नामक दण्डि कौन है? चारो ओर स्थित देवगण कौन हैं? कृपया इनका तत्त्वतः स्वरूप कहिये।।३-४।।
नारद उवाच
विस्तरेणानुपूर्व्या च सूर्यं निगदितं शृणु।
ततः शेषं प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य विवस्वते ॥५॥
नारद कहते हैं—विस्तृत रूप से मैं आनुपूर्वीक सूर्य का तत्त्व कहता हूँ, सुनो। तदनन्तर सूर्य को नमस्कार करके शेष तत्त्व कहूँगा।।५।।
अव्यक्तं कारणं यत्तत् नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिश्चेति तमाहुस्तत्त्वचिन्तकाः ॥६॥
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।
जगद्योनिं समुद्भूतं परं ब्रह्म सनातनम् ॥७॥
३२ श्रीसाम्बपुराणम्
जो अव्यक्त कारणस्वरूप, नित्य सत् तथा असदात्मक है, उन्हें तत्त्वविद् गण प्रधान एवं प्रकृति कहते हैं। वे गन्ध, वर्ण, रस, शब्द, स्पर्श से रहित एवं जगत् के कारण के रूप में समुद्भूत सनातन परम ब्रह्म हैं॥६-७॥
विग्रहः सर्वभूतानामव्यक्तमभवत् पुरा ।
अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणप्रभवाप्ययम् ॥८॥
जो सभी प्राणिगण के विग्रहस्वरूप हैं, वे पूर्व में अव्यक्त थे। वे आदि-अन्तरहित, अज, सूक्ष्म, त्रिगुणात्मक, सृष्टि-प्रलयरूप हैं॥८॥
असाम्प्रतमति ज्ञेयं तमाहुः परमं पदम्।
तेनात्मना सर्वमिदं जगद् व्याप्तं महात्मना ॥९॥
जो बुद्धि से भी अतीत तथा दुर्विज्ञेय हैं, उन्हें (विद्वान्) परमपद कहते हैं। उन महात्मा के आत्मस्वरूप के द्वारा यह समस्त जगत् व्याप्त है॥९॥
तस्येश्वरस्य प्रतिमा ज्ञानवैराग्यलक्षणा ।
धर्मैश्वर्यकृता बुद्धिर्ब्राह्मी तस्याभिमानिता ॥१०॥
उन ईश्वर की प्रतिमा ज्ञान-वैराग्यरूप है। धर्म में ऐश्वर्यकृता बुद्धि है। ब्राह्मी है—उनकी अभिमानिता॥१०॥
अव्यक्ताज्जायते तस्य मनसा यद् यदिच्छति ।
चतुर्मुखस्य ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तकृद्भवः ॥११॥
वे जो इच्छा मन ही मन करते हैं, वह अव्यक्त से उत्पन्न हो जाता है। चतुर्मुख में ब्रह्मत्व, कालत्व एवं विनाशकारित्व तथा उत्पन्नत्व है॥११॥
सहस्रमूर्धा पुरुषः तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ।
सत्त्वं रजश्च ब्रह्मत्वे कालत्वे च रजस्तमः ॥१२॥
वे सहस्र मस्तक वाले पुरुष जो विशिष्ट हैं तथा स्वयम्भु हैं, उनकी तीन अवस्था हैं। ब्रह्मरूप से सत्त्व एवं रजोगुण तथा कालरूप से रजः एवं तमोगुण॥१२॥
सात्त्विकं पुरुषत्वे च गुणावृत्तं स्वयम्भुवः ।
ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे स क्षिपत्यपि ॥१३॥
पुरुषरूप से उनके सात्त्विक गुण का प्रकाश होता है। स्वयम्भु ब्रह्मा रूप से वे जगत् की सृष्टि करते हैं तथा कालरूप से वे निक्षेप (विनाश) करते हैं॥१३॥
पुरुषत्वे ह्युपासीने तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ।
त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैकाल्यं सम्प्रवर्त्तते ॥१४॥
सप्तमोऽध्यायः ३३
सप्तमोऽध्यायः ३३
पुरुषरूप से पालन करते हैं (स्थिति); यह है—स्वयम्भु की तीन अवस्था। वे स्वयं को तीन भाग करके भूत-भविष्य-वर्त्तमान अथवा सृष्टि-स्थिति-संहार का प्रवर्त्तन करते हैं।।१४।।
सृज्यते ग्रसते चैव वीक्ष्यते च त्रिभिः स्वयम्।
अग्रे हिरण्यगर्भस्तु प्रादुर्भूतः स्वयम्भुवः ॥१५॥
स्वयं ही तीन गुणों से सृष्टि, विनाश तथा दर्शन (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) करते हैं। स्वयम्भु ही हिरण्यगर्भ रूप से प्रादुर्भूत हैं।।१५।।
आदित्यस्त्वादिवेदत्वादाजातत्वादजः स्मृतः।
देवेषु च महादेवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥१६॥
सर्वेशत्वाच्च लोकस्य ह्यवश्यत्वात् स चेश्वरः।
बृंहित्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भव उच्यते ॥१७॥
वे आदिदेव आदित्य हैं (आदिदेव होने के कारण आदित्य हैं)। अजात होने के कारण अज हैं। देवों में वे महान् देव होने के कारण महादेव हैं। समस्त जगत् के सत्त्वरूप होने के कारण तथा उन्हें कोई वश में नहीं कर सकता, इस कारण वे ईश्वर हैं। बृहत् होने से वे ब्रह्मा हैं तथा भूतरूप (उत्पन्नरूप) होने से वे भव हैं।।१६-१७।।
यान्ति यस्मात् प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः।
पुर्यां तु शेते यस्माच्च तस्मात् पुरुष उच्यते ॥१८॥
जिससे समग्र प्रजा की उत्पत्ति होती है, वे प्रजापति यही हैं। वे पुरी में (प्रत्येक देह में) शयन करने के कारण पुरुष कहलाते हैं।।१८।।
नोत्पादनत्वात् पूर्वत्वात्स स्वयम्भुरिति स्मृतः।
हिरण्येन तु गर्भस्थो यस्मादेव समावृतः ॥१९॥
तस्माद्धिरण्यगर्भेति सूर्यो देवो निगद्यते।
वे कभी भी उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनका उत्पादक, जनक कोई भी नहीं है तथा वे सबसे पूर्व के होने के कारण स्वयम्भु कहलाते हैं। हिरण्य द्वारा गर्भस्थ होकर समावृत होने के कारण वे हिरण्यगर्भ कहलाते हैं।।१९।।
आपो नारा इति प्रोक्ता ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२०॥
अयनं तस्य तत्पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।
तत्त्वदर्शी ऋषिगण 'नारा' जल को कहते हैं, उसके अयन होने के कारण इनको नारायण कहा जाता है।।२०।।
३४ श्रीसाम्बपुराणम्
अरमित्येष सिद्धार्थे निपातः करिभिः स्मृतः ॥२१॥ कविगण अर शब्द का अर्थ सिद्धार्थ निपात कहते हैं॥२१॥
एकार्णवे पुरा तस्मिन् नष्टे स्थावर-जङ्गमे । नारायणाख्यः पुरुषः सुष्वाप सलिले स्मृतः ॥२२॥ स्थावर एवं जंगम के नष्ट हो जाने पर अर्थात् प्रलय में सृष्टि का विनाश हो जाने पर इसी एकार्णव सलिल में नारायण नामक पुरुष शयन करते हैं॥२२॥
सहस्रशीर्षा सुमहान् सहस्रपात् सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रभुक् । सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिः सूर्याख्यतेजाः पुनरुच्यते रविः ॥२३॥ आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता ह्यपूर्व एकः पुरुषः पुराणः । हिरण्यगर्भः पुरुषो महात्मा स ईष्यते वै तमसः परस्तात् ॥२४॥ वह महान् पुरुष सहस्र मस्तकों से युक्त है (सहस्र = असंख्य)। वह सहस्र पैरों से युक्त है। सहस्र चक्षु तथा मुखयुक्त है। वह हजारों बार (असंख्य बार) भोजन करने वाला है। उसके हजारों बाहु हैं। वह प्रथम प्रजापति सूर्य नामक तेजयुक्त है; अतः उसे रवि कहते हैं। वह आदित्यवर्ण (सूर्य के समान उज्ज्वल कान्ति वाला), भुवनों का पालक, अपूर्व, पुराणपुरुष, हिरण्यगर्भ है। तमोलोक के पश्चात् उसे प्राप्त किया जाता है॥२३-२४॥
तुल्यं युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः । संवर्त्तन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात् ॥२५॥ सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा कार्यं विचिन्त्य सः । भूत्वा वै स तु वाराहो ह्यपः संविशते प्रभुः ॥२६॥ वे हजारों युगों के तुल्य नैश (रात्रि) अन्धकार को दूर करके प्रलयान्त में सृष्टि के लिये ब्रह्मारूप से आविर्भूत हो जाते हैं। वह प्रभु भूमि को जल से आप्लुत देखकर सृष्टिकार्य की विवेचना करके वराह रूप से जल में प्रवेश करते हैं॥२५-२६॥
सञ्चिन्त्यैवं च देवोऽसौ भूमेरुद्धरणं क्षमः । महीं महार्णवे मग्नामुद्धर्तुमुपचक्रमे ॥२७॥ पृथ्वी के उत्तरण में सक्षम वह देव इस प्रकार की चिन्तना करके महार्णव में डूबी पृथ्वी का उद्धार करने का उपक्रम करने लगे॥२७॥
उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षेर्महावराहस्य महीं निधाय । विधुन्वतो वेदमयं शरीरं लोमान्तरस्था मुनयो जयन्ति ॥२८॥ पृथ्वी को धारण करके जल से उत्थित जलसिक्त कुक्षियुक्त महावराह के विकम्पन से प्रकटित वेदमय शरीर की उनके लोमों में स्थित मुनिगण आराधना करने लगे॥२८॥
सप्तमोऽध्यायः ३५
सप्तमोऽध्यायः ३५
उद्धृत्य चोर्वीं सलिलात् प्रजासर्गमकल्पयत्। विसृजन् मानसान् पुत्रानात्मनस्तेजसा समान्॥२९॥
सलिल से पृथ्वी का उद्धार करके प्रजासृष्टि-हेतु चिन्तन करके उन्होंने अपने तेज के समान तेजोमय मानस पुत्रगण की सृष्टि की॥२९॥
भृग्वङ्गिरसमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्। मरीचिमथ दक्षं च वशिष्ठं नवमं तथा॥३०॥ नव प्रजापतीन् सृष्ट्वा ततः स पुरुषोत्तमः। प्रादुर्भूतोऽदितेः पुत्रः प्रजानां हितकाम्यया॥३१॥
भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, दक्ष तथा वशिष्ठ—ये नौ प्रजापति हैं। ये सृष्टि करते हैं। तत्पश्चात् वे पुरुषोत्तम प्रजा की मङ्गलकामना के लिये अदिति के पुत्ररूप में प्रादुर्भूत हुये॥३०-३१॥
मरीचिः कश्यपं पुत्रं नावि वै जनयज्जले। प्रजापतीनां दशमं तेजसा ब्रह्मणा समम्॥३२॥
जल में नौका के समान (जैसे जलोत्तरण में लोग नौका का सहारा लेते हैं) सहायता के लिये (सृष्टिकार्य में सहायता के लिये) मरीचि ने कश्यप नामक पुत्र को उत्पन्न किया। इनका तेज ब्रह्मा के समान था और ये दशम प्रजापति कहे जाते हैं॥३२॥
दक्षकन्यादितिर्नाम्ना पत्नी सा कश्यपस्य तु। अण्डं सा जनयामास भूनभस्तलविस्तरम्॥३३॥ तत्रोत्पन्नः सहस्त्रांशुर्द्वादशात्मा दिवाकरः। नवयोजनसाहस्रो विस्तारस्तस्य वै स्मृतः। विस्तारत्रिगुणश्चास्य परिणाहस्तु मण्डले॥३४॥
दक्ष की अदिति नामक कन्या कश्यप की पत्नी थी। उन्होंने एक अण्डा उत्पन्न किया, जो पृथ्वी से आकाश तक विस्तार वाला था। उससे सहस्त्रांशु द्वादशात्मा (१२ मूर्त्तिरूप से प्रकट) दिवाकर उत्पन्न हुये। उनका विस्तार ९००० योजन प्रसिद्ध है। इसकी परिधि की विशालता त्रिगुण विस्तृत थी॥३३-३४॥
तथा पुष्पं कदम्बस्य समन्तात् केशरैर्वृतम्। तथैव तेजसो गोलं समन्ताद् रश्मिभिर्वृतम्॥३५॥
जैसे कदम्बपुष्प चारो ओर केशर से परिवृत्त रहता है, उसी प्रकार उनका तेजोमय गोला (वर्त्तुलाकार) चारो ओर रश्मियों से घिरा रहता है॥३५॥
३६ श्रीसाम्बपुराणम्
सहस्रशीर्षा पुरुषः प्राङ्मया य उदाहृतः।
तेजसस्तस्य गोलस्य स तु मध्ये व्यवस्थितः॥३६॥
पहले जिन सहस्रशीर्षा पुरुष की कथा इस ग्रन्थ में कही गयी है, इस तेजोमय गोला के मध्य में वे स्थित हैं॥३६॥
आदित्यः स तपत्येष वियन्नापो गभस्तिभिः।
सहस्रपादस्त्वेषोऽग्निर्वृत्तकुम्भनिभः स्मृतः॥३७॥
आदत्ते स तु रश्मीनां सहस्रेण समन्ततः।
आपो नदीसमुद्रेभ्यो हृदकूपेभ्य एव च॥३८॥
प्रभा सौरी तु पादेन ह्यस्तं याति दिवाकरे।
अग्निमाविशते रात्रौ तस्माद् दूरात् प्रकाशते॥३९॥
वह आदित्य अपनी किरणों से द्युलोक तथा जलाशयों को ताप प्रदान करते हैं। वे वृत्ताकार कुम्भतुल्य सहस्रपाद युक्त अग्नि कहे जाते हैं। ये चारो ओर हजारों-हजारों रश्मियों द्वारा नदी, समुद्र, हृद तथा कूप से जल का आहरण करते हैं।
दिवाकर का सूर्यास्त होने पर रात्रि में सूर्य की प्रभा का एक पाद अग्नि में प्रवेश करता है, तब दूर से सूर्यप्रभा प्रकाशित होती है॥३७-३९॥
उदिते च पुनः सूर्यो चौष्ण्यमाग्नेयमाविशत्।
पादेन तेजसश्चाग्नेस्तथा तत्तपते दिवा॥४०॥
प्रकाशं च तथौष्ण्यञ्च सौर्याग्नेये च तेजसि।
परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥४१॥
सूर्य के पुनः उदित होने पर उसमें अग्नि की उष्णता प्रवेश करती है। ऐसे ही अग्नि का तेज एक पाद से दिन में ताप देता है। सूर्य तथा अग्नि के दो तेज हैं—प्रकाशक धर्म तथा उष्णत्व अर्थात् सूर्य का तेज है—प्रकाशक धर्म तथा अग्नि का तेज है—उष्णत्व धर्म। ये परस्पर अनुप्रवेश द्वारा दिवा-रात्रि को प्रकाशित करते हैं॥४०-४१॥
नारद उवाच
व्यापकत्वं च रश्मीनां नामानि च निबोध मे।
हेतयः किरणा गावो रश्मयोऽथ गभस्तयः॥४२॥
अभीषवो वनान्युस्रा घृणयोऽथ मरीचयः।
नाड्यो दीधितयः साध्या मयूखा भानवोंऽशवः॥४३॥
सप्तर्षयः सुपर्णांश्च कराः पादास्तथैव च।
एवं नाम्ना तु पर्यायाः रश्मीनां विंशतिः स्मृता॥४४॥
सप्तमोऽध्यायः ३७
सप्तमोऽध्यायः ३७
नारद कहते हैं—रश्मियों का व्यापकत्व तथा नाम मैं कहता हूँ, श्रवण करो। हेति, किरण, गो, रश्मि, गभस्ति, अभीषव, वन, उस्र, घृणि, मरीचि, नाड़ी, दीधिति, साध्य, मयूख, भानु, अंश, सप्तर्षिगण, कर तथा पाद—ये सूर्यरश्मि के २० पर्यायवाची नाम कहे गये हैं॥४२-४४॥
वन्दनादिति वक्ष्यामि नामान्येषां पृथक्-पृथक्।
रवेः करसहस्रं तु शीतवर्षोष्मभिस्तपन्॥४५॥
इन सबके प्रणाम तथा स्तुतियोग्य नाम पृथक्-पृथक् हैं। रवि के करसहस्र शीत, वर्षा तथा ऊष्म के साथ ताप प्रदान करते हैं॥४५॥
तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्तेऽचिन्त्यमूर्तयः।
वन्दनाश्चैव मेध्याश्च कातनाः केतनास्तथा॥४६॥
तदनन्तर उनकी ४०० अचिन्त्य मूर्ति नाड़ियाँ वर्षण करती हैं। वन्दनीय, मेध्य (पवित्र), कातना एवं केतना—ये हैं सूर्यरश्मियों के नाम॥४६॥
अमृता नामतः सर्वाः रश्मयो वृष्टिसर्जनाः।
हिमावहास्तु त्रिंशद्वै ताभ्योऽन्या रश्मयः स्मृताः॥४७॥
अमृतरूप रश्मिसमूह वृष्टि के उत्पादक हैं। उनमें से ३० हिमवाहक एवं अन्य रश्मि के नाम से अभिहित हैं॥४७॥
चन्द्रास्ता नामतः सर्वाः पीताभास्तु गभस्तयः।
रश्मयो मेघपौष्यश्च ह्लादिन्यो हिमसर्जनाः॥४८॥
चन्द्र नामक जो रश्मियाँ हैं, वे सभी पीताभ (पीत वर्ण कान्ति वाली) हैं। मेघ तथा पूषा-सम्बन्धित रश्मियाँ ह्लादकारी (आनन्ददायक) तथा हिम की उत्पादिका हैं॥४८॥
समं बिभ्रति ताः सर्वान् मनुष्यान् देवताः पितॄन्।
मनुष्यानोषधीभिस्तु स्वधया च पितॄनपि॥४९॥
अमृतेन सुरान् सर्वांस्त्रयस्त्रिभिरतर्पयेत्।
वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शतैः प्रतपति त्रिभिः॥५०॥
ये सब मनुष्य, देवता तथा पितरों का पोषण करती हैं। औषधि द्वारा मनुष्यों का तथा स्वधा (पिण्डादि) द्वारा पितरों का तथा अमृत द्वारा समस्त देवताओं का तृप्ति-विधान करती हैं। मनुष्य, पितर तथा देवता यथाक्रमेण औषधि, स्वधा तथा अमृत से तृप्त होते हैं। वसन्त तथा ग्रीष्म में ३०० किरणों द्वारा सूर्य ताप प्रदान करते हैं॥४९-५०॥
शरत्सु चैव वर्षासु चतुर्भिः सम्प्रवर्षति।
हेमन्ते शिशिरे चैव हिमोत्सर्गं त्रिभिः पुनः॥५१॥
३८ श्रीसाम्बपुराणम्
ओषधीषु बलं धत्ते स्वधायां च स्वधी पुनः ।
सूर्योऽमृतावमृते च त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥५२॥
शरत् काल तथा वर्षाकाल में सूर्य चार रश्मियों से वर्षण करते हैं। हेमन्त में तथा शिशिर में पुनः तीन रश्मियों से हिमयोग करते हैं। सूर्य औषधियों में (लता-गुल्म-शस्यादि में), स्वधा तथा अमृत में बल देते हैं। तीन में (मनुष्य-देवता तथा पितरों में) तीन वस्तु (यथाक्रम औषधि-अमृत तथा स्वधा) की स्थापना करते हैं॥५१-५२॥
कालोऽग्निर्ब्रह्मणश्चैव द्वादशात्मा प्रजापतिः ।
तपत्येष सुरश्रेष्ठस्त्रींल्लोकान् सचराचरान् ॥५३॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः ।
ऋचो यजूंषि सामानि ह्येष एव न संशयः ॥५४॥
काल में ब्रह्मा के द्वादशात्मा प्रजापति स्थावर-जंगम त्रिभुवन को ताप प्रदान करते हैं। सूर्य ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर हैं। ये ही निःसन्दिग्ध रूप से ऋक्, यजुः तथा साम वेदरूप हैं॥५३-५४॥
उद्यन् सन्दीप्यते ऋग्भिर्मध्याह्ने यजुभिस्ततः ।
सामभिश्चापि सायाह्ने दीप्यते भास्करः क्रमात् ॥५५॥
स एष तेजसो राशिर्दीप्तिमान् सार्वलौकिकः ।
पार्श्वेनोर्ध्वमधश्चैव प्रपतत्येष सर्वतः ॥५६॥
ये उदयकाल में ऋक् के द्वारा सन्दीप्त होते हैं, मध्याह्न में यजु के द्वारा तथा सायाह्न में साम द्वारा दीप्त होते हैं अर्थात् प्रातःकाल में ऋक् मन्त्र से, मध्याह्न काल में यजुर्मन्त्र से तथा सन्ध्या में साम मन्त्र से पूजित होते हैं। यह तेजोराशि, दीप्तिमान तथा सार्व-लौकिक है। ये ही पार्श्व, ऊर्ध्व या अधोदेश को ताप प्रदान करते हैं॥५५-५६॥
यथा प्रभाकरो दीपो गृहमध्ये व्यवस्थितः ।
पार्श्वेनोर्ध्वमधश्चैव तमो नाशयते समम् ॥५७॥
तद्वत् सहस्रकिरणो ग्रहराजो जगत्पतिः ।
त्रीणि रश्मिशतान्यस्य भूर्लोकं द्योतयन्ति च ॥५८॥
जैसे प्रभायुक्त दीपक गृह में स्थित होकर पार्श्व-ऊर्ध्व तथा अधः के अन्धकार को समान रूप से नष्ट करता है, वैसे ही सहस्र किरणयुक्त ग्रहराज, जगत्पति सूर्य सर्वत्र ताप प्रदान करते हैं एवं इनकी तीन सौ रश्मियाँ भू-लोक को उद्भासित—द्योतित करती हैं॥५७-५८॥
चत्वारि तु पुनस्तिर्यक् त्रीणि चोर्ध्वं सुरालयम् ।
इत्येतन्मण्डलं शुक्लं भास्करं लोकसंज्ञितम् ॥५९॥
सप्तमोऽध्यायः ३९
सप्तमोऽध्यायः ३९
नक्षत्र-ग्रह-सोमानां प्रतिष्ठा योनिरेव च।
चन्द्राद्याश्च ग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ॥६०॥
चार सौ रश्मियाँ तिर्यक् रूप से पितृलोक को तथा तीन सौ रश्मियाँ ऊर्ध्व रूप में स्वर्गलोक को प्रकाशित करती हैं। यह मण्डल शुक्ल है तथा भास्कर लोक कहा जाता है। सूर्य ही नक्षत्र, ग्रह तथा सोम की प्रतिष्ठा का कारण है। चन्द्रादि सभी ग्रह सूर्य से ही उत्पन्न हैं॥५९-६०॥
रवेः करसहस्रं यत् प्राङ्मया समुदाहृतम्।
तेषां श्रेष्ठाः शुभाः सप्तरश्मयो ग्रहयोनयः ॥६१॥
सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।
विश्वव्यचाः पुनश्चान्यः सौम्यश्च सुरतः स्मृतः ॥६२॥
उदन्वसुः पुनश्चान्यः सुरादन्यः प्रकीर्त्तितः ॥६३॥
मैंने जो पूर्व में सूर्य के सहस्र किरणों की बात कही है, उनमें से श्रेष्ठ मंगलकारी सात रश्मियाँ ग्रहयोनि हैं अर्थात् ग्रहों की उत्पत्ति में अलग से सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, सौम्य (बुध ग्रह), सुव्रत तथा उदन्वसु देवता कहे गये हैं॥६१-६३॥
सुषुम्नः सूर्यरश्मिर्यः क्षीणं शशिनमेधते।
अमृतं स्वर्धमानेन सम्भृत्यैकेन रश्मिना ॥६४॥
सुषुम्न नामक क्षीण सूर्यरश्मि क्षीण चन्द्र को वर्द्धित करती है एवं एक रश्मि द्वारा मिलित होकर अमृत का वर्द्धन करती है॥६४॥
आप्यायनाच्च देवानामादित्यश्चन्द्रतिग्मतः।
शुक्लत्वामृतशीतत्वे दीप्तौ चाह्लादनेऽपि च ॥६५॥
धातुश्च दीप्तिबह्वर्थ्यस्तेनासौ चन्द्र उच्यते।
संयद्वसुस्तु यो रश्मिर्योनिः सोऽङ्गारकस्य तु ॥६६॥
आदित्य के चन्द्रकिरणों से देवगण आप्यायन करते हैं। शुक्लत्व, अमृतत्व, शीतत्व, दीप्ति तथा आह्लाददान (आनन्ददान), दीप्ति प्रभृति अनेक अर्थ के वाचक होने से इसे चन्द्र कहा जाता है। संयद्वसु नामक जो योनि है, वह अङ्गारक (मङ्गल) की योनि है॥६५-६६॥
दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्यायते बुधम्।
उदावसुस्तु यो रश्मिर्योनिः स तु बृहस्पतेः ॥६७॥
दक्षिण दिशा की विश्वकर्मा नामक रश्मि बुध को आप्यायित करती है। उदावसु नामक रश्मि बृहस्पति की योनि (कारण) है॥६७॥
४० | श्रीसाम्बपुराणम्
विश्वव्यचास्तु यः पश्चाच्छुक्रयोनिः स वै स्मृतः।
शनैश्चैवं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते स्वराट्॥६८॥
हरिकेशस्तु यो रश्मिस्तेजो नक्षत्रयोगिनः।
न क्षीयन्ते यतस्तानि तेषां नक्षत्रता ततः॥६९॥
क्षत्रं वीर्यं बलं तेज इति चैकार्थवाचकम्।
सूर्यः क्षत्रं तथादत्ते तेषां नक्षत्रता स्मृता॥७०॥
विश्वव्यचा नामक जो रश्मि पीछे रहती है, वह शुक्र की उत्पत्ति का कारण है। सूर्य स्वयं शनैश्चर को आप्यायित करते हैं। हरिकेश नामक जो रश्मि है, वह नक्षत्रयोगियों का तेज है; क्योंकि वे क्षय-प्राप्त नहीं होते, अतः नक्षत्र कहे गये हैं। क्षत्र, वीर्य, बल, तेज—ये सभी एकार्थ-वाचक शब्द हैं। सूर्य का तेज ग्रहण करने के कारण ही इनको नक्षत्र कहा गया है॥६८-७०॥
अस्माद् लोकादमुं लोकं तीर्णानां सुकृतैर्गृहात्।
तारणात्तारका ह्येषा शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥७१॥
सूर्यस्यैवापरो रश्मिर्नाम्ना वृष्टिपतिः स्मृतः।
समत्वं प्रतिबद्धस्तु स जीवयति वै जगत्॥७२॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सर्वव्यापित्वनिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः
●
इस पृथ्वीलोक से लेकर उस लोक में (स्वर्गादि में) सुकृति के फल से जो उत्तीर्ण हैं, उन्हें तारण कराने के लिये तारका नाम से अभिहित हैं। शुक्लत्व के कारण भी इन्हें तारका कहते हैं। सूर्यदेव की ही अन्य रश्मि वृष्टिपति नाम से स्मृत है। सूर्य के साथ युक्त होने से समान रूप से रक्षा करके ये जगत् को जीवित करते हैं॥७१-७२॥
श्रीसाम्बपुराण का सर्वव्यापित्व-निरूपण नामक सप्तम अध्याय समाप्त
●
अष्टमोऽध्यायः
(सूर्यनिगमनम्)
नारद उवाच
आदित्यमूलमखिलं त्रैलोक्यं यदुनन्दन।
भवत्यस्माज्जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥१॥
रुद्रोपेन्द्रमहेन्द्राणां विप्रेन्द्रत्रिदिवौकसाम्।
महाद्युतिमतां चैव तेजो यत् सार्वलौकिकम् ॥२॥
नारद कहते हैं—हे यदुनन्दन (जाम्बवतीसुत साम्ब)! समस्त त्रिभुवन के मूल आदित्य हैं। देवता, असुर तथा मनुष्य के साथ समस्त जगत् सूर्य से ही उत्पन्न है। रुद्र, उपेन्द्र, महेन्द्र, ब्राह्मणश्रेष्ठ, स्वर्गवासी देवगण एवं महाद्युति-सम्पन्न सबका जो सार्वलौकिक तेज है, वह सूर्य से ही उत्पन्न है॥१-२॥
सर्वात्मा सर्वलोकेशो देवदेवः प्रजापतिः ॥३॥
वे सर्वात्मा, समस्त लोक के ईश्वर, देवताओं के देवता तथा प्रजागण के पालक प्रजापति हैं॥३॥
सूर्य एव त्रिलोकस्य मूलं परमदैवतम्।
अग्नौ क्षिप्त्वाऽहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजा ॥४॥
सूर्य त्रिलोक के मूल (प्रधान) परम दैवत हैं। अग्नि में प्रक्षिप्त आहुति सम्यक् रूपेण आदित्य को मिलती है। आदित्य से वृष्टि का उदय होता है। वृष्टि से अन्न तथा अन्न से प्रजागण उत्पन्न होते हैं॥४॥
सूर्यात् प्रसूयते सर्वं तत्र चैव प्रलीयते।
भावाभावौ हि लोकानामादित्यान्निःसृतौ पुरा ॥५॥
सततं ध्यायिनो ध्यानं मोक्षश्चाप्येष मोक्षिणाम्।
अत्र गच्छन्ति निर्वाणं जायन्तेऽस्मात् पुनः प्रजाः ॥६॥
सूर्य से ही सब कुछ उत्पन्न होता है और अन्त में वहीं विलीन हो जाता है। समस्त लोक की उत्पत्ति तथा विनाश आदित्य से ही होता है। इनका निरन्तर ध्यान से ध्यानकारीगण ध्यान तथा मोक्षाकांक्षीगण (सूर्य में) मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसी से सबका निर्वाण होता है एवं पुनः सूर्य से ही प्रजागण उत्पन्न होते हैं॥५-६॥
४२ श्रीसाम्बपुराणम्
क्षणा मुहूर्त्ता दिवसा निशाः पक्षास्तथैव च।
मासाः संवत्सराश्चैव ऋतवोऽथ युगानि च ॥७॥
तदादित्यादृते ह्येषां कालसंख्या न विद्यते।
कालादृते न नियमो नाग्नेर्विहरणक्रिया ॥८॥
क्षण, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, संवत्सर, षड् ऋतु, चारो युग—इन सबकी आदित्य के अतिरिक्त कोई कालसंख्या नहीं हो सकती। काल के विना कोई नियम नहीं है। निर्दिष्ट काल में ही सभी अनुष्ठानादि सम्पन्न होते हैं। काल के अभाव में अग्नि की कोई विहरण क्रिया भी नहीं है अर्थात् निर्दिष्ट काल में ही अग्नि में आहुति प्रदान की जाती है॥७-८॥
ऋतूनामभिभावाच्च पुष्पं मूलं फलं कुतः।
कुतश्च सस्यनिष्पत्तिः तृणौषधिगणाः कुतः ॥९॥
अभावो व्यवहाराणां जन्तूनां दिवि चेह च।
जगत्प्रतानमृते भास्करे वारितस्करम् ॥१०॥
ऋतुओं का आविर्भाव हुये विना फूल, मूल, फल कैसे उत्पन्न होंगे? कैसे शस्यादि तृण, औषधिगण उत्पन्न होंगे? उसके अभाव से जगत् में प्राणीगण तथा स्वर्ग लोक में देवगण के खाद्य का अभाव परिलक्षित होने लगेगा। जगत् को ताप न देकर भास्कर अपनी रश्मि संहत कर लेंगे। (जब रश्मियाँ संहत हो जायेंगी तब पानी वाष्प होकर कैसे मेघरूप में सञ्चित होगा)॥९-१०॥
नावृष्ट्या तपते सूर्यो नावृष्ट्या परितुष्यति।
नावृष्ट्या परिषध्यन्ते वारिणा दीयते रविः ॥११॥
वृष्टिपात के विना सूर्य ताप नहीं देते, वृष्टिपात के विना उनकी तुष्टि नहीं होती, वृष्टिपात के विना उनकी सिद्धि नहीं होती, जल के द्वारा ही रवि दान करते हैं॥११॥
वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मकाञ्चनसन्निभः।
श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुः शरदि भास्करः ॥१२॥
हेमन्ते ताम्रवर्णस्तु शिशिरे लोहितो रविः।
इति वर्णा समाख्याताः सूर्यस्य ऋतुसम्भवाः।
ऋतुस्वभावजैर्वर्णैः सूर्यः क्षेमे सुभिक्षकृत् ॥१३॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यनिगमनं नामाऽष्टमोऽध्यायः
अष्टमोऽध्यायः ४३
अष्टमोऽध्यायः ४३
वसन्तकाल में सूर्य कपिलवर्ण, ग्रीष्म में स्वर्णतुल्य वर्ण, वर्षा में श्वेतवर्ण, शरत् काल में पाण्डुवर्ण धारण करते हैं। हेमन्त काल में सूर्य ताम्रवर्ण एवं शिशिर में लोहित-वर्ण हो जाते हैं। इस प्रकार सूर्य की प्रति ऋतु में वर्णकला का वर्णन किया गया। प्रति ऋतु में उन-उन वर्ण से रञ्जित होकर सूर्य शोभित होते हैं। यदि ऋतुओं का आविर्भाव न हो तब सूर्य अपने गृह में भिक्षुक के समान श्रीहीन प्रतीत होते हैं॥१२-१३॥
श्रीसाम्बपुराण में सूर्य-निगमन नामक अष्टम अध्याय समाप्त
द्वादशापि पृथक्त्वेन तानि वक्ष्याम्यशेषतः॥१॥
नवमोऽध्यायः
(सूर्यनिगमनम्)
नारद उवाच
अथादित्यस्य नामानि सामान्यानीह द्वादश।
द्वादशापि पृथक्त्वेन तानि वक्ष्याम्यशेषतः॥१॥
नारद कहते हैं—अब आदित्य के सामान्य द्वादश नाम कहता हूँ; पृथक् से भी इनके द्वादश नाम कहे गये हैं, अतः उन सबको विस्तृत रूपेण कहता हूँ॥१॥
आदित्यः सविता सूर्यो मिहिरोऽर्कः प्रभाकरः।
मार्त्तण्डो भास्करो भानुश्चित्रभानुर्दिवाकरः॥२॥
रविर्द्वादशकश्चैव ज्ञेयः सामान्यनामभिः।
विष्णुर्धाता भगः पूषा मित्रेन्द्रो वरुणोर्यमाः॥३॥
विवस्वानांशुमांस्त्वष्टा पर्जन्यो द्वादशः स्मृतः।
इत्येते द्वादशादित्याः पृथक्त्वेन प्रकीर्त्तिताः॥४॥
आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रभाकर, मार्त्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा रवि—ये १२ सूर्य के साधारण नाम हैं। इसके अतिरिक्त विष्णु, धाता, भग, पूषा, मित्र, इन्द्र, वरुण, यम, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा तथा पर्जन्य—ये १२ भी अलग से आदित्य के नाम कहे गये हैं॥२-४॥
उत्तिष्ठन्ति सदा ह्येते मासैर्द्वादशभिः क्रमात्।
विष्णुस्तपति चैत्रे तु वैशाखे चार्यमा तथा॥५॥
विवस्वान् ज्येष्ठमासे तु आषाढ़े चांशुमान् स्मृतः।
पर्जन्यः श्रावणे मासे वरुणः प्रोष्ठसंज्ञके॥६॥
इन्द्राख्यश्चाश्विने मासे धाता तपति कार्तिके।
मार्गशीर्षे तपेन्मित्रः पौषे पूषा दिवाकरः॥७॥
माघे भगस्तु विज्ञेयस्त्वष्टा तपति फाल्गुने।
एतैर्द्वादशभिर्विष्णूरश्मिभिर्दीप्यते सदा॥८॥
ये क्रमानुसार सर्वदा द्वादश मास में प्रकट होते हैं। चैत्र मास में विष्णु नामक सूर्य ताप प्रदान करते हैं। वैशाख में अर्यमा, ज्येष्ठ में विवस्वान्, आषाढ़ में अंशुमान्, श्रावण में पर्जन्य, भाद्र में वरुण, आश्विन में इन्द्र, कार्तिक में धाता, अग्रहायण में मित्र ताप प्रदान
नवमोऽध्यायः ४५
नवमोऽध्यायः ४५
करते हैं। पौष मास में पूषा, माघ में भग तथा फाल्गुन में त्वष्टा नामक सूर्य ताप देते हैं। यह द्वादशरूप विष्णुरश्मि द्वारा सदा दीप्त होते हैं॥५-८॥
दीप्यते गोसहस्रेण शतैश्च त्रिभिरर्यमा।
द्विसप्तकैर्विवस्वांस्तु ह्यंशुमान् पञ्चकैस्त्रिभिः ॥९॥
विवस्वानिव पर्जन्यो वरुणश्चार्यमा तथा।
इन्द्रस्तु द्विगुणैः षड्भिर्धतैकादशभिः शतैः ॥१०॥
मित्रस्तु दशभिः सार्द्धः पूषा तु दशभिः शतैः।
मित्रवच्च भगस्त्वष्टा सहस्रेण शतेन च ॥११॥
३०० किरणों द्वारा अर्यमा दीप्त होते हैं। १४०० किरणों से विवस्वान् तथा १५०० किरणों से अंशुमान दीप्त होते हैं। विवस्वान् के ही समान (१४०० किरणों से) पर्जन्य, वरुण तथा अर्यमा दीप्त होते हैं। किन्तु इन्द्र १२०० किरणों से, धाता ११०० किरणों से, मित्र १५०० किरणों से एवं एक हजार किरणों से ही पूषा दीप्त होते हैं। भग १५०० किरणों से तथा सहस्र-शत किरणों से त्वष्टा दीप्त होते हैं॥९-११॥
उत्तरोपक्रमेऽर्कस्य वर्धन्ते रश्मयस्तथा।
दक्षिणोपक्रमे तस्य ह्रसन्ते सूर्यरश्मयः ॥१२॥
एवं रश्मिसहस्रं तत् सूर्यलोकार्थसाधकम्।
भिद्यते ऋतु-मासाद्यैः सहस्रं बहुधा पुनः ॥१३॥
एवं नाम्ना चतुर्विंशतिरेषा च प्रकीर्त्तिता।
विस्तरेण सहस्रं तु पुनरन्यत् प्रकीर्त्तितम् ॥१४॥
उत्तरायणं में सूर्य की रश्मि वृद्धि को प्राप्त होती है एवं दक्षिणायन में उसका ह्रास होता है। इस प्रकार की सहस्र रश्मि से सूर्यलोक के प्रयोजन-साधक ऋतु-मासप्रभृति में भेद होता है और भी बहुरूप सहस्र भेद प्राप्त होते हैं। इस प्रकार चौबीस नाम सूर्य के कहे गये हैं। विस्तृत रूप से और भी १००० नाम कहे गये हैं॥१२-१४॥
अथ चैषां पुनर्नाम्नां धात्वर्थनिगमं शृणु।
दिव्यानां पार्थिवानां च वंशानामिह सर्वशः ॥१५॥
अदनान्नित्यमादित्यस्तपसां तेजसामयम्।
अदितेर्वा सुतो यस्मान्निगमज्ञैरुदाहृतः ॥१६॥
अपत्यप्रत्ययात्तस्मात् सूर्यस्यादित्यता स्मृता ॥१७॥
अब इन नामों की धातु तथा अर्थगत व्युत्पत्ति को सुनो। दिव्य तथा पार्थिव नामों को सर्वतोभावेन (अर्थयुक्त) सुनो। ये तपस्या तथा तेज का ग्रहण करने वाले (भक्षणकारी) हैं; अतः आदित्य हैं। अथवा देवमाता अदिति के पुत्र होने के कारण वेदविद् इन्हें आदित्य
४६ श्रीसाम्बपुराणम्
कहते हैं। अदिति के पुत्र इस अर्थ में अपत्यार्थ ‘ण्य’ प्रत्यय के योग से इनका नाम आदित्य कहा गया है॥१५-१७॥
स्रवन्ति स्यन्दनार्थे च धातुरेषा निपात्यते।
स्रवणात्तेजसोऽब्द्वा च तेनासौ सविता स्मृतः॥१८॥
शश्वच्च जायते यस्माच्छश्वत् संतिष्ठते यतः।
तस्मात् सर्वैः स्मृतः सूर्यो निगमज्ञैर्मनीषिभिः॥१९॥
प्रसव करना तथा क्षरित होना अर्थ में (सू) धातु निपातन से एवं साक्षात् तेज के क्षरणार्थ इन्हें सविता कहते हैं। जिससे निरन्तर प्राणिगण उत्पन्न होते हैं और जिनके कारण जीवगण अवस्थान करते हैं; अतः सभी वेदज्ञों ने इन्हें सूर्य कहा है॥१८-१९॥
नुदिति प्रेरणे धातुर्भादीप्तौ चैव कीर्त्तितः।
नोदनात् कारणादासां भानुरित्यभिधीयते॥२०॥
‘नु’ शब्द के प्रेरण एवं ‘भा’ धातु के ‘दीप्ति पाना’ अर्थ से, रश्मिसमूह का प्रेरण तथा दीप्ति प्राप्त करने के कारण इन्हें भानु कहा गया है॥२०॥
चित्रा हि भानवो यस्य वर्णैः शुक्लादिभिर्यतः।
भानवो रश्मयः प्रोक्ताश्चित्रभानुस्ततः स्मृतः॥२१॥
भास्वतस्तु करा ह्यस्य भासोऽत्यर्थं करोति च।
भासृ दीप्तौ स्मृतो धातुर्भास्करस्तेन स स्मृतः॥२२॥
चित्र अर्थात् जिनकी शुक्लादि अनेक वर्ण की रश्मियाँ हैं, (यहाँ भानु शब्द से रश्मि का तात्पर्य है) इसलिये उन्हें चित्रभानु कहते हैं। जिनके किरणसमूह उज्ज्वल हैं, जो अत्यन्त दीप्ति प्रदान करते हैं। ‘भा’ धातु का दीप्ति अर्थ है; अतः इन्हें भास्कर शब्द से कहा जाता॥२१-२२॥
भा दीप्तावित्ययं धातुश्चोपसर्गेण योजितः।
भास्करोति प्रकर्षेण यस्मात्तस्मात् प्रभाकरः॥२३॥
दिवेति चाव्ययं लिङ्गं पठ्यते सूरिभिः सदा।
दिवा करोति यस्माच्च तस्मादेव दिवाकरः॥२४॥
‘भा’ धातु दीप्ति अर्थ में उपसर्ग के साथ युक्त है। प्रकर्षरूपेण जो दीप्ति दान करते हैं, अतः सूर्य का नाम प्रभाकर नाम है। दिवा शब्द को पण्डितगण अव्यय लिङ्ग में कहते हैं; क्योंकि दिन करते हैं, इसलिये वे दिवाकर हैं॥२३-२४॥
अवति त्रीनिमांल्लोकान् यस्मादेष परिभ्रमन्।
अवेति रक्षणे धातुरवनात् सविता स्मृतः॥२५॥
नवमोऽध्यायः ४७
नवमोऽध्यायः ४७
क्योंकि यह सूर्य परिभ्रमण करके लोकत्रय की रक्षा करते हैं। रक्षणार्थ ‘अव’ धातु होता है। रक्षा करने के कारण इनको सविता कहते हैं।।२५।।
देवैरभ्यर्चितो यस्मात्तस्मादर्कः स उच्यते।
अण्डे द्विधा कृते ह्यार्त्तं दृष्ट्वा स्नेहात्पिताऽब्रवीत्।
आर्त्तो मा भव देवेश मार्त्तण्डस्तेन स स्मृतः॥२६॥
देवगण उनकी अर्चना करते हैं, तभी वे अर्क हैं। अण्ड को दो भाग में विभक्त होने पर उन्हें आर्त देखकर पिता ने स्नेह से कहा—हे देवेश! तुम आर्त न हो। तभी उनको मार्तण्ड कहा जाने लगा।।२६।।
यस्माद् धारयते लोकान् भूमिं तेषां ददाति च।
डुधाञ् धारणे धातुस्तस्माद् धाता स उच्यते॥२७॥
क्योंकि लोकों को धारण करते हैं तथा उन्हें भूमिदान करते हैं। धा धातु (डुधाञ्) का अर्थ है—धारण करना। तभी उन्हें धाता कहा जाता है।।२७।।
अचि प्रत्ययपूर्वस्य ऋधातोर्यनिनिपात्यते।
गतौ यस्मात् परो नास्ति तेन सूर्योऽर्यमा स्मृतः॥२८॥
ऋ धातु के गमनार्थक य (ऋ + मन्—कनिन्) प्रत्यय के अर्थ में, जो गमन करते हैं अथवा जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। इस अर्थ में सूर्य को अर्यमा कहा गया है।।२८।।
स्नेहेन सर्वभूतानि यस्मात् त्रायति भास्करः।
ञिमिधा स्नेहने धातुस्तस्मान्मित्रः स उच्यते॥२९॥
भास्कर स्नेहवशात् सभी प्राणियों की विपत्ति से रक्षा, त्राण करते हैं। मिद् धातु का अर्थ है—स्नेह, इसलिये इन्हें मित्र कहा गया है।।२९।।
वरान् विवृणवतो देवान् वरदो हि वरार्थिनाम्।
धातुर्वृङ् वरणे प्रोक्तस्तेनासौ वरुणः स्मृतः॥३०॥
वरप्रार्थी देवगण सर्वदा जिनसे वर माँगते रहते हैं, जो उनके लिये वरद हैं, वृ (वृञ्) धातु का अर्थ है—वरण। इसलिये ये वरुण कहे गये हैं।।३०।।
ऐश्वर्यं परमं यस्य पन्नगाश्च सुरासुराः।
ईद्दिश्च परमैश्वर्ये धातुरिन्द्रस्ततस्तु सः॥३१॥
सभी देवता, असुर तथा पन्नगगण जिनके परम ऐश्वर्य हैं, यहाँ इदि धातु का ऐश्वर्य अर्थ है, अतः ये इन्द्र नाम से ख्यात हैं।।३१।।
शक्तोऽयं जगतः कर्तुं सर्गानुग्रहसंग्रहान्।
शक्लृ शक्तौ स्मृतो धातुः शक्रस्तेन स उच्यते॥३२॥
४८ श्रीसाम्बपुराणम्
ये जगत् की सृष्टि-स्थिति-विनाश करने में सक्षम हैं, शक् धातु का अर्थ है—समर्थ; अतः इन्हें शक्र कहा गया है॥३२॥
वसत्यदृष्टः सर्वेषु भूतेष्वन्तर्हितो रविः।
धातुर्वस निवासेति विवस्वांस्तेन तूच्यते ॥३३॥
रवि सभी प्राणियों के अभ्यन्तर में अदृश्य तथा अन्तर्हित होकर वास करते हैं। 'वस' धातु का अर्थ है—निवास। इसलिये इनका नाम विवस्वान् कहा गया है॥३३॥
गर्जशब्दे प्रपूर्वस्य धातोः पर्जन्निपातके।
गर्जत्यतीव यस्माच्च तस्मात् पर्जन्य उच्यते ॥३४॥
प्रपूर्वक गर्ज धातु के निपात से पर्जन शब्द निष्पन्न होता है, क्योंकि वे अत्यन्त गर्जन करते हैं, इसलिये इन्हें पर्जन्य नाम से कहा गया है॥३४॥
यस्मात् सिञ्चति लोकांस्त्रीन् भूर्भुवःस्वोऽमृतादिभिः।
पुष पुष्टौ स्मृतो धातुस्तस्मात् पूषा स उच्यते ॥३५॥
अमृतादि द्वारा भू-भुवः तथा स्वः—इन लोकत्रय का सिञ्चन (पोषण) करते हैं। पुष धातु का अर्थ है—पुष्टि (पोषण करना); इस कारण उनको पूषा कहते हैं॥३५॥
अंशु व्याप्तावयं धातुः प्रियश्चापानुरागतः।
सूर्यो व्याप्तं जगद् यस्मात्तस्मादंशुः स उच्यते ॥३६॥
अंशु धातु का अर्थ है—व्याप्ति एवं प्रीति तथा अनुरागवशात् सूर्य समस्त जगत् को व्याप्त करते हैं; अतः उनको अंशु कहा जाता है॥३६॥
सेव्यते यः सुरैः सर्वैः भांश्चैव भजते यतः।
धातुर्भजेति सेवायां तेनासौ भग उच्यते ॥३७॥
सकल देवगण के द्वारा जो सेवित होते हैं, क्योंकि ये किरणसमूह का भजन करते हैं। भज धातु का अर्थ है—सेवा; अतः यह सूर्य भग नाम से उक्त हैं॥३७॥
तुष तुष्टौ स्मृतो धातुस्तस्मात् त्वष्टा निपात्यते।
सृजत्येष प्रजास्तुष्टस्त्वष्टा तेन स उच्यते ॥३८॥
तुष धातु का अर्थ तुष्टि है। उससे त्वष्टा शब्द का निपातन होता है। ये तुष्ट होकर प्रजागण की सृष्टि करते हैं; अतः इन्हें त्वष्टा कहा गया है॥३८॥
यस्माद्विश्वमिदं सर्वमादित्येनेह रश्मिभिः।
विष्ऌ व्याप्तौ स्मृतो धातुस्तस्माद्विष्णुः स उच्यते ॥३९॥
आदित्य अपनी रश्मि द्वारा इस समस्त विश्व को व्याप्त करते हैं; विष्ऌ धातु का व्याप्ति अर्थ है, तभी वे विष्णु हैं॥३९॥
नवमोऽध्यायः ४९
नवमोऽध्यायः ४९
बृहदस्य शरीरं यदप्रमेयं प्रमाणतः।
बृहद्विस्तीर्णमित्युक्तं ब्रह्मा तेन स उच्यते ॥४०॥
इनका बृहद् शरीर परिमाण में अप्रमेय है; बृहद् का अर्थ है—विस्तीर्ण। अतः वे ब्रह्मा कहे जाते हैं॥४०॥
पूज्यन्ते च सुरैः सर्वैर्महांश्चैव प्रमाणतः।
धातुर्मह तु पूजायां महादेवस्ततः स्मृतः॥४१॥
समस्त देवताओं से जो पूजित होते हैं तथा प्रमाणतः जो महान् हैं। मह धातु का अर्थ है—पूजा; अतः वे महादेव कहे गये हैं॥४१॥
सन्निवर्हति यद्वीक्षेद् यदुग्रो यत् प्रतापवान्।
मांस-शोणित-मज्जादौ यत्ततो रुद्र उच्यते ॥४२॥
जो निर्वाह करते हैं, जो देखते हैं, जो उग्र तथा प्रतापवान हैं, जो मांस, रक्त, मज्जादि में वर्त्तमान हैं, इसलिये वे रुद्र कहे जाते हैं॥४२॥
यस्मात् सृष्ट्यनुगृह्लीते गृह्यते चैव यत् पुनः।
गुणात्मना तु त्रैकाले तस्मादेकः स उच्यते ॥४३॥
जो गुणात्मस्वरूप है (सत्त्व, रज, तमरूप); जो सृष्टि तथा अनुग्रह करते हैं, पुनः ग्रहण करते हैं (लय करते हैं); इसीलिये उनको त्रैकाल कहा जाता है॥४३॥
अयं परमयं नेति ब्रुवन्ते भिन्नदर्शनाः।
तामसान् मूढभावाच्च दृष्ट्वा तान् विब्रुवन्ति च॥४४॥
भिन्न दर्शन वाले इन्हें 'हैं, नहीं हैं'—इत्यादि से कहते हैं। तामस तथा मूढ़ भाव वाले ऐसा कहते हैं॥४४॥
ब्रह्मणः कारणः केचित् केचिदाहुर्दिवाकरम्।
केचिद्भक्तिपरत्वेन त्वाहुः विष्णुं तथापरे ॥४५॥
कारणं तु स्मृता होते नानार्थेषु सुरोत्तमाः।
एकः स तु पृथक्त्वेन स्वयम्भुरिति विश्रुतः॥४६॥
कुछ लोग सूर्य को ही ब्रह्मा की उत्पत्ति में कारण मानते हैं, तो कुछ लोग भक्ति के वशीभूत होकर विष्णु को कारण मानते हैं। ये देवश्रेष्ठगण नाना अर्थ में 'कारण' कहे गये हैं। वे इन सबसे पृथक् रूप से अकेले ही स्वयम्भु हैं॥४५-४६॥
यथानुरुध्यते वर्णैर्विचित्रैः स्फटिको मणिः।
तथा गुणवशात्तस्य स्वयम्भोरनुरञ्जनात् ॥४७॥
जैसे स्फटिक मणि विचित्र वर्णाभा से युक्त होती है, वैसे ही गुणवशतः अनुरञ्जन हेतु वे स्वयम्भु नाना रूप से युक्त होते हैं॥४७॥
५० श्रीसाम्बपुराणम्
एको भूत्वा महामेघः पृथक्त्वेनावतिष्ठते।
वर्णतो रूपतश्चैव यथा गुणवशानुगः॥४८॥
जैसे महामेघ एक होने पर भी गुणवशात् वर्ण तथा रूपभेद से पृथक्-पृथक् रूप से अवस्थित रहता है, वैसे ही एक स्वयम्भु सूर्य गुणवशतः पृथक्-पृथक् रूप से प्रतीत होते हैं॥४८॥
नभसः पतितः तोयं याति तोयान्तरं यथा।
भूमे रसविशेषेण तथा गुणवशात्तु सः॥४९॥
जैसे आकाश से पतित जल भूमि तथा विशेष रस के साथ युक्त होकर अन्न-जलरूप में प्रतीत होता है, वैसे ही वे गुणवशात् पृथक् रूप में प्रतीत होते हैं॥४९॥
यथा दिव्यविशेषाद्वा वायुरेकः पृथग् भवेत्।
दुर्गन्धो वा सुगन्धो वा तथा गुणवशात्तु सः॥५०॥
जैसे आकाश में अविशेष एक वायु दुर्गन्ध अथवा सुगन्धभेद से पृथक् होती है, वैसे ही गुणवशात् वह सूर्य पृथक् रूपेण प्रतिभात होता है॥५०॥
यथा वा गार्हपत्योऽग्निरन्यत्संज्ञान्तरं व्रजेत्।
दक्षिणााहवनीयादि ब्रह्मादिषु तथा ह्यसौ॥५१॥
जैसे एक गार्हपत्य अग्नि दक्षिण, आहवानीयादि भेद से पृथक् संज्ञायुक्त हो जाती है, वैसे ही एक सूर्य ब्रह्मादि विविध नाम से अभिहित होते हैं॥५१॥
एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्।
तस्माद्भक्तिः परा कार्या देवे ह्यस्मिन् दिवाकरे॥५२॥
एकत्व तथा पृथक्त्व का यही कारण है। अतएव दिवाकर की परम भक्ति करना ही उचित है॥५२॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः।
एष वेदाश्च यज्ञाश्च स्वर्गश्चैव न संशयः॥५३॥
ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही समस्त वेद, यज्ञ तथा स्वर्गलोक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है॥५३॥
सूर्यव्याप्तमिदं विश्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
अद्यते पीयते चैव अन्नपानात्मको रविः॥५४॥
स्थावर-जङ्गमात्मक यह समस्त विश्व सूर्य से ही व्याप्त है। ये ही भक्षित तथा पीत होते हैं। अन्नपानात्मक रवि यही हैं॥५४॥