भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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६६ श्रीसाम्बपुराणम्

यथा विद्याधरा नागा यक्षराक्षसपन्नगाः।
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे शिरोभिः प्रणता रविम् ॥१५॥
ऊचिरे विविधा वाचो मनःश्रोत्रसुखावहाः।
सह्यं भवतु तेजस्ते भूतानां भूतभावन! ॥१६॥

विद्याधर, नाग, यक्ष, राक्षस, पन्नग सभी अञ्जलिबद्ध होकर रवि का मन तथा कानों को सुखावह लगने वाले विचित्र स्तोत्र पढ़ने लगे। हे भूतभावन! आपका तेज सभी प्राणीगण सहन कर सकें॥१५-१६॥

ततो हाहा हूहूश्चैव तुम्बुरुर्नारदस्तथा।
उपगायितुमारब्धा गन्धर्वकुशला रविम् ॥१७॥
षड्ज-मध्यम-गान्धार-ग्रामत्रय-विशारदाः ।
मूर्च्छनाभिश्च तालैश्च सम्यारितशकैशिकैः ॥१८॥

तदनन्तर हाहा, हूहू, तुम्बुरु तथा नारद स्तुति करने लगे। गन्धर्वकुशल गण रवि-सम्बन्धित गायन गाने लगे। षड्ज, मध्यम, गान्धार, ग्रामत्रय में जो विशारद थे, वे मूर्च्छना तथा ताल के संयोग से गायन करने लगे॥१७-१८॥

विश्वाची च घृताची च ह्युर्वशी च तिलोत्तमा।
मेनका च सुजन्या च रम्भा चाप्सरसां वरा ॥१९॥
उपनर्त्तितुमारब्धा लिख्यमानं विभावसुम्।
हावभावविलासैश्च कुर्वन्त्योऽभिनयान् बहून् ॥२०॥

विश्वाची, घृताची, उर्वशी, तिलोत्तमा, मेनका, सुजन्या तथा अप्सरागण में श्रेष्ठ रम्भा नृत्य आरम्भ करके मसृणता-प्राप्त विभावसु के उद्देश्य से हाव-भाव-विलास के द्वारा अनेक अभिनय करने लगीं॥१९-२०॥

ततः तीब्रलयं गेयं मधुरं चाभ्यवर्त्तत।
सर्वेषामेव देवानां मनःश्रोत्रसुखप्रदम् ॥२१॥

तत्पश्चात् अति मधुर अव्यक्त कलकल ध्वनि उत्थित होने लगी, जो सभी देवताओं के मन तथा कर्ण के लिये सुखप्रद थी॥२१॥

प्रवाद्यन्तः ततस्तन्त्री-वीणा-देवादिदर्दुरा।
पणवाः पुष्कराश्चैव मृदङ्गाः पटहास्तथा ॥२२॥
देवदुन्दुभयः शङ्खः शतशोऽथ सहस्रशः।
गायद्भिश्चैव गन्धर्वैर्नृत्यद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥२३॥
तूर्यवादित्रघोषैश्च सर्वं कोलाहलीकृतम् ॥२४॥