भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 424 में से

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पृष्ठ 78

त्रयोदशोऽध्यायः

(विश्वकर्मणः सूर्यस्तुतिः)

साम्ब उवाच
तस्मिन् काले भ्रमे रूपे लिख्यमानो दिवस्पतिः।
ब्रह्मादिभिर्यथा देवः स्तुतो वै तद्वदस्व मे ॥१॥
साम्ब पूछते हैं—घूर्णि चक्र से जब सूर्यदेव मसृण हो गये, तब ब्रह्मादि देवगण ने जैसे उनकी स्तुति की, वह कहिये॥१॥

नारद उवाच
ततो लिखितुमारब्धः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
विश्वकर्माथ मार्तण्डः स्तोत्रेणानेन संस्तुवन् ॥२॥
नारद कहते हैं—तदनन्तर विश्वकर्मा प्रहृष्ट अन्तःकरण से मार्त्तण्ड की यह स्तुति करते-करते उनको मसृण करने का कार्य करने लगे॥२॥

विश्वकर्मोवाच
प्रयलतः प्रणतहितानुकम्पिने मरुत्वतः समनवसप्तसप्तये।
विवस्वते कमलकुलावबोधिने नमस्तमःपटलपटावपाटिने ॥३॥
पावनाय शुचिपुण्यकर्मणे नैककामविषयप्रदायिने।
भास्वरामलमयूखमालिने सर्वलोकहितकारिणे नमः ॥४॥
अजाय लोकत्रयकारणाय भूतात्मने गोपतये वृषाय।
नमो महाकारुणिकोत्तमाय सूर्याय सर्वप्रभवाप्ययाय ॥५॥
विश्वकर्मा कहते हैं—जिनकी अनुकम्पा प्रणत जनों के लिये रहती है, मनुगण के साथ जो ४९ मरुत् रूपेण अवस्थित हैं, जो कमलों की निद्रा भंग करने वाले हैं (सूर्य के उदय से कमल खिलते हैं), गाढ़ अन्धकाररूप पर्दे को जो हटाने वाले हैं, उन विवस्वान् को हम प्रणाम करते हैं। जो पवित्र करने वाले, शुचि तथा पुण्यकर्मा हैं, बहुत-सी कामनाओं को फलित—पूर्ण करने वाले हैं, उज्ज्वल-निर्मल किरण वाले, सर्वजनहितकारी सूर्यदेव को नमस्कार करता हूँ। जो अज, त्रिभुवन के कारणरूप, प्राणियों के आत्मस्वरूप, गौ (किरणों) के रक्षक, प्रसिद्ध कामवर्षणकारी, महाकारुणिकों में श्रेष्ठ, सबकी उत्पत्ति तथा विनाश के कारण हैं, उन सूर्यदेव को नमस्कार है॥३-५॥