साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः ६९
विवस्वते ज्ञानभृदन्तरात्मने जगत्प्रतिष्ठाय जगद्धितैषिणे।
स्वयम्भुवे लोकसमस्तचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे नमः ॥६॥
जो ज्ञानियों की अन्तरात्मा, जगत् के प्रतिष्ठारूप, जगत् के हितकामी, स्वयम्भू, समस्त लोकों के चक्षुरूप, देवश्रेष्ठ, असीम तेजोरूप सूर्यदेव हैं, उनको नमस्कार है॥६॥
क्षणमुदयाचलमौलिमणिः सुरगणवन्द्योऽपि हितो जगतः।
त्वमुरुमयूखसहस्रवपुर्जगति विभाति तमोसि नुदन् ॥७॥
तव तिमिरासवपानमदाद् भवति विलोहितविग्रहता।
तिमिरविभासि यतः सुतरां त्रिभुवनभावनतीक्ष्णकरैः ॥८॥
क्षण काल के लिये उदय पर्वत शिखर के मणिरूप, सुरगण से पूजित होने पर भी जगत् का हित करने वाले हे सूर्य! आप सहस्रों किरणयुक्त शरीर से अन्धकार दूर करते हैं और जगत् प्रकाशित होता है। तिमिररूप मद्यपान से मत्ततावशात् आपकी देह रक्तवर्ण हो गयी है, अतएव हे तिमिर! आप अपनी त्रिभुवन-प्रकाशक तीव्र किरणों से अधिक रूप से प्रकाशित हो रहे हैं॥७-८॥
रथमधिरुह्य समावयवैः परिविधिकल्पितभूरुचिरम्।
सततमखिन्नहयैर्भगवंश्चरसि जगत् स्थितयेऽविरतम् ॥९॥
अमृतसुधादिरसेन समं सुरगणभूतगणेन समम्।
प्रणिपतितैकपदं त्रितयं शुकसमवर्णहयप्रथितम् ॥१०॥
तव पदपांसुपवित्रतमं ह्यभिरतवत्सल मां प्रणतम्।
त्रिभुवनपावनपाहि रवे विविधगदार्त्तियुतं सततम् ॥११॥
इति श्रीसाम्बपुराणे विश्वकर्मणः सूर्यस्तुतिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः
हे भगवन्! समान अवयवयुक्त अक्लान्त अश्वगण द्वारा पृथ्वी पर सुन्दर परिधि की रचना करते हुये रथ पर सवार होकर निरन्तर जगत् की स्थिति के लिये आप विचरण करते हैं। अमृत तथा सुधारस के तुल्य, सुरगण तथा भूतगण के समान, एक पद में प्रणिपतित त्रितयरूप, शुक के समान जिनके अश्व हैं, ऐसे आप प्रसिद्ध हैं। हे भक्तवत्सल! त्रिभुवनपावन रवि! आप अपनी चरणधूलि से पवित्रतम, प्रणत नानारोग से ग्रस्त मेरा सतत पालन करिये॥९-११॥
श्री साम्बपुराण में विश्वकर्मकृत सूर्यस्तुतिनामक त्रयोदश अध्याय समाप्त