भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

चतुर्दशोऽध्यायः

(ब्रह्मभाषितः स्तवः)

श्रीसाम्ब उवाच

भूयोऽपि कथय त्वं मां कथां सूर्यसमागताम्।
न तृप्तिमधिगच्छामि कथां शृण्वन्त्रिमां शुभाम् ॥१॥

श्री साम्ब कहते हैं—आप सूर्य से सम्बन्धित और प्रसङ्ग कहिये। इस शुभकर बात को सुनने से मुझे तृप्ति नहीं मिलती॥१॥

नारद उवाच

आदित्यस्य कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम्।
वक्ष्यामि कथिता पूर्वं ब्रह्मणा लोकभाविना ॥२॥
ऋषयः परिपृच्छन्ति ब्रह्मलोके पितामहम्।
तापिताः सूर्यकिरणैः ऋषयोऽज्ञानमोहिताः ॥३॥

नारद कहते हैं—लोकस्रष्टा ब्रह्मा के सर्वपापनाशक आदित्य की दिव्य कथा को कहता हूँ। इसे पूर्व में ऋषिगणों ने ब्रह्मलोक में पितामह से पूछा था। वे ऋषिगण सूर्यकिरणों से तप्त तथा अज्ञानमोहित थे॥२-३॥

ऋषय ऊचुः

कोऽयं दीप्तो महातेजा वह्निरश्मिसमप्रभः।
एतद्वेदितुमिच्छामः प्रभवोऽस्य कुतः प्रभो ॥४॥

ऋषिगण कहते हैं—अग्निशिखा-तुल्य यह दीप्त महातेज-युक्त कौन है? यह हम जानना चाहते हैं। हे प्रभु! इनकी उत्पत्ति कहाँ से है?॥४॥

ब्रह्मोवाच

ततो भूतेषु सर्वेषु नष्टे स्थावरजङ्गमे।
प्रवृत्ते गुणहेतुत्वे पूर्वं बुद्धिरजायत ॥५॥

ब्रह्मा कहते हैं—स्थावर-जंगम समस्त प्राणी के लय प्राप्त होने पर गुणों (सत्व-रजः-तमोगुण) के कारण सबसे पहले बुद्धि उत्पन्न होती है॥५॥

अहङ्कारस्ततो जातो महाभूतप्रवर्त्तकः।
वाय्वग्निजलखंभूमिस्ततस्त्वण्डमजायत ॥६॥