सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिस मनुष्य ने अपने में इन नैतिक गुणों को विकसित कर लिया, उसने अपने ज्ञान चक्षु से अच्छा-बुरा समझना सीख लिया, उसका ही मनुष्य रूप में जीवन लेना सफल रहा, अन्यथा यदि मनुष्य रूप में जन्म लेकर खाने, सोने, डरने और संतान पैदा करने के लिए वह जन्मा है तो पशु समान है। दानार्थिनो मधुकरा यदि कर्णतालैर् दूरीकृताः करिवरेण मदान्धबुद्ध्या। तस्यैव गण्डयुगमण्डनहानिरेषा, भृङ्गाः पुनर्विकचपद्मवने वसन्ति॥ अपने मद से अंधा हुआ गजराज (हाथी) यदि अपनी मंदबुद्धि के कारण, अपने गन्डस्थल (मस्तक) पर बहते मद को पीने के इच्छुक भौरों को, अपने कानों को फड़फड़ाकर भगा देता है तो इसमें भौरों की क्या हानि हुई? अर्थात कोई हानि नहीं हुई। वहां से हटकर वे खिले हुए कमलों का सहारा ले लेते हैं और उन्हें वहां पराग रस भी प्राप्त हो जाता है, परंतु भौरों के न रहने से हाथी के गंडस्थल की शोभा नष्ट हो जाती है॥18॥ यदि कोई रसिक विद्वान किसी धनी व्यक्ति के पास कोई आस लेकर जाए और वह उसे अपमानित करके भगा दे तो इसमें विद्वान का तो कुछ नहीं बिगड़ता, अपितु उस धनी की शोभा ही नष्ट हो जाती है। गुणी व्यक्ति के लिए तो सारा संसार पड़ा है, पर धनी व्यक्ति के घर विद्वान पधारे, यह कोई जरूरी नहीं। राजा वेश्या यमो ह्यग्निस्तस्करो बालयाचको। परदुःखं न जानन्ति अष्टमो ग्रामकंटकाः॥ राजा, वेश्या, यमराज, अग्नि, चोर, बालक, भिक्षु और 180