भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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आठों गांव का कांटा, ये दूसरे के दुःख को नहीं जानते।। 19।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से बताया है कि अग्नि जड़ पदार्थ है, वह तो किसी के दुख-सुख को जान ही नहीं सकता। शेष चेतन भी दूसरों के दुख को न जानकर अपने ही घर को भरने का प्रयत्न करते हैं। राजा जनता को पीड़ित करके भी अपना कोष भरना चाहता है। वेश्या को धन चाहिए, चाहे प्रेमी कहीं से लाकर दे। यमराज प्राणियों को समय आने पर दूसरी योनियों में भेज देता है चाहे परिवार वालों को कितना ही कष्ट हो। चोर को अपनी चोरी मतलब है, वह यह नहीं सोचता कि इस धन को चुराने से उसके स्वामी की क्या दशा होगी? बाल हठ प्रसिद्धि ही है, वह रोने लगता है तो इस बात को नहीं सोचता कि किसका नुकसान होता है। याचक भी अपना ही स्वार्थ सोचता है और ग्राम कण्टक का तो निर्वाह ही ग्रामवासियों को पीड़ा देकर होता है। वह इस बात का आभास नहीं करता कि अपने स्वार्थ के लिए वह लोगों को कष्ट दे रहा है। अधः पश्यसि किं बाले! पतितं तव किं भुवि। रे रे मूर्ख! न जानासि गतं तारुण्यमौक्तिकम्॥ नीचे की ओर देखती एक अधेड़ वृद्ध स्त्री से कोई पूछता है—'हे बाले ! तुम नीचे क्या देख रही हो ? पृथ्वी पर तुम्हारा क्या गिर गया है ?' तब वह स्त्री कहती है—'रे मूर्ख ! तुम नहीं जानते, मेरा युवावस्था रूपी मोती नीचे गिरकर नष्ट हो गया है।' ।।20।। 181