सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंका कोई पतिव्रत धर्म नहीं होता। उन्हें तो केवल अपनी ऐयाशी से मतलब होता है। दूसरे, यदि उस गृहस्वामी का मित्र भी दगाबाज हो, धोखा देने वाला हो तो ऐसा 'मित्र' आस्तीन का सांप होता है। वह कभी भी अपने स्वार्थ के लिए गृहस्वामी को ऐसी स्थिति में डाल सकता है, जिससे उबरना उसकी सामर्थ्य से बाहर की बात होती है, तब वह जीते-जी मर जाता है। तीसरे, घर में यदि नौकर बद्जुबान हो, बात-बात में झगड़ा करने वाला हो, पलटकर तीखा जवाब देने वाला हो तो समझ लेना चाहिए कि ऐसा नौकर निश्चित रूप से घर के भेद जानता है और जो घर के भेद जान लेता है, वह उसी तरह से घर-बार का विनाश कर सकता है, जैसे विभीषण ने घर के भेद देकर रावण का विनाश करा दिया था, तभी मुहावरा भी बना—'घर का भेदी लंका ढाये।' जब घर का ही विनाश हो जाए तो उस घर के गृहस्वामी की स्थिति मरे हुए के ही समान है। चौथे, जिस घर में छिपकर रहने वाले सांप की सम्भावना हो तो गृहस्वामी को निरन्तर यह भय बना रहेगा कि सांप उसे डस न ले। इस प्रकार मृत्यु का भय मृत्यु से भी भयानक होता है। वह शीघ्र ही भय और चिंता से ग्रसित होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार चाणक्य ने राजा अथवा गृहस्वामी को दुष्टा स्त्री, आस्तीन के सांप मित्र, वाचाल नौकर और घर में छिपे सांपों अर्थात दुश्मनों से सदैव सतर्क रहने की शिक्षा इस श्लोक में दी है। भाव यह है कि राजा को अपनी पत्नी, नौकर और मित्र का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना चाहिए ताकि घर में छिपे दुश्मनों का सिर कुचला जा सके। 18 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri