सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥ विपत्ति के समय काम आने वाले धन की रक्षा करें। धन से स्त्री की रक्षा करें और अपनी रक्षा धन और स्त्री से सदा करें॥6॥ संकट के समय धन की जरूरत सभी को होती है इसलिए संकट काल के लिए धन बचाकर रखना उत्तम होता है। धन से अपनी पत्नी की रक्षा की जा सकती है, अर्थात यदि परिवार पर कोई संकट आए तो धन का लोभ नहीं रखना चाहिए, परंतु यदि अपने ही ऊपर कोई संकट आ जाए तो उस समय धन व स्त्री दोनों का बलिदान कर देना चाहिए। चाणक्य का कहना यह है कि यद्यपि परिवार में धन और अपनी स्त्री का सर्वाधिक महत्त्व है किन्तु यदि अपना ही जीवन संकट में पड़ जाए तो वह न तो अपने धन की रक्षा कर पाएगा और न अपनी स्त्री की ही रक्षा कर पाएगा। इससे तो अच्छा यही है कि वह अपने को बचाने के लिए धन और स्त्री का मोह छोड़ दे, अर्थात परिवार की स्त्रियों की लाज बचाने के लिए उन्हें जौहर व्रत का पालन करने की आज्ञा दे देनी चाहिए। अपादर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुतआपदः। कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति। आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करें क्योंकि पता नहीं कब आपदा आ जाए। लक्ष्मी तो चंचल है। संचय किया गया धन कभी भी नष्ट हो सकता है॥7॥ लक्ष्मी का स्वभाव चंचल माना गया है, अर्थात धन आज है, कल नहीं होगा। वह कभी भी साथ छोड़कर जा सकता 19 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri