सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै इसलिए संकटकाल के लिए धन की रक्षा अत्यंत जरूरी है, इसका एक आशय यह भी है कि मनुष्य को सदैव लक्ष्मी का ही विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि लक्ष्मी तो चंचल होती है। उसे अपने पुरुषार्थ और कर्म पर भी भरोसा रखना चाहिए, ताकि लक्ष्मी के साथ छोड़े जाने के बाद वह अपने आपको असहाय अनुभव न करने लगे। यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः। न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत्॥ जिस देश में सम्मान नहीं, आजीविका के साधन नहीं, बन्धु-बांधव अर्थात परिवार नहीं और विद्या प्राप्त करने के साधन नहीं, वहां कभी नहीं रहना चाहिए॥8॥ यह एक सामान्य-सी बात है कि आदमी वहीं रहना पसंद करता है, जहां उसे सम्मान मिले। जीवन-यापन के साधन जहां सुलभ हों, जहां उसके बंधु-बांधव और मित्रगण आदि रहते हों तथा जहां रहकर वह स्वयं और अपने बच्चों को शिक्षित करा सके, अर्थात जहां विद्याध्ययन के अच्छे साधन उपलब्ध हों। जहां ऐसी परिस्थितियां और साधन उपलब्ध नहीं होते, वहां रहने वाले लोग सम्पूर्ण संसार से कटकर जल्दी ही नष्ट हो जाते हैं। धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्॥ जहां धनी, वैदिक ब्राह्मण, राजा, नदी और वैद्य, ये पांच न हों, वहां एक दिन भी नहीं रहना चाहिए। भावार्थ यह कि जिस जगह पर इन पांचों का अभाव हो, वहां मनुष्य को एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिए॥9॥ मनुष्य-जीवन के लोक-परलोक को संवारने में इन 20 .