भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वर्रांगना। विभवो दानशक्तिश्च नाऽल्पस्य तपसः फलम्॥ भोजन करने तथा उसे अच्छी तरह से पचाने की शक्ति हो तथा अच्छा भोजन समय पर प्राप्त होता हो, प्रेम करने के लिए अर्थात रति-सुख प्रदान करने वाली उत्तम स्त्री के साथ संसर्ग हो, खूब सारा धन और उस धन को दान करने का उत्साह हो, ये सभी सुख किसी तपस्या के फल के समान हैं, अर्थात कठिन साधना के बाद ही प्राप्त होते हैं॥2॥ चाणक्य का विश्वास है कि शुद्ध और सुपाच्य भोजन का मिलना और उसे अच्छी तरह पचाने की शक्ति भाग्य से ही मिलती है या फिर अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा ही गरिष्ठ अथवा पौष्टिक भोजन पचाया जा सकता है और अच्छे स्वास्थ्य वाला व्यक्ति ही स्त्री के साथ रति-सुख का आनन्द ले सकता है। स्वस्थ व्यक्ति पूरे उत्साह के साथ धन भी उपार्जित कर सकता है और उसी उत्साह से उसे दान करने की क्षमता भी अपने भीतर उत्पन्न कर सकता है। जो स्वस्थ नहीं है, कमजोर है, जिसकी पाचन क्रिया ठीक नहीं है, जो सदैव बीमार और रोगग्रस्त रहता है, उसे यदि अच्छा भोजन, स्वस्थ और सुंदर युवती तथा विपुल धन-वैभव प्राप्त हो भी जाए तो वह उनका उपयोग नहीं कर सकता। अतः अच्छा स्वास्थ्य साधना के द्वारा ही संभव है। यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दाऽनुगामिनी। विभवे यश्च संतुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि॥ जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो, स्त्री उसके अनुसार चलने वाली हो, अर्थात पतिव्रता हो, जो अपने पास धन से संतुष्ट रहता हो, उसका स्वर्ग यहीं पर है॥3॥ 29 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri