भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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मनुष्य को आज के जीवन में अथवा किसी भी काल में क्या चाहिए? यही कि उसकी संतान उसके कहने में चलती हो, आज्ञाकारी हो। उसकी स्त्री पतिव्रता हो, अर्थात् उसी के प्रति पूरी तरह समर्पित हो और जो धन-वैभव उसे मिला हो, वह उसी पर संतोष धारण किए हो तो उसे किसी स्वर्ग को परलोक में तलाश करने की आवश्यकता नहीं है। वह सुख, वह स्वर्ग तो उसके पास इसी लोक में है। कहने का आशय यही है कि आदमी को सदैव संतोषी होना चाहिए। उसे परमात्मा ने जो दिया है या प्रयत्न से उसने जो कुछ भी अर्जित किया है, वह उसी पर संतोष करे। कहा भी है—'संतोष सबसे बड़ा धन है।' इसी प्रकार यदि उसने अपनी संतान में श्रेष्ठ गुणों का समावेश कराया है तो उसकी संतान निश्चित रूप से आज्ञाकारी होगी। यह स्वभाव भी तभी उत्पन्न होता है, जब उसने अपने बच्चों को भी संतोष करना सिखाया हो। यही स्थिति पत्नी के साथ भी है। पत्नी में यदि कहीं असंतोष की भावना पनप रही है तो वह भावना उसी तक सीमित नहीं रहती, वह उसके बच्चों में भी पनपने लगती है। इस प्रकार असंतोष के जन्म लेते ही सारा परिवार बिखरकर रह जाता है और जो व्यक्ति अपने ही परिवार से अप्रसन्न हो, परेशान हो, वह व्यक्ति धनवान होते हुए भी नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हो जाता है। मूल भाव यही है कि परिवार का पूरा उत्तरदायित्व यदि पिता संभालता है तो निश्चित रूप से उसकी पत्नी तथा उसकी संतान उसकी आज्ञाकारिणी होगी। 30