भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 196 में से

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ते पुत्रा ये पितृर्भक्ताः सः पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥ पुत्र वे ही हैं जो पिता भक्त हैं। पिता वही है जो बच्चों का पालन-पोषण करता है। मित्र वही है जिसमें पूर्ण विश्वास हो और स्त्री वही है जिससे परिवार में सुख-शान्ति व्याप्त हो।।4।। जो पुत्र अपने माता-पिता की सेवा करता है, वही वास्तव में पुत्र कहलाने का अधिकारी है। इतिहास में श्रवण कुमार की पितृ-भक्ति की कथा मिलती है, परंतु यह तभी संभव है, जब पिता भी अपने बच्चों के भरण-पोषण के दायित्व को समझता हो। यदि पिता अपने बच्चों के भरण-पोषण की चिंता न करके अपने ही व्यसनों में लिप्त रहता है तो न तो उसके बच्चे उसका आदर करेंगे और न उसकी पत्नी ही उसके प्रति समर्पित होगी। मित्र की परख बड़ी कठिन है। कठिन स्थितियों में जो बराबर साथ देता है, उसे मित्र समझा जा सकता है। इसके अलावा जिस स्त्री के हाव-भाव से स्नेह की वर्षा होती है, जिसकी वाणी में मिठास होती है, जिसमें गहरी सहनशक्ति होती है, जो हर परिस्थिति में परिवार को संजोए रहती है, जो दुर्दिन में पति की सबसे बड़ी संबल बनी रहती है, जो कुशल गृहिणी के कर्तव्य का पूरा-पूरा पालन करती है, ऐसी पत्नी से घर सुख-शान्ति से भरपूर रहता है। परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥ जो मित्र प्रत्यक्ष रूप से मधुर वचन बोलता हो और पीठ पीछे अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से आपके सारे कार्यों में रोड़ा अटकाता हो, ऐसे मित्र को उस घड़े के समान त्याग देना चाहिए जिसके भीतर विष भरा हो और ऊपर मुंह के पास दूध भरा हो।।5।। 31

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