सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
मनुष्य को आज के जीवन में अथवा किसी भी काल में क्या चाहिए? यही कि उसकी संतान उसके कहने में चलती हो, आज्ञाकारी हो। उसकी स्त्री पतिव्रता हो, अर्थात् उसी के प्रति पूरी तरह समर्पित हो और जो धन-वैभव उसे मिला हो, वह उसी पर संतोष धारण किए हो तो उसे किसी स्वर्ग को परलोक में तलाश करने की आवश्यकता नहीं है। वह सुख, वह स्वर्ग तो उसके पास इसी लोक में है। कहने का आशय यही है कि आदमी को सदैव संतोषी होना चाहिए। उसे परमात्मा ने जो दिया है या प्रयत्न से उसने जो कुछ भी अर्जित किया है, वह उसी पर संतोष करे। कहा भी है—'संतोष सबसे बड़ा धन है।' इसी प्रकार यदि उसने अपनी संतान में श्रेष्ठ गुणों का समावेश कराया है तो उसकी संतान निश्चित रूप से आज्ञाकारी होगी। यह स्वभाव भी तभी उत्पन्न होता है, जब उसने अपने बच्चों को भी संतोष करना सिखाया हो। यही स्थिति पत्नी के साथ भी है। पत्नी में यदि कहीं असंतोष की भावना पनप रही है तो वह भावना उसी तक सीमित नहीं रहती, वह उसके बच्चों में भी पनपने लगती है। इस प्रकार असंतोष के जन्म लेते ही सारा परिवार बिखरकर रह जाता है और जो व्यक्ति अपने ही परिवार से अप्रसन्न हो, परेशान हो, वह व्यक्ति धनवान होते हुए भी नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हो जाता है। मूल भाव यही है कि परिवार का पूरा उत्तरदायित्व यदि पिता संभालता है तो निश्चित रूप से उसकी पत्नी तथा उसकी संतान उसकी आज्ञाकारिणी होगी। 30
ते पुत्रा ये पितृर्भक्ताः सः पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥ पुत्र वे ही हैं जो पिता भक्त हैं। पिता वही है जो बच्चों का पालन-पोषण करता है। मित्र वही है जिसमें पूर्ण विश्वास हो और स्त्री वही है जिससे परिवार में सुख-शान्ति व्याप्त हो।।4।। जो पुत्र अपने माता-पिता की सेवा करता है, वही वास्तव में पुत्र कहलाने का अधिकारी है। इतिहास में श्रवण कुमार की पितृ-भक्ति की कथा मिलती है, परंतु यह तभी संभव है, जब पिता भी अपने बच्चों के भरण-पोषण के दायित्व को समझता हो। यदि पिता अपने बच्चों के भरण-पोषण की चिंता न करके अपने ही व्यसनों में लिप्त रहता है तो न तो उसके बच्चे उसका आदर करेंगे और न उसकी पत्नी ही उसके प्रति समर्पित होगी। मित्र की परख बड़ी कठिन है। कठिन स्थितियों में जो बराबर साथ देता है, उसे मित्र समझा जा सकता है। इसके अलावा जिस स्त्री के हाव-भाव से स्नेह की वर्षा होती है, जिसकी वाणी में मिठास होती है, जिसमें गहरी सहनशक्ति होती है, जो हर परिस्थिति में परिवार को संजोए रहती है, जो दुर्दिन में पति की सबसे बड़ी संबल बनी रहती है, जो कुशल गृहिणी के कर्तव्य का पूरा-पूरा पालन करती है, ऐसी पत्नी से घर सुख-शान्ति से भरपूर रहता है। परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥ जो मित्र प्रत्यक्ष रूप से मधुर वचन बोलता हो और पीठ पीछे अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से आपके सारे कार्यों में रोड़ा अटकाता हो, ऐसे मित्र को उस घड़े के समान त्याग देना चाहिए जिसके भीतर विष भरा हो और ऊपर मुंह के पास दूध भरा हो।।5।। 31
ऐसा मित्र, जो आपके मुंह पर तो मीठी-मीठी और चिकनी-चुपड़ी खुशामदी बातें करता हो और पीठ पीछे आपकी बुराई करता हो, आपके सारे कार्यों में विघ्न डालता हो, उसे तत्काल छोड़ देना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग मित्र नहीं परम शत्रु होते हैं। ऐसे व्यक्ति 'आस्तीन के सांप' होते हैं। वे उसी प्रकार धोखा देने वाले होते हैं, जैसे कोई विष भरे घड़े के मुंह में गर्दन के आस-पास थोड़ा-सा दूध डालकर देने चला आए। वास्तविक मित्र वही होता है जो मुंह पर तो खरी-खोटी सुना देता है पर पीठ पीछे किसी को अपने मित्र की न तो निन्दा करने देता है और न उसके किसी कार्य को बिगाड़ने देता है। न विश्वसेत् कुमित्रे च मित्रे चाऽपि न विश्वसेत्। कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत्॥ बुरे मित्र पर और अपने मित्र पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि कभी नाराज होने पर संभवतः आपका विशिष्ट मित्र भी आपके सारे रहस्यों को प्रकट कर सकता है॥6॥ चाणक्य यहां मित्र के बारे में अत्यन्त सावधानी बरतने की ओर संकेत कर रहे हैं। उनका कहना है कि जो आपका विरोधी है, पर मित्र होने का दावा करता है, उस पर तो कभी विश्वास करना ही नहीं चाहिए। इसके अलावा जो आपका विश्वसनीय मित्र है, उसे भी आपको अपने परिवार तथा अपनी कोई भी बात ऐसी नहीं बतानी चाहिए जो आपको कभी शर्मिन्दा कर सके क्योंकि संभवतः किन्हीं विशेष परिस्थितियों में आपका मित्र यदि आपसे नाराज हो जाए तो वह आपके परिवार तथा आपके जीवन के उन अप्रिय गूढ़तम रहस्यों को प्रकट कर सकता है और आपको अपमानित होने तक की स्थिति में ला सकता है। 32 सम्पूर्ण चाणक्य नीति—2
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्। मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चाऽपि नियोजयेत्॥ मन से विचारे गए कार्य को कभी किसी से नहीं कहना चाहिए, अपितु उसे मंत्र की तरह रक्षित करके अपने (सोचे हुए) कार्य को करते रहना चाहिए॥7॥ अपनी योजना को बता देने से उसका गूढ़ महत्त्व कम हो जाता है। कभी-कभी मित्रगण ही ईर्ष्या के वशीभूत होकर आपको हतोत्साहित करने लग जाते हैं या फिर उसमें रोड़ा अटका देते हैं। वास्तव में आपने स्वयं अपनी योजना के विषय में जितना सोचा-समझा होता है, उतना दूसरे ने नहीं। आप तभी अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, जब आप अपने सोचे हुए कार्य पर अपनी शक्ति के अनुसार स्वयं अमल करें। उसे तब तक छिपाकर रखना चाहिए, जब तक जरूरी न हो जाए। अन्यथा कोई दूसरा ही आपसे पहले उसका लाभ उठा सकता है। कष्टं च खलु मूर्खत्वं कष्टं च खलु यौवनम्। कष्टात्कष्टतरं चैव परगेहनिवासनम्॥ निश्चित रूप से मूर्खता दुःखदायी है और यौवन भी दुःख देने वाला है परंतु कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरे के घर पर रहना है॥8॥ निश्चित रूप से मूर्ख व्यक्ति का समाज में कोई सम्मान नहीं है। विवेकहीन व्यक्ति को पग-पग पर अपमानित होना पड़ता है और परिहास का पात्र बनना पड़ता है। इसी प्रकार यौवन के आने पर भी आदमी कभी-कभी अपना विवेक और आपा खो बैठता है। जवानी में आदमी का जोश और उत्साह तो खूब बढ़ा-चढ़ा होता है, पर वह अपना होश खोए रहता है। उसमें अपनी शक्ति का अहम इस कदर बढ़ जाता है कि उसे अपने सामने वाला व्यक्ति तुच्छ दिखाई देने लगता है। उसका 33
यह अहंकार ही उसे दुःख पहुंचाता है। चाणक्य का कहना है कि किसी को विवशता में जब दूसरे के घर पर निर्भर रहना पड़े तो उसका अपना वर्चस्व समाप्त हो जाता है। उसे दूसरे की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। उसकी स्वाधीनता नष्ट हो जाती है। यही उसके दुःखों का सबसे बड़ा कारण है। शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे। साधवो न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने॥ हर एक पर्वत में मणि नहीं होती और हर एक हाथी में मुक्तामणि नहीं होती। साधु लोग सभी जगह नहीं मिलते और हर एक वन में चंदन के वृक्ष नहीं होते॥9॥ चाणक्य का यहां आशय यही है कि अच्छी चीजें सभी जगह प्राप्त नहीं होतीं। पर्वतशृंखलाओं के मध्य खनिज पदार्थ भरे पड़े हैं। उनमें हीरे-जवाहरातों की खाने भी हैं परंतु सभी पर्वतों में ये प्राप्त नहीं होते। इसी तरह प्रत्येक हाथी के मस्तक में मुक्तामणि नहीं होती, हर एक वन में चन्दन के वृक्ष और सभी जगह साधु अर्थात् सज्जन पुरुष नहीं मिलते। विशेष गुण वाली वस्तुओं को विशिष्ट स्थानों में ही खोजना पड़ता है। पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः। नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥ बुद्धिमान लोगों का कर्त्तव्य होता है कि वे अपनी संतान को अच्छे कार्य-व्यापार में लगाएं क्योंकि नीति के जानकार व सद्व्यवहार वाले व्यक्ति ही कुल में सम्मानित होते हैं॥10॥ आचार्य चाणक्य का विचार है कि माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कारों से युक्त करें, जिससे जीवन में उन्हें कोई कठिनाई न हो। अच्छे और श्रेष्ठ 34 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
संस्कारवान बच्चे ही अपने कुल का नाम रोशन करते हैं। समाज उन्हें सम्मानित करता है। माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः। न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥ जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, वे उनके शत्रु हैं। ऐसे अपढ़ बालक सभा के मध्य में उसी प्रकार शोभा नहीं पाते, जैसे हंसों के मध्य में बगुला शोभा नहीं पाता।।11।। बच्चे देश का भविष्य होते हैं। किसी भी राष्ट्र का चरित्र, वहां के बच्चों में देखा जा सकता है। इसी बात को ध्यान में रखकर आचार्य चाणक्य ने माता-पिता को उनके बच्चों की ओर से सचेत किया है। माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिलाएं ताकि वे विद्वानों के मध्य बैठकर शोभा पा सकें। अपने संस्कारों और शिक्षा के तेज से ही वे शोभा पाते हैं। अन्यथा जैसे एक बगुला हंसों के बीच में शोभा नहीं पाता, उसी तरह मूर्ख और अनपढ़ बच्चे विद्वानों के मध्य शोभा नहीं पाते। शिक्षा से विहीन व्यक्ति बिना पूंछ का जानवर ही कहलाता है। अपने बच्चों को शिक्षित न करने वाले माता-पिता उसके शत्रु हैं। लालनाद् बहवो दोषास्ताडनाद् बहवो गुणाः। तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत्॥ अत्यधिक लाड़-प्यार से पुत्र और शिष्य गुणहीन हो जाते हैं और ताड़ना से गुणी हो जाते हैं। भाव यही है कि शिष्य और पुत्र को यदि ताड़ना का भय रहेगा तो वे गलत मार्ग पर नहीं जाएंगे।।12।। माता-पिता और गुरु की ताड़ना के पीछे पुत्र और शिष्य को ऊपर उठाने की भावना रहती है। वे उसे शारीरिक कष्ट 35 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
नहीं देना चाहते। यदि वे ऐसा करते भी हैं तो भीतर से उनका कोमल हृदय दुःखी होता है। माता-पिता और गुरु की मार-पिटाई के पीछे बच्चे का भविष्य छिपा होता है। यदि वे उसे अधिक लाड़-प्यार करें तो वह ढीठ होकर बिगड़ जाता है इसलिए उन्हें डांटना-फटकारना उनकी भलाई के लिए ही होता है। श्लोकेन वा तदर्धेन पादेनैकाक्षरेण वा। अबन्ध्यं दिवसं कुर्याद् दानाध्ययनकर्मभिः॥ एक श्लोक, आधा श्लोक, श्लोक का एक चरण, उसका आधा अथवा एक अक्षर ही सही या आधा अक्षर प्रतिदिन पढ़ना चाहिए॥13॥ आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक के द्वारा शिक्षा के महत्त्व को दर्शाया है। उनका कहना है कि मानव-जीवन सभी जीवों में श्रेष्ठ है इसीलिए मनुष्य को अपना जीवन सफल बनाने के लिए अध्ययन, दूसरों की भलाई अथवा दान अवश्य करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि जीवन का एक नियम बना लेना चाहिए कि प्रतिदिन चाहे हम आधा अक्षर ही पढ़ें, पर पढ़ें जरूर। स्वाध्याय से ही ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान से ईश्वर की प्राप्ति होती है। शिक्षा से ही लोक-व्यवहार का रहस्य प्रकट होता है। कान्तावियोगः स्वजनापमानः ऋणस्य शेषं कुनृपस्य सेवा। दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥ स्त्री का वियोग, अपने लोगों से अनाचार, कर्ज का बंधन, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता और अपने प्रतिकूल सभा, ये सभी अग्नि न होते हुए भी शरीर को दग्ध कर देते हैं॥14॥ आचार्य चाणक्य का कहना है कि पत्नी का वियोग 36 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
आदमी को तोड़कर रख देता है। वह असहाय और अकेला रह जाता है। उसके दुःख-सुख का कोई साथी नहीं होता। इसी तरह अपने ही लोगों के द्वारा अपमानित होना सर्वाधिक दुःख पहुंचाता है। व्यक्ति यदि कर्ज न चुका पाए तो उसे पग-पग पर अपमानित होना पड़ता है। जीवन में दरिद्र होने का दुःख सबसे बड़ा है। वह अपनी निर्धनता के कारण अपना सिर गर्व से नहीं उठा पाता। इसी भांति जब आदमी अपने प्रतिकूल किसी सभा का आयोजन देखता है, अर्थात्-समाज में उसे भला-बुरा कहा जाता है तो उसे मर्मान्तक पीड़ा होती है। चाणक्य ने कहा कि ये चीजें यद्यपि आग नहीं हैं, पर इनके द्वारा आदमी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व जलकर राख हो जाता है। नदीतीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी। मन्त्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशम्॥ नदी के किनारे खड़े वृक्ष, दूसरे के घर में गई स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इसमें संशय नहीं करना चाहिए।।15।। बरसात के दिनों में नदी में जब बाढ़ आती है, तब उसके किनारे खड़े वृक्ष उखड़कर पानी में गिर जाते हैं और बह जाते हैं। इसी प्रकार स्त्री यदि दूसरे के घर में रहेगी तो यह भरोसा नहीं कि वह कब भ्रष्ट हो जाए या पतन के मार्ग पर बढ़ जाए, अर्थात स्त्री को दूसरे के घर में नहीं रहने देना चाहिए। इसी प्रकार जिस राजा को उचित सलाह देने वाला गुणी मंत्री नहीं होगा, वह राजा अपनी गलत हरकतों द्वारा शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। इसमें कदापि संदेह नहीं करना चाहिए। 37
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा। वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां परिचर्यका॥ ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल छोटा बनकर रहना, अर्थात सेवा-कर्म करना है।।16।। विद्याविहीन, ज्ञानरहित ब्राह्मण की कोई शक्ति नहीं होती, धन यदि वणिक (व्यापारी) के पास न हो तो वह व्यापार करने में असफल हो जाता है। इसलिए धन का होना उसके लिए परम आवश्यक है। इसी प्रकार यदि शूद्र व्यक्ति अपने सेवा कर्म से पीछे हटता है तो वह एक तरह से अपनी शक्ति को ही क्षीण करता है। आचार्य चाणक्य ने भारतीय वर्ण-व्यवस्था, अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की शक्तियों का यहां परिचय दिया है। भले ही आज के युग में अपने-अपने कर्म से वर्ण-व्यवस्था की स्थिति को नकार दिया गया हो, पर प्राचीन काल से चली आ रही इस वर्ण-व्यवस्था के मूल में एक सुव्यवस्थित समाज की संरचना का रहस्य छिपा हुआ है। निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्। खगाः वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागतो गृहम्॥ वेश्या निर्धन मनुष्य को, प्रजा पराजित राजा को, पक्षी फलरहित वृक्ष को व अतिथि उस घर को, जिसमें वे आमंत्रित किए जाते हैं, को भोजन करने के पश्चात छोड़ देते हैं।।17।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में सहज अनुभवजन्य बातों को समझाया है। उनका कहना है कि जेब में जब धन न हो तब वेश्या के पास नहीं जाना चाहिए क्योंकि वेश्या को सिर्फ धन से ही मतलब होता है। यह वेश्या का स्वभाव ही है। 38
इसी प्रकार राजा के पराजित होकर अपमानित होने पर प्रजा भी उसका साथ छोड़ देती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार फलरहित वृक्ष को त्यागकर पक्षी उड़ जाते हैं, उसी प्रकार अतिथि को भोजन करने के बाद गृहस्थ का घर छोड़ देना चाहिए। जो वस्तुएं गुणहीन हैं, वे त्याज्य हैं, उनका कभी साथ नहीं करना चाहिए। गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्। प्राप्तविद्या गुरुं शिष्याः दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा॥ ब्राह्मण दक्षिणा ग्रहण करके यजमान को, शिष्य विद्याध्ययन करने के उपरान्त अपने गुरु को और हिरण जले हुए वन को त्याग देते हैं॥18॥ इस श्लोक में चाणक्य ने कहा है कि किसी प्रयोजन के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी के पास जाता है तो उसे कार्य पूरा होते ही वह जगह छोड़ देनी चाहिए। उद्देश्य पूर्ति होने के बाद वहां रुकना किसी भी दृष्टि से उत्तम नहीं है। दुराचारी च दुर्द्दष्टिर्दुराऽऽवासी च दुर्जनः। यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति॥ बुरा आचरण अर्थात दुराचारी के साथ रहने से, पाप दृष्टि रखने वाले का साथ करने से तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है।।19।। बुरी संगति का सदैव बुरा असर पड़ता है। यहां चाणक्य ने इसी ओर ध्यान खींचा है। दुश्चरित्र व्यक्ति का साथ करने अथवा गलत जगहों पर जाने या रहने से मनुष्य का चरित्र नष्ट हो जाता है। जिस व्यक्ति का चरित्र नष्ट हो जाता है, वह जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान है। 39
समाने शोभते प्रीतिः राज्ञि सेवा च शोभते। वाणिज्यं व्यवहारेषु दिव्या स्त्री शोभते गृहे॥ मित्रता बराबर वालों में शोभा पाती है, नौकरी राजा की अच्छी होती है, व्यवहार में कुशल व्यापारी और घर में सुंदर स्त्री शोभा पाती है॥20॥ मित्रता कभी भी दो स्तर वालों में सफल नहीं होती। एक-सा स्वभाव, एक समान समाज में जीवन स्तर, एक-से कर्म दो व्यक्तियों के बीच में मित्रता के आधार हो सकते हैं। नौकरी हमेशा सरकारी अच्छी होती है क्योंकि इसमें स्थायित्व होता है। जो व्यापारी चतुर और व्यवहार-कुशल होता है, वह इस समाज में सम्मान का पात्र होता है और सुंदर स्त्री घर में ही शोभनीय होती है। 40
॥ अथ तृतीय अध्याय ॥ कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः। व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्॥ दोष किसके कुल में नहीं है? कौन ऐसा है, जिसे दुःख ने नहीं सताया? अवगुण किसे प्राप्त नहीं हुए? सदैव सुखी कौन रहता है?॥1॥ यह संसार दुःखों का सागर है। इस संसार में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसे दुःख न हुआ हो। सभी व्यक्तियों में कुछ-न-कुछ दुःख, रोग और अवगुण अथवा कुछ-न-कुछ बुरी आदतें पाई जाती हैं। इस संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो सदैव सुखी रहता हो। उसे किसी-न-किसी तरह के संकटों का, दुखों का, रोगों का, बुरी आदतों का सामना करना ही पड़ता है। दुःख और सुख तो साथ-साथ लगे ही रहते हैं। जैसे रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आती है। आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्। सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥ मनुष्य का आचरण-व्यवहार उसके खानदान को बताता 41 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
है, भाषण अर्थात उसकी बोली से देश का पता चलता है, विशेष आदर-सत्कार से उसके प्रेमभाव का तथा उसके शरीर से भोजन का पता चलता है।।2।। मनुष्य के स्वभाव से, उसकी बातचीत से, उसके व्यवहार से और उसके शरीर से कितनी ही बातों का पता बिना परिचय के ही लगाया जा सकता है, जो आदमी शान्त और शील स्वभाव का होगा, जिसका आचरण, व्यवहार आदि सहृदय होगा, वह व्यक्ति निश्चित रूप से उच्च कुल का होगा, परंतु जिसका व्यवहार दुष्टता से भरा होगा, वह निश्चय ही नीच खानदान का होगा। इसी प्रकार आदमी की बोल-चाल से उसके स्थान का पता चल जाता है कि वह कहां का रहने वाला है, क्योंकि उसकी बोली में स्थानीय शब्दों का पुट आ जाता है। आदमी के आदर-सत्कार से उसके प्रेमभाव का पता चल जाता है कि वह सच्चा है अथवा झूठा या दिखावटी है। इसी तरह आदमी के स्वस्थ और दुबले-पतले शरीर को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह आदमी कैसी खुराक खाता होगा। ये सभी सामान्य बातें हैं। कभी-कभी अति मृदु व्यवहार करने वाला व्यक्ति अत्यन्त दुष्ट व चालाक निकलता है और अत्यधिक दुबला-पतला व्यक्ति बहुत ज्यादा खाना खाता है। अपवाद सभी जगह मिल जाते हैं। सुकुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत्। व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत्॥ कन्या का विवाह अच्छे कुल में करना चाहिए। पुत्र को विद्या के साथ जोड़ना चाहिए। दुश्मन को विपत्ति में डालना चाहिए और मित्र को अच्छे कार्यों में लगाना चाहिए॥3॥ आचार्य चाणक्य का कथन है कि समझदार व्यक्ति 42 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अपनी पुत्री का विवाह वर पक्ष के खानदान को अच्छी तरह परखकर ही करता है। वह अपने पुत्र को अच्छी और उच्च शिक्षा प्रदान करता है या कराता है। शत्रु यदि निकट आ जाए तो उसे विपत्ति में डाल देता है और अपने प्रिय मित्र को वह अच्छे और महत्त्वपूर्ण कार्यों में लगाता है। दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः। सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे॥ दुर्जन और सर्प के सामने आने पर सर्प का वरण करना उचित है, न कि दुर्जन का, क्योंकि सर्प तो एक ही बार डसता है, परंतु दुर्जन व्यक्ति कदम-कदम पर बार-बार डसता है॥4॥ आचार्य चाणक्य ने कहा है कि सर्प और दुष्ट व्यक्ति में से यदि किसी का चुनाव करना पड़ जाए तो सर्प का ही चुनाव करना चाहिए न कि दुष्ट व्यक्ति का, क्योंकि सांप तो एक ही बार डसकर छोड़ देगा, परंतु दुष्ट व्यक्ति जीवन-भर कष्ट पहुंचाता रहेगा। इसका भाव यही है कि सांप तो तभी काटेगा, जब उसके ऊपर बेध्यानी में पांव पड़ जाए और उसे आपके द्वारा कष्ट पहुंचे, लेकिन दुष्ट व्यक्ति अपनी आदत के अनुसार बिना कारण के भी कष्ट पहुंचाता रहेगा। एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्। आदिमध्याऽवसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥ इसीलिए राजा खानदानी लोगों को ही अपने पास एकत्र करता है क्योंकि कुलीन अर्थात अच्छे खानदान वाले लोग प्रारम्भ में, मध्य में और अंत में, राजा को किसी दशा में भी नहीं त्यागते॥5॥ भाव यही है कि खानदानी अर्थात कुलीन वंश के लोगों का यह स्वाभाविक गुण होता है कि वे सम-विषम स्थितियों में भी राजा का साथ नहीं छोड़ते। राजा के हर सुख-दुःख में 43
अध्याय ४-६: कर्म-फल, पुत्र-पालन व लोक-व्यवहार
वे सदैव साथ रहते हैं और राजा के प्रति अपनी स्वामिभक्ति को नहीं छोड़ते। कुलीन वंश के लोग किसी भी परिस्थिति में अपनी वफादारी पर कभी आंच नहीं आने देते। प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः। सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥ प्रलय काल में सागर भी अपनी मर्यादा को नष्ट कर डालते हैं परंतु साधु लोग प्रलय काल के आने पर भी अपनी मर्यादा को नष्ट नहीं होने देते॥6॥ समुद्र की मर्यादा प्रसिद्ध है कि उसमें कितना ही जल गिरता जाए, पर वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, लेकिन प्रलय काल में सागर की मर्यादा भी छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाती है, मगर साधु पुरुष अपने कर्त्तव्य पथ से कभी नहीं हटते। अतः सागर की विशालता साधु पुरुष के हृदय की विशालता के सामने तुच्छ है। बड़ी-बड़ी भयानक लहरें धरती को लील जाती हैं, परंतु साधु पुरुष कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी अपनी मर्यादा को नहीं छोड़ते इसीलिए साधु पुरुष को सागर से भी गंभीर और मर्यादित माना गया है। मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः। भिनत्ति वाक्शल्येन अदृष्टः कण्टको यथा॥ मूर्ख व्यक्ति से बचना चाहिए। वह प्रत्यक्ष में दो पैरों वाला पशु है। जिस प्रकार बिना आंख वाले अर्थात अंधे व्यक्ति को कांटे भेदते हैं, उसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपने कटु व अज्ञान से भरे वचनों से भेदता है॥7॥ मूर्ख व्यक्ति का कभी साथ नहीं करना चाहिए। वह बिना 44 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
सींग वाला, दो पैरों से चलने वाला पशु है, अर्थात मूर्ख और बुद्धिहीन है। जिस प्रकार दिखाई न देने पर कांटे अंधे व्यक्ति के शरीर में चुभकर पीड़ा पहुंचाते हैं, उसी प्रकार अज्ञानता से भरे मूर्ख व्यक्ति के वचनों को सुनकर मार्मिक पीड़ा होती है। ऐसे व्यक्ति को छोड़ना ही उत्तम है। रूप यौवन सम्पन्नाः विशालकुलसंभवाः। विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥ रूप और यौवन से सम्पन्न तथा उच्च कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी यदि विद्या से रहित है तो वह बिना सुगंध के फूल की भांति शोभा नहीं पाता॥8॥ भाव यही है कि आदमी की शोभा उसके सुंदर रूप, यौवन और उच्च कुल में जन्म लेने से नहीं है। उसकी शोभा उसकी विद्वता से है, उसके ज्ञान से है। यदि वह मूर्ख है, अज्ञानी है और किसी श्रेष्ठ कुल में उसका जन्म हुआ है, तब भी उसकी कोई मान्यता समाज में नहीं होती। आचार्य चाणक्य का कहना यही है कि आदमी के वंश की, उसके रूप-यौवन की, उसकी शक्ति-संपदा की तभी शोभा होती है, जब वह व्यक्ति विद्वान होता है। अन्यथा तो गंध-रहित पुष्प की भांति उसकी शोभा और सम्मान बनावटी होता है। कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्। विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥ कोयल की शोभा उसके स्वर में है, स्त्री की शोभा उसका पतिव्रत धर्म है, कुरूप व्यक्ति की शोभा उसकी विद्वता में है और तपस्वियों की शोभा क्षमा में है॥ 9॥ कोयल की सुरीली तान (स्वर) ही उसकी शोभा अर्थात उसका सौंदर्य है। पतिव्रत धर्म ही स्त्री का सौंदर्य है, 45 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थात् जो स्त्री अपने पति के प्रति पूरी तरह समर्पित है, जो भूलकर भी पर-पुरुष का ध्यान अपने मन में नहीं लाती, वह स्त्री रूप और गुणों में सर्वोत्तम है। व्यक्ति यदि कुरूप है, पर विद्वान है तो उसकी वह विद्वता ही उसका सौंदर्य है। जैसे महाज्ञानी अष्टावक्र शरीर से कुरूप होते हुए भी महाज्ञानी कहलाए और राजा जनक की सभा में सबसे अधिक सम्मानित हुए। इसी प्रकार जो तपस्वी सहृदय है, संवेदनशील है, क्षमा करना जानता है, वह अपनी इस सदाशयता के कारण ही शोभित होता है। त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥ किसी एक व्यक्ति को त्यागने से यदि कुल की रक्षा होती हो तो उस एक को छोड़ देना चाहिए। पूरे गांव की भलाई के लिए कुल को तथा देश की भलाई के लिए गांव को और अपने आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए सारी पृथ्वी को छोड़ देना चाहिए॥10॥ आचार्य चाणक्य ने यहां एक के सामने अनेक को महत्त्व दिया है। उनका कहना है कि यदि एक व्यक्ति के बलिदान से कुल का सम्मान बचता हो तो उसे बलिदान होने से नहीं रोकना चाहिए। यदि ग्राम की अस्मिता को बचाने के लिए पूरे परिवार का त्याग करना पड़े तो उसे छोड़ देना चाहिए और यदि देश के सम्मान की रक्षा के लिए ग्राम को त्यागना पड़े तो ग्राम का त्याग कर देना चाहिए। प्रायः सरहद पर युद्ध छिड़ जाने से सरहद के गांवों को खाली करा लिया जाता है। इसके अतिरिक्त आचार्य ने आत्म-सम्मान को सर्वोपरि माना है। 46 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्। मौने च कलहो नास्ति, नास्ति जागरिते भयम्॥ उद्योग-धंधा करने पर निर्धनता नहीं रहती। प्रभु नाम का जप करने वाले का पाप नष्ट हो जाता है। चुप रहने अर्थात सहनशीलता रखने पर लड़ाई-झगड़ा नहीं होता और जो जागता रहता है अर्थात सदैव सजग रहता है उसे कभी भय नहीं सताता।।11।। जो व्यक्ति कर्मठ हैं, परिश्रमी हैं, उद्योग-धंधा करने में आलसी नहीं हैं, निर्धनता उनके निकट नहीं आती। वे सदैव सुखी और प्रसन्न रहते हैं। परिश्रम द्वारा वे सुख-सम्पत्ति अर्जित करते हैं। जो प्रभु को पूरी तरह समर्पित होकर उसके नाम का निरंतर जाप करते हैं, उसे स्मरण करते रहते हैं, उनके सभी पाप स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। क्रोध अर्थात पलटकर आक्रमण होने से सदैव झगड़ा बढ़ता है। यदि व्यक्ति दूसरे की कटु बात का जवाब न दे और सहनशील बना रहे तो सामने वाले का क्रोध स्वतः ही नष्ट हो जाता है। झगड़ा बढ़ नहीं पाता। झगड़ा तभी बढ़ता है जब ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाता है। जो व्यक्ति जीवन में सावधान रहता है, उसे कभी भय नहीं सताता। भाव यही है कि परिश्रम से समृद्धि आती है, प्रभु स्मरण से पापों का नाश होता है, सहनशीलता से संघर्ष का अंत होता है और सजगता से भय कभी नहीं होता। अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः। अतिदानं बलिर्दत्वा अति सर्वत्र वर्जयेत्॥ अति सुंदर होने के कारण सीता का हरण हुआ, अत्यंत अहंकार के कारण रावण मारा गया, अत्यधिक दान के कारण राजा बलि बांधा गया। अतः सभी के लिए अति ठीक नहीं है। 'अति सर्वथा वर्जयेत्।' अति को सदैव छोड़ देना चाहिए।।12।। 47 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
हर चीज की एक सीमा होती है, मर्यादा होती है। सीमा से बाहर जाने पर प्रायः नुकसान ही होता है। उदाहरण देते हुए चाणक्य ने बताया कि अनुपम सुंदरी होने के कारण सीता का हरण हुआ और अति अहंकारी होने के कारण रावण का वध हुआ। इसी तरह असुरराज बलि ने दान का वचन देकर वामन को अपना सर्वस्व दान कर दिया। कथा इस प्रकार है, प्रह्लाद पुत्र बलि बड़ा दानवीर था। देवता उससे भयभीत रहते थे। विष्णु भगवान ने वामन अंगुल का रूप धारण करके बलि से तीन पग भूमि मांगी। बलि ने हंसकर तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। तब भगवान विष्णु ने दो पग में तीनों लोक नाप लिए और तीसरा पग बलि के शरीर पर रखकर उसे पाताल भेज दिया। को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥ समर्थ को भार कैसा? व्यवसायी के लिए कोई स्थान दूर क्या? विद्वान के लिए विदेश कैसा? मधुर वचन वाले का शत्रु कौन?॥13॥ समर्थ व्यक्ति कोई भी कार्य सहज ही कर लेता है। उसे कोई भी कार्य भार स्वरूप नहीं लगता। व्यवसायी व्यक्ति अपने व्यवसाय के लिए कहीं भी जा सकता है। वह स्थान की दूरी को नहीं, अपने लाभ को देखता है। इसी तरह विद्वान व्यक्ति के विदेश में भी लाखों मित्र होते हैं। उसे परदेस में कोई कठिनाई नहीं होती। मधुर वचन बोलने वाला व्यक्ति कभी दूसरों के प्रति ईर्ष्या नहीं रखता, सभी को समान भाव से देखता है, उसका कोई शत्रु नहीं होता। अतः सब उसके मित्र बन जाते हैं। 48 CC0 Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
एकेनाऽपि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना। वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥ एक ही सुगन्धित फूल वाले वृक्ष से जिस प्रकार सारा वन सुगन्धित हो जाता है, उसी प्रकार एक सुपुत्र से सारा कुल सुशोभित हो जाता है।।14।। अच्छे गुण सभी जगह प्रशंसित होते हैं। उनकी लोक प्रसिद्धि सुगन्धित पुष्प की भांति सभी जगह फैल जाती है। किसी कुल का एक सुपुत्र सारे कुल को सम्मानित करा देता है। एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना। दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं तथा॥ आग से जलते हुए सूखे वृक्ष से सारा वन जल जाता है जैसे कि एक कुपुत्र से कुल का नाश हो जाता है।।15।। कुल का विनाश करने के लिए एक ही कुपुत्र काफी होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक जलता हुआ वृक्ष पूरे वन को जलाकर खाक कर देता है। भाव यही है कि सद्गृहस्थ को अपनी संतान पर पूरा ध्यान रखना चाहिए। एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना। आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥ जिस प्रकार चन्द्रमा से रात्रि की शोभा होती है, उसी प्रकार एक सुपुत्र, अर्थात साधु प्रकृति वाले पुत्र से कुल आनन्दित होता है।।16।। किसी परिवार में यदि साधु प्रकृति का विद्वान पुत्र उत्पन्न होता है तो वह अपनी विद्वता से पूरे परिवार को और समाज को उसी प्रकार से आनन्दित कर देता है, जैसे चन्द्रमा अपनी शीतल चांदनी से रात्रि को जगमग कर देता है। 49 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri