सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसींग वाला, दो पैरों से चलने वाला पशु है, अर्थात मूर्ख और बुद्धिहीन है। जिस प्रकार दिखाई न देने पर कांटे अंधे व्यक्ति के शरीर में चुभकर पीड़ा पहुंचाते हैं, उसी प्रकार अज्ञानता से भरे मूर्ख व्यक्ति के वचनों को सुनकर मार्मिक पीड़ा होती है। ऐसे व्यक्ति को छोड़ना ही उत्तम है। रूप यौवन सम्पन्नाः विशालकुलसंभवाः। विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥ रूप और यौवन से सम्पन्न तथा उच्च कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी यदि विद्या से रहित है तो वह बिना सुगंध के फूल की भांति शोभा नहीं पाता॥8॥ भाव यही है कि आदमी की शोभा उसके सुंदर रूप, यौवन और उच्च कुल में जन्म लेने से नहीं है। उसकी शोभा उसकी विद्वता से है, उसके ज्ञान से है। यदि वह मूर्ख है, अज्ञानी है और किसी श्रेष्ठ कुल में उसका जन्म हुआ है, तब भी उसकी कोई मान्यता समाज में नहीं होती। आचार्य चाणक्य का कहना यही है कि आदमी के वंश की, उसके रूप-यौवन की, उसकी शक्ति-संपदा की तभी शोभा होती है, जब वह व्यक्ति विद्वान होता है। अन्यथा तो गंध-रहित पुष्प की भांति उसकी शोभा और सम्मान बनावटी होता है। कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्। विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥ कोयल की शोभा उसके स्वर में है, स्त्री की शोभा उसका पतिव्रत धर्म है, कुरूप व्यक्ति की शोभा उसकी विद्वता में है और तपस्वियों की शोभा क्षमा में है॥ 9॥ कोयल की सुरीली तान (स्वर) ही उसकी शोभा अर्थात उसका सौंदर्य है। पतिव्रत धर्म ही स्त्री का सौंदर्य है, 45 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri