सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
सींग वाला, दो पैरों से चलने वाला पशु है, अर्थात मूर्ख और बुद्धिहीन है। जिस प्रकार दिखाई न देने पर कांटे अंधे व्यक्ति के शरीर में चुभकर पीड़ा पहुंचाते हैं, उसी प्रकार अज्ञानता से भरे मूर्ख व्यक्ति के वचनों को सुनकर मार्मिक पीड़ा होती है। ऐसे व्यक्ति को छोड़ना ही उत्तम है। रूप यौवन सम्पन्नाः विशालकुलसंभवाः। विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥ रूप और यौवन से सम्पन्न तथा उच्च कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी यदि विद्या से रहित है तो वह बिना सुगंध के फूल की भांति शोभा नहीं पाता॥8॥ भाव यही है कि आदमी की शोभा उसके सुंदर रूप, यौवन और उच्च कुल में जन्म लेने से नहीं है। उसकी शोभा उसकी विद्वता से है, उसके ज्ञान से है। यदि वह मूर्ख है, अज्ञानी है और किसी श्रेष्ठ कुल में उसका जन्म हुआ है, तब भी उसकी कोई मान्यता समाज में नहीं होती। आचार्य चाणक्य का कहना यही है कि आदमी के वंश की, उसके रूप-यौवन की, उसकी शक्ति-संपदा की तभी शोभा होती है, जब वह व्यक्ति विद्वान होता है। अन्यथा तो गंध-रहित पुष्प की भांति उसकी शोभा और सम्मान बनावटी होता है। कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्। विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥ कोयल की शोभा उसके स्वर में है, स्त्री की शोभा उसका पतिव्रत धर्म है, कुरूप व्यक्ति की शोभा उसकी विद्वता में है और तपस्वियों की शोभा क्षमा में है॥ 9॥ कोयल की सुरीली तान (स्वर) ही उसकी शोभा अर्थात उसका सौंदर्य है। पतिव्रत धर्म ही स्त्री का सौंदर्य है, 45 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थात् जो स्त्री अपने पति के प्रति पूरी तरह समर्पित है, जो भूलकर भी पर-पुरुष का ध्यान अपने मन में नहीं लाती, वह स्त्री रूप और गुणों में सर्वोत्तम है। व्यक्ति यदि कुरूप है, पर विद्वान है तो उसकी वह विद्वता ही उसका सौंदर्य है। जैसे महाज्ञानी अष्टावक्र शरीर से कुरूप होते हुए भी महाज्ञानी कहलाए और राजा जनक की सभा में सबसे अधिक सम्मानित हुए। इसी प्रकार जो तपस्वी सहृदय है, संवेदनशील है, क्षमा करना जानता है, वह अपनी इस सदाशयता के कारण ही शोभित होता है। त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥ किसी एक व्यक्ति को त्यागने से यदि कुल की रक्षा होती हो तो उस एक को छोड़ देना चाहिए। पूरे गांव की भलाई के लिए कुल को तथा देश की भलाई के लिए गांव को और अपने आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए सारी पृथ्वी को छोड़ देना चाहिए॥10॥ आचार्य चाणक्य ने यहां एक के सामने अनेक को महत्त्व दिया है। उनका कहना है कि यदि एक व्यक्ति के बलिदान से कुल का सम्मान बचता हो तो उसे बलिदान होने से नहीं रोकना चाहिए। यदि ग्राम की अस्मिता को बचाने के लिए पूरे परिवार का त्याग करना पड़े तो उसे छोड़ देना चाहिए और यदि देश के सम्मान की रक्षा के लिए ग्राम को त्यागना पड़े तो ग्राम का त्याग कर देना चाहिए। प्रायः सरहद पर युद्ध छिड़ जाने से सरहद के गांवों को खाली करा लिया जाता है। इसके अतिरिक्त आचार्य ने आत्म-सम्मान को सर्वोपरि माना है। 46 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्। मौने च कलहो नास्ति, नास्ति जागरिते भयम्॥ उद्योग-धंधा करने पर निर्धनता नहीं रहती। प्रभु नाम का जप करने वाले का पाप नष्ट हो जाता है। चुप रहने अर्थात सहनशीलता रखने पर लड़ाई-झगड़ा नहीं होता और जो जागता रहता है अर्थात सदैव सजग रहता है उसे कभी भय नहीं सताता।।11।। जो व्यक्ति कर्मठ हैं, परिश्रमी हैं, उद्योग-धंधा करने में आलसी नहीं हैं, निर्धनता उनके निकट नहीं आती। वे सदैव सुखी और प्रसन्न रहते हैं। परिश्रम द्वारा वे सुख-सम्पत्ति अर्जित करते हैं। जो प्रभु को पूरी तरह समर्पित होकर उसके नाम का निरंतर जाप करते हैं, उसे स्मरण करते रहते हैं, उनके सभी पाप स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। क्रोध अर्थात पलटकर आक्रमण होने से सदैव झगड़ा बढ़ता है। यदि व्यक्ति दूसरे की कटु बात का जवाब न दे और सहनशील बना रहे तो सामने वाले का क्रोध स्वतः ही नष्ट हो जाता है। झगड़ा बढ़ नहीं पाता। झगड़ा तभी बढ़ता है जब ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाता है। जो व्यक्ति जीवन में सावधान रहता है, उसे कभी भय नहीं सताता। भाव यही है कि परिश्रम से समृद्धि आती है, प्रभु स्मरण से पापों का नाश होता है, सहनशीलता से संघर्ष का अंत होता है और सजगता से भय कभी नहीं होता। अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः। अतिदानं बलिर्दत्वा अति सर्वत्र वर्जयेत्॥ अति सुंदर होने के कारण सीता का हरण हुआ, अत्यंत अहंकार के कारण रावण मारा गया, अत्यधिक दान के कारण राजा बलि बांधा गया। अतः सभी के लिए अति ठीक नहीं है। 'अति सर्वथा वर्जयेत्।' अति को सदैव छोड़ देना चाहिए।।12।। 47 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
हर चीज की एक सीमा होती है, मर्यादा होती है। सीमा से बाहर जाने पर प्रायः नुकसान ही होता है। उदाहरण देते हुए चाणक्य ने बताया कि अनुपम सुंदरी होने के कारण सीता का हरण हुआ और अति अहंकारी होने के कारण रावण का वध हुआ। इसी तरह असुरराज बलि ने दान का वचन देकर वामन को अपना सर्वस्व दान कर दिया। कथा इस प्रकार है, प्रह्लाद पुत्र बलि बड़ा दानवीर था। देवता उससे भयभीत रहते थे। विष्णु भगवान ने वामन अंगुल का रूप धारण करके बलि से तीन पग भूमि मांगी। बलि ने हंसकर तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। तब भगवान विष्णु ने दो पग में तीनों लोक नाप लिए और तीसरा पग बलि के शरीर पर रखकर उसे पाताल भेज दिया। को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥ समर्थ को भार कैसा? व्यवसायी के लिए कोई स्थान दूर क्या? विद्वान के लिए विदेश कैसा? मधुर वचन वाले का शत्रु कौन?॥13॥ समर्थ व्यक्ति कोई भी कार्य सहज ही कर लेता है। उसे कोई भी कार्य भार स्वरूप नहीं लगता। व्यवसायी व्यक्ति अपने व्यवसाय के लिए कहीं भी जा सकता है। वह स्थान की दूरी को नहीं, अपने लाभ को देखता है। इसी तरह विद्वान व्यक्ति के विदेश में भी लाखों मित्र होते हैं। उसे परदेस में कोई कठिनाई नहीं होती। मधुर वचन बोलने वाला व्यक्ति कभी दूसरों के प्रति ईर्ष्या नहीं रखता, सभी को समान भाव से देखता है, उसका कोई शत्रु नहीं होता। अतः सब उसके मित्र बन जाते हैं। 48 CC0 Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
एकेनाऽपि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना। वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥ एक ही सुगन्धित फूल वाले वृक्ष से जिस प्रकार सारा वन सुगन्धित हो जाता है, उसी प्रकार एक सुपुत्र से सारा कुल सुशोभित हो जाता है।।14।। अच्छे गुण सभी जगह प्रशंसित होते हैं। उनकी लोक प्रसिद्धि सुगन्धित पुष्प की भांति सभी जगह फैल जाती है। किसी कुल का एक सुपुत्र सारे कुल को सम्मानित करा देता है। एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना। दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं तथा॥ आग से जलते हुए सूखे वृक्ष से सारा वन जल जाता है जैसे कि एक कुपुत्र से कुल का नाश हो जाता है।।15।। कुल का विनाश करने के लिए एक ही कुपुत्र काफी होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक जलता हुआ वृक्ष पूरे वन को जलाकर खाक कर देता है। भाव यही है कि सद्गृहस्थ को अपनी संतान पर पूरा ध्यान रखना चाहिए। एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना। आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥ जिस प्रकार चन्द्रमा से रात्रि की शोभा होती है, उसी प्रकार एक सुपुत्र, अर्थात साधु प्रकृति वाले पुत्र से कुल आनन्दित होता है।।16।। किसी परिवार में यदि साधु प्रकृति का विद्वान पुत्र उत्पन्न होता है तो वह अपनी विद्वता से पूरे परिवार को और समाज को उसी प्रकार से आनन्दित कर देता है, जैसे चन्द्रमा अपनी शीतल चांदनी से रात्रि को जगमग कर देता है। 49 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकै। वरमेकः कुलाऽलम्बी यत्र विश्राम्यते कुलम्॥ शोक और दुःख देने वाले बहुत-से पुत्रों को पैदा करने से क्या लाभ है? कुल को आश्रय देने वाला तो एक पुत्र ही सबसे अच्छा होता है॥17॥ महाभारत में धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे, पर सभी ने उसे दुःख ही पहुंचाया। वे सभी महाभारत युद्ध के कारण बने। जबकि पांच पाण्डवों ने धर्म के मार्ग पर चलकर विजय श्री प्राप्त की और वंश का नाम सुशोभित किया। यहां चाणक्य ने हजार दुर्गुणों पर एक ही श्रेष्ठता को महत्त्व दिया है। एक श्रेष्ठ और गुणी पुत्र सौ दुष्ट पुत्रों से अच्छा होता है। दुःख देने वाले कई पुत्रों से कुल के नाम को बढ़ाने वाला तथा सहारा देने वाला एक ही पुत्र काफी होता है। लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥ पुत्र से पांच वर्ष तक प्यार करना चाहिए। उसके बाद दस वर्ष तक अर्थात पंद्रह वर्ष की आयु तक उसे दंड आदि देते हुए अच्छे कार्य की ओर लगाना चाहिए। सोलहवां साल आने पर मित्र जैसा व्यवहार करना चाहिए। संसार में जो कुछ भी भला-बुरा है, उसका उसे ज्ञान कराना चाहिए॥18॥ इस प्रकार एक पिता अपने पुत्र के जीवन को भली-भांति सवांर सकता है और उसे गलत मार्ग पर बढ़ने से रोक सकता है। उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे। असाधुजनसम्पर्केयः पलायेत् सः जीवति॥ देश में भयानक उपद्रव होने पर, शत्रु के आक्रमण के 50 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
समय, भयानक दुर्भिक्ष (अकाल) के समय, दुष्ट का साथ होने पर, जो भाग जाता है, वही जीवित रहता है॥19॥ दैवीय उत्पात के समय, शत्रु के आक्रमण के समय, अकाल पड़ने पर और दुष्ट का साथ होने पर व्यक्ति को अपना बचाव करना चाहिए तभी प्राण रक्षा संभव है। धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। जन्म-जन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥ जिसके पास धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इनमें से एक भी नहीं है, उसके लिए जन्म लेने का फल केवल मृत्यु ही होता है॥20॥ आचार्य चाणक्य ने यहां धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की महत्ता पर प्रकाश डाला है। धर्म से सद्कर्मों की प्रेरणा प्राप्त होती है, अर्थ से जीवन समृद्ध होता है, काम जीवन की शाश्वत अनिवार्यता है और मोक्ष के द्वारा मनुष्य जीवन-मृत्यु के आवागमन से मुक्त हो जाता है। ये सब मनुष्य जीवन में ही संभव है। मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है इसीलिए ऋषि-मुनियों ने जीवन के इन चार श्रेष्ठ तत्त्वों का विवेचन किया है। मूर्खा यत्र न पूज्यंते धान्यं यत्र सुसञ्चितम्। दाम्पत्योः कलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥ जहां मूर्खों का सम्मान नहीं होता, जहां अन्न भंडार सुरक्षित रहता है, जहां पति-पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होता, वहां लक्ष्मी बिना बुलाए ही निवास करती हैं॥21॥ भाव यह है कि जिस देश में मूर्खों की जगह विद्वानों का सम्मान होता है, जहां समुचित अन्न भंडार रहता है, जहां परिवार और घर-गृहस्थी में प्यार बना रहता है, वहां सुख-समृद्धि बराबर बनी रहती है। 51 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
॥ अथ चतुर्थ अध्याय ॥ आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च। पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥ यह निश्चित है कि शरीरधारी जीव के गर्भकाल में ही आयु, कर्म, धन, विद्या, मृत्यु, इन पांचों की सृष्टि साथ-ही-साथ हो जाती है॥1॥ इस नीति के द्वारा चाणक्य मानव-जीवन की सभी बातों को पूर्व निर्धारित मानते हैं। उनका मत है कि मनुष्य जीवन की अवधि, मृत्यु, सुख-दुःख, मान-अपमान, विद्या और सम्पत्ति का भोग सभी कुछ ईश्वर के अधीन है। बिना उसकी मर्जी के पत्ता तक नहीं हिलता। अतः सब कुछ उस पर छोड़कर मनुष्य को अपने कर्म में प्रवृत्त हो जाना चाहिए। साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः। ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥ साधु-महात्माओं के संसर्ग से पुत्र, मित्र, बंधु और जो अनुराग करते हैं, वे संसार-चक्र से छूट जाते हैं और उनके कुल-धर्म से उनका कुल उज्ज्वल हो जाता है॥2॥ 52 CC0. Vasishthe Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
भाव यह है कि जिस कुल में साधु-महात्मा जैसा कोई पुत्र उत्पन्न हो जाता है, उसके संसर्ग से बाकी सभी लोगों का भी सांस्कारिक परिष्कार हो जाता है। दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी। शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जनसंगतिः॥ जिस प्रकार मछली देख-रेख से, कछुवी चिड़िया स्पर्श से (चोंच द्वारा) सदैव अपने बच्चों का पालन-पोषण करती हैं, वैसे ही अच्छे लोगों के साथ से सर्व प्रकार से रक्षा होती है॥३॥ यहां चाणक्य ने सद्-संगति पर जोर दिया है। अच्छे लोगों का साथ होने पर किसी प्रकार की हानि नहीं होती। सज्जनों का साथ सदैव सुखकारी और हितरक्षक होता है। यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः। तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति॥ यह नश्वर शरीर जब तक निरोग व स्वस्थ है या जब तक मृत्यु नहीं आती, तब तक मनुष्य को अपने सभी पुण्य-कर्म कर लेने चाहिए क्योंकि अंत समय आने पर वह क्या कर पाएगा॥४॥ समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। समय गुजरता जाता है इसीलिए किसी कार्य को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। कहा भी है—‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, फेर करेगा कब?’ अतः समय का कोई भरोसा नहीं। जो पुण्य-कर्म करने हैं, अभी कर लेने चाहिए, फिर समय नहीं मिलेगा। कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी। प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥ विद्या कामधेनु के समान सभी इच्छाएं पूर्ण करने वाली 53
है। विद्या से सभी फल समय पर प्राप्त होते हैं। परदेस में विद्या माता के समान रक्षा करती है। विद्वानों ने विद्या को गुप्त धन कहा है, अर्थात विद्या वह धन है जो आपातकाल में काम आती है। इसका न तो हरण किया जा सकता है न ही इसे चुराया जा सकता है॥5॥ विद्या सभी प्रकार से सुरक्षित और समय पड़ने पर रक्षा करने वाली है। इसे जितना दिया जाता है, यह उतनी ही बढ़ती है। इससे बड़ा धन कोई दूसरा नहीं है। इसे न ही कोई छीन सकता और न ही कोई आपस में बांट सकता। वरमेको गुणी पुत्रो निर्गुणैश्च शतैरपि। एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥ सैकड़ों अज्ञानी पुत्रों से एक ही गुणवान पुत्र अच्छा है। रात्रि का अंधकार एक ही चंद्रमा दूर करता है, न कि हजारों तारें॥6॥ इसी प्रकार के तीन श्लोक अध्याय तीन में संख्या 14, 16 और 17 भी हैं। आचार्य चाणक्य ने इस प्रकार बार-बार गुणी पुत्र के होने की बात कही है। गुणी पुत्र जीवन-भर सुख देने वाला होता है। मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः। मृतः स चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्॥ बहुत बड़ी आयु वाले मूर्ख पुत्र की अपेक्षा पैदा होते ही जो मर गया, वह अच्छा है क्योंकि मरा हुआ पुत्र कुछ देर के लिए ही कष्ट देता है, परंतु मूर्ख पुत्र जीवन-भर जलाता है॥7॥ मूर्ख पुत्र के विषय में चाणक्य ने अध्याय तीन में श्लोक संख्या 15 में भी यही बात कही है। मूर्ख पुत्र जीवन-भर का दुःख होता है। 54 CC0. Vasishta Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या। पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥ बुरे ग्राम का वास, नीच कुल की सेवा, बुरा भोजन, झगड़ालू स्त्री, मूर्ख लड़का, विधवा कन्या, ये छः बिना अग्नि के भी शरीर को जला देते हैं॥8॥ चाणक्य का कथन है कि ऐसे गांव में कभी नहीं रहना चाहिए, जहां के लोग दुःख में साथ देने वाले न हों। नीच व्यक्ति की नौकरी में सदैव अपमान ही झेलना पड़ता है। खराब भोजन स्वास्थ्य को खराब कर देता है। कलह करने वाली स्त्री परिवार को नर्क बना देती है, मूर्ख पुत्र अपनी अज्ञानता से बार-बार मुसीबतें खड़ी करने वाला होता है और घर में विधवा बेटी का दुःख जीवन-भर जलाता रहता है। ये छः बिना अग्नि के भी जीवन-भर शरीर को चिंता की अग्नि से जलाते रहते हैं। किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गुर्विणी। कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान् न भक्तिमान्॥ उस गाय से क्या लाभ, जो न बच्चा जने और न दूध ही दे। ऐसे पुत्र के जन्म लेने से क्या लाभ, जो न तो विद्वान हो, न किसी देवता का भक्त हो॥9॥ भाव यह है कि दूध देने वाली गाय के समान ही ऐसे पुत्र की कामना की गई है जो विद्वान भी हो और ईश्वर में आस्था रखने वाला भी हो। ऐसा पुत्र सदैव सुख देने वाला और मां-बाप का नाम रोशन करने वाला होता है। संसारतापद्ग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः। अपत्यं च कलत्रं च सतां संगतिरेव च॥ इस संसार में दुःखों से दग्ध प्राणी को तीन बातों से 55 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
सुख-शान्ति प्राप्त हो सकती है—सुपुत्र से, पतिव्रता स्त्री से और सद्संगति से॥10॥ संसार दुःखों का सागर है। यहां हर पल कोई-न-कोई दुःख मनुष्य को सताता ही रहता है। ऐसे दुःखमय संसार में यदि उसे सुपुत्र, पतिव्रता स्त्री और सज्जनों की संगति मिल जाए तो उसे चिंता, दुःख व अशान्ति से बहुत राहत मिल सकती है। सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः। सकृत् कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्॥ राजा लोग एक ही बार बोलते हैं (आज्ञा देते हैं), पंडित लोग किसी कर्म के लिए एक ही बार बोलते हैं (बार-बार श्लोक नहीं पढ़ते), कन्याएं भी एक ही बार दी जाती हैं। ये तीन एक ही बार होने से विशेष महत्त्व रखते हैं॥11॥ राजा का, विद्वान का और कन्या के पिता का वचन अथवा कथन अटल होता है। इनके वचन लौटाए नहीं जा सकते। इसी प्रकार अच्छे कर्म के लिए बार-बार नहीं कहा जाता। एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः। चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पंचभिर्बहुभी रणः॥ तपस्या अकेले में, अध्ययन (पढ़ाई) दो के साथ, गाना तीन के साथ, यात्रा चार के साथ, खेती पांच के साथ और युद्ध बहुत से सहायकों के साथ होने पर ही उत्तम होता है॥12॥ आचार्य चाणक्य ने उक्त श्लोक के माध्यम से जानकारी दी है कि मनुष्य को तप अर्थात ईश्वरभक्ति करनी हो तो उसे एकांत स्थान खोजना चाहिए। अध्ययन दो व्यक्ति मिलकर करें। मिलकर अध्ययन करने का लाभ यह है कि आपस में अध्ययन संबंधी विषय पर विचार-विमर्श भी साथ-साथ चलता रह सकता है। गाने के विषय में तीन लोगों की महत्ता 56
इसलिए है कि स्वर के उतार-चढ़ाव के लिए एक से अधिक गले की, तीन की आवश्यकता होती है तभी सही लय-सुर बन पाता है। यात्रा के लिए चार व्यक्तियों की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि चारों दिशाओं के खतरे के प्रति सावधान रहा जा सके। खेत बोने के लिए पांच व्यक्तियों की आवश्यकता इसलिए बताई गई है ताकि चारों कोने और बीच का भाग सही तरह से बोया जा सके। युद्ध के लिए सेना का महत्त्व सभी जानते हैं। सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता। सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥ पत्नी वही है जो पवित्र और चतुर है, पतिव्रता है, पत्नी वही है जिस पर पति का प्रेम है, पत्नी वही है जो सदैव सत्य बोलती है।।13।। यहां आचार्य चाणक्य ने पत्नी के श्रेष्ठ स्वरूप के बारे में बताते हुए कहा है कि जो पत्नी समय पर चतुराई से काम निकालना जानती है और जो सदैव अपने पति के प्रति समर्पित, पवित्र, पतिव्रता, पति प्रेम की पात्रा और सच बोलने वाली है, वही सच्ची पत्नी है। अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबांधवाः। मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता॥ बिना पुत्र के घर सूना है। बिना बंधु-बांधवों के दिशाएं सूनी हैं। मूर्ख का हृदय भावों से सूना है। दरिद्रता सबसे सूनी है, अर्थात दरिद्रता का जीवन महाकष्टकारक है।।14।। पुत्र के बिना वंश-बेल सूख जाती है। पिता को अपना ही घर सूना लगने लगता है। बंधु-बांधवों के न होने पर वह कहीं आ-जा नहीं सकता, सारी दिशाएं उसे सूनी लगने लगती हैं। मूर्ख 57 CC0 Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
के हृदय में संवेदनशीलता की शून्यता बनी रहती है। वह किसी के सुख-दुःख में हिस्सा नहीं लेता। गरीबी के कारण निर्धन का कोई मित्र नहीं होता। यही कारण है कि उसे सारा संसार और अपना जीवन व्यर्थ दिखाई देने लगता है। तात्पर्य यह है कि जिसके पास धन नहीं है, उसके लिए दुनिया का प्रत्येक कोना सूना है। अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्। दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥ बार-बार अभ्यास न करने से विद्या विष बन जाती है। बिना पचा भोजन विष बन जाता है, दरिद्र के लिए स्वजनों की सभा या साथ और वृद्धों के लिए युवा स्त्री विष के समान होती है॥15॥ अभ्यास से ही शिक्षा (विद्या) का विकास होता है। जो भोजन पचता नहीं, वह शरीर पर कुप्रभाव डालता है। एक दरिद्र परिजन अपने ही लोगों को विष के समान दिखलाई पड़ने लगता है। उन्हें वह भार स्वरूप दिखाई देने लगता है। यदि किसी वृद्ध को युवा स्त्री मिल जाए तो वह उसे संतुष्ट न करने की स्थिति में जहर दिखाई देने लगती है। प्रत्येक वस्तु का अपना उचित स्थान और महत्त्व होता है। त्यजेद्धर्म दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्। त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान् बान्धवांस्त्यजेत्॥ दयाहीन धर्म को छोड़ दो, विद्याविहीन गुरु को छोड़ दो, झगड़ालू और क्रोधी स्त्री को छोड़ दो और स्नेहविहीन बंधु-बांधवों को छोड़ दो॥16॥ भाव यह है कि ऐसे धर्म को कभी नहीं अपनाना चाहिए, 58
जिसमें प्राणी-मात्र के लिए दया-भाव न हो। ऐसे गुरु को नहीं अपनाना चाहिए, जिसमें विद्वता न हो। ऐसी पत्नी को स्वीकार नहीं करना चाहिए जो क्रोधी स्वभाव की हो और कलह करने वाली हो। साथ ही ऐसे परिजनों से संबंध नहीं रखना चाहिए जो दुःख-सुख में काम न आते हों। अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बंधनं जरा। अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपो जरा॥ बहुत ज्यादा पैदल चलना मनुष्यों को बुढ़ापा ला देता है, घोड़ों को एक ही स्थान पर बांधे रखना और स्त्रियों के साथ पुरुष का समागम (मैथुन) न होना और वस्त्रों को लगातार धूप में डाले रखने से बुढ़ापा आ जाता है।। 17 ।। निरन्तर यात्रा करते रहने से खान-पान और शरीर को आराम नहीं मिल पाता। इससे शरीर थककर चूर-चूर हो जाता है। युवावस्था की उमंग क्षीण हो जाती है। घोड़ों को यदि घुमाया-फिराया न जाए तो वे आलसी हो जाते हैं। आलस्य शरीर को शिथिल कर देता है। स्त्री-पुरुष का समागम स्वाभाविक क्रिया है। यदि स्त्री अथवा पुरुष इससे वंचित रह जाएं तो उन्हें बुढ़ापा घेर लेता है। वस्त्रों के धूप में पड़े रहने से वे पुराने पड़कर जर-जर हो जाते हैं। कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययऽऽगमौ। कश्चाऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥ बुद्धिमान व्यक्ति को बार-बार यह सोचना चाहिए कि हमारे मित्र कितने हैं, हमारा समय कैसा है—अच्छा है या बुरा और यदि बुरा है तो उसे अच्छा कैसे बनाया जाए। हमारा निवास-स्थान कैसा है (सुखद, अनुकूल), हमारी आय कितनी है और व्यय कितना है, मैं कौन हूं-आत्मा हूं, अथवा शरीर, स्वाधीन हूं अथवा पराधीन तथा मेरी शक्ति कितनी है।।18।। 59 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
इन प्रश्नों पर विचार करते हुए मनुष्य को अपना जीवन बिताना चाहिए तथा आत्मकल्याण के लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो व्यक्ति इन बातों पर विचार नहीं करता, वह पत्थर के समान निर्जीव होता है और सदा लोगों के पांवों में पड़ा ठोकरें खाता रहता है। मनुष्य को समझदारी से काम लेकर जीवन बिताना चाहिए। जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैवे पितरः स्मृताः॥ जन्म देने वाला पिता, उपनयन-संस्कार कराने वाला, विद्या देने वाला गुरु, अन्नदाता और भय से रक्षा करने वाला—ये पांच 'पितर' माने जाते हैं॥19॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में पंच पितर के साथ एक पितर को रक्षा करने वाला भी कहा है। रक्षा जीवित ही कर सकता है, मरा हुआ नहीं। मरा अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता तो दूसरों की क्या करेगा। गीता में भी कौरव-पांडवों की सेना के आमने-सामने खड़े हो जाने के समय के वर्णन में 'पितर' शब्द आया है। अर्जुन ने वहां खड़े हुए पितरों-चाचा, ताऊ, पिता, दादा आदि को देखा था। पितर सिर्फ मरे हुए के लिए आता है, ऐसा सोचना भ्रामक है। राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च। पत्नी माता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥ राजा की पत्नी, गुरु की स्त्री, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता (सास) और अपनी जननी—ये पांच माताएं मानी गई हैं। इनके साथ मातृवत् व्यवहार ही करना चाहिए॥20॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने पांच माताओं की प्रतिष्ठा स्थापित करते हुए कहा है—राजा चूंकि पूरे राज्य की जनता के लिए पिता तुल्य होता है, अतः राजा की पत्नी माता रूप 60 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
में होती है, उसका सम्मान आवश्यक है। गुरु पिता के समान होता है अतः उसकी पत्नी भी माता समान होती है, सम्मान की पात्र है। मित्र का महत्त्व अत्यंत विश्वसनीय पात्र के रूप में है। मित्र सुख-दुख में बराबर का साथी होता है, अतः मित्र की पत्नी को भी माता के समान मानना चाहिए। पत्नी की माता, अर्थात सास को भी माता रूप में मानना चाहिए। पत्नी जो जीवनसंगिनी बन गई, उसकी मां को माता समान मानना चाहिए। अपनी मां तो मां होती ही है। उसके प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए। अग्निदेवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्। प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनः॥ अग्नि देव ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के देवता हैं। ऋषि-मुनियों के देवता हृदय में हैं। अल्प बुद्धि वालों के देवता मूर्तियों में हैं और सारे संसार को समान रूप से देखने वालों के देवता सभी जगह निवास करते हैं॥21॥ जो तत्त्वज्ञानी हैं, जिन्होंने इस चराचर सृष्टि के रहस्य को जान लिया है, उनके लिए सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही उस परम शक्तिसम्पन्न परमात्मा का घर है। वह कण-कण में व्याप्त है। सभी प्राणियों में है। जड़ में है, चेतन में है, परंतु दो बार जन्म लेने वाले, एक बार माता के गर्भ से और दूसरी बार गुरु के द्वारा संस्कारित होने पर, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अग्नि अर्थात 'यज्ञ' को ही अपना देवता मानते हैं। ऋषि-मुनि परमात्मा के स्वरूप का ध्यान अपने हृदय में करते हैं और अल्प बुद्धि लोग पत्थरों की मूर्ति में ही भगवान का स्वरूप तलाशते हैं। यह अपनी-अपनी आस्था की बात है। 61
॥ अथ पंचम अध्याय ॥ गुरुरग्निर्द्विजातिनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः॥ स्त्रियों का गुरु पति है। अतिथि सबका गुरु है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का गुरु अग्नि है तथा चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण है।।1।। यहां आचार्य चाणक्य ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है, परंतु जो ज्ञानी है, वही ब्राह्मण है। कोई जन्म से ही ब्राह्मण नहीं हो जाता। इस श्लोक में 'ब्राह्मण' से चाणक्य का तात्पर्य ज्ञान से परिपूर्ण व्यक्ति से है। यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते, निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते, त्यागेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा॥ जिस प्रकार घिसने, काटने, आग में तापने-पीटने, इन चार उपायों से सोने की परख की जाती है, वैसे ही त्याग, शील, गुण और कर्म, इन चारों से मनुष्य की पहचान होती है।।2।। व्यक्तित्व की पहचान, आदमी के शील-स्वभाव, उसके कर्म, उसके गुण और उसकी त्याग-भावना के द्वारा होती है। 62 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
तावद् भयेषु भेतव्यं यावद् भयमनगतम्। आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशंकया॥ भय से तभी तक डरना चाहिए, जब तक भय आए नहीं। आए हुए भय को देखकर निशंक होकर प्रहार करना चाहिए, अर्थात उस भय की परवाह नहीं करनी चाहिए॥३॥ भयभीत व्यक्ति अपने सारे कार्य भय के वशीभूत होकर बिगाड़ लेता है, लेकिन जो व्यक्ति भय के उपस्थित होने पर उसका विरोध करता है, उसका कार्य कभी खराब नहीं होता। एकोदरसमुद्भूताः एकनक्षत्रजातकाः। न भवन्ति समाः शीले यथा बदरिकंटका॥ एक ही माता के पेट से और एक ही नक्षत्र में जन्म लेने वाली संतान समान गुण और शील वाली नहीं होती, जैसे बेर के कांटे॥4॥ सभी बच्चों का स्वभाव अलग-अलग होता है। भले ही वे जुड़वां पैदा हुए हों। बेर के पेड़ पर फल भी लगता है और कांटे भी। यह ईश्वर की विचित्र लीला है जिसे समझना सरल नहीं। निःस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मंडनप्रियः। नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः॥ जिसका जिस वस्तु से लगाव नहीं है, उस वस्तु का वह अधिकारी नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सौंदर्य प्रेमी नहीं होगा तो श्रृंगार-शोभा के प्रति उसकी आसक्ति नहीं होगी। मूर्ख व्यक्ति प्रिय और मधुर वचन नहीं बोल पाता और स्पष्ट वक्ता कभी धोखेबाज, धूर्त या मक्कार नहीं होता॥5॥ जो व्यक्ति सहज है, जिसमें किसी के प्रति कोई लगाव या दुराव नहीं है, वह व्यक्ति व्यर्थ की साज-संवार से अपने को अलग 63 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
रखता है। जो चालाक और धूर्त होते हैं, वे ही मधुर वचन बोलते हैं, मूर्ख नहीं। साफ-साफ बोलने वाला कड़वा जरूर होता है, पर धोखेबाज नहीं होता। मूर्खाणां पंडिता द्वेष्याः अधनानां महाधनाः। वाराऽऽ ङ्गनाः कुलस्त्रीणां सुभगानां च दुर्भगाः॥ मूर्खों के पंडित, दरिद्रों के धनी, विधवाओं की सुहागिनें और वेश्याओं की कुल-धर्म रखने वाली पतिव्रता स्त्रियां शत्रु होती हैं॥6॥ यह सांसारिक नियम है कि मूर्ख व्यक्ति पंडितों से ईर्ष्या करते हैं, निर्धन व्यक्ति धनिकों से ईर्ष्या करते हैं। वेश्याएं या व्यभिचारिणी स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली कुल-वधुओं से ईर्ष्या करती हैं और विधवाएं सुहागिनों को देखकर अपने भाग्य को कोसती रहती हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। दूसरे को सुखी देखकर कोई सुखी नहीं होता। आलस्योपहता विद्या परहस्तगतं स्त्रियः। अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥ आलस्य से (अध्ययन न करना) विद्या नष्ट हो जाती है। दूसरे के पास गई स्त्री, बीज की कमी से खेती और सेनापति के न होने से सेना नष्ट हो जाती है॥7॥ युद्ध क्षेत्र में सेनानायक का अभाव सेना का मनोबल तोड़ देता है और वह शत्रु का सामना न करके भागने लगती है और हार जाती है। इसी प्रकार यदि खेत में पर्याप्त बीज न डाला जाए तो खेती अथवा उपज ठीक से नहीं हो पाती। दूसरे के पास गई स्त्री के सकुशल लौटने की उम्मीद कम ही रहती है और यदि 64 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri सम्पूर्ण चाणक्य नीति-4