सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
यहां चाणक्य लम्बे-पैने नाखून और सींगधारी पशुओं के माध्यम से यही बताना चाहते हैं कि हिंसक पशुओं पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। उनकी स्वाभाविक वृत्ति आक्रमणकारी होती है। वे कभी भी आक्रमण करके घायल कर सकते हैं और मृत्यु की ओर धकेल सकते हैं। इसी प्रकार नदी का वेग और उसकी गहराई के बारे में पूर्वानुमान लगाना कभी-कभी भारी खतरे में डाल देता है। नदी-तल में कोई गहरा गड्ढा छिपा हो सकता है और उसमें अचानक बाढ़ आ सकती है। पहाड़ों पर हुई वर्षा का जल कभी भी नदी में बढ़ सकता है इसलिए नदी के स्वभाव के बारे में भी कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, अर्थात अपने बचाव का प्रबंध किए बिना जल में प्रवेश नहीं करना चाहिए। यही दशा शस्त्रधारियों, स्त्रियों और राज-परिवारों की भी होती है। शस्त्रधारी कभी भी अपने शस्त्र का प्रयोग कर सकता है, स्त्री कभी भी धोखा दे सकती है और राज-परिवारों की स्वार्थ नीति पल-प्रतिपल बदलती रहती है। अतः इनसे सदैव सतर्क रहना चाहिए। विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम्। नीचादप्युत्तमा विद्या स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि॥ विष से अमृत, अशुद्ध स्थान से सोना, नीच कुल वाले से विद्या और दुष्ट स्वभाव वाले कुल की गुणी स्त्री को ग्रहण करना अनुचित नहीं है।।16।। चाणक्य की इस नीति का आशय यही है कि यदि विष से अमृत प्राप्त होता हो, अर्थात किसी ऐसी जहरीली जड़ी-बूटी से दुसाध्य रोग का निदान होता हो, जैसे सांप के जहर से ही सांप के काटे का इलाज करने वाली दवा बनाई जाती है तो उसे 25 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
स्वीकार करने में देर नहीं लगानी चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी अशुद्ध स्थान पर स्वर्ण अथवा स्वर्ण से निर्मित आभूषण पड़े मिलें तो उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। भाव यह है कि गुण जहां से भी मिलें, उन्हें ग्रहण करने में संकोच नहीं करना चाहिए। दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति में भी अगर कोई सद्गुण है तो उसे अवश्य ही ग्रहण करना चाहिए। यही बात आगे भी कही गई है कि यदि नीच कुल वाले व्यक्ति से श्रेष्ठ विद्या प्राप्त हो तो उसे तत्काल ग्रहण करें और दुष्ट कुल में जन्म लेने वाली स्त्री में यदि कुलीन गुणों अथवा किसी विशेष कला का प्रादुर्भाव हुआ हो तो उस स्त्री को पाने में संकोच नहीं करना चाहिए। भाव यही है कि श्रेष्ठ गुण जहां से भी और जिस स्थिति में भी प्राप्त होते हों, उन्हें ग्रहण करना श्रेष्ठता का ही प्रतीक है। स्त्रीणां द्विगुण आहारो बुद्धिस्तासां चतुर्गुणाः। साहसं षड्गुणं चैव कामोऽष्टगुण उच्यते॥ पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का भोजन दुगुना, लज्जा चौगुनी, साहस छः गुना और काम (रति इच्छा) आठ गुना अधिक होता है॥17॥ चाणक्य के अनुसार स्त्रियां पुरुषों से दो गुना भोजन करती हैं। स्त्रियों में लाज का भाव पुरुष से चार गुना होता है। उनमें साहस पुरुष से छः गुना होता है, अर्थात स्त्री किसी भी पुरुष से अधिक सहनशील और साहसी होती है। इसके अतिरिक्त स्त्री में रति इच्छा पुरुष से आठ गुना अधिक होती है। चाणक्य ने ये निष्कर्ष किस आधार पर निकाले थे इस विषय में विश्वासपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में आज की स्थिति सर्वथा भिन्न है। आज पुरुष 26
का भोजन निश्चित रूप से स्त्री से अधिक है। लज्जा के बारे में निश्चित ही कहा जा सकता है कि स्त्री में लज्जा पुरुष से कहीं अधिक होती है। स्त्री पुरुष की भांति बेशर्म नहीं हो सकती। तीसरे, साहस के मामले में भी पुरुष स्त्री से कहीं अधिक साहसी होता है परंतु सहनशीलता में स्त्री पुरुष से मीलों आगे है। स्त्री के मन की थाह पाना आसान नहीं है। वह अत्यन्त साहस के साथ कितनी ही निजी जीवन की बातों को छिपाकर रख सकती है। जहां तक उसमें काम-भावना की बात है, तो पुरुष ही उससे अधिक कामी दिखाई पड़ता है। स्त्री एक पुरुष के साथ सारा जीवन गुजार सकती है, पर एक कामुक पुरुष एक स्त्री से संतुष्ट नहीं हो पाता। इतना अवश्य सुना है कि स्त्री जब कामांध होती है, तब उसे रोक पाना किसी के भी बूते के बाहर होता है। यदि इसे चाणक्य ने आधार माना है तो ठीक ही है। 27
§ अथ द्वितीय अध्याय § अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलुब्धता। अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥ झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, छल-कपट, मूर्खता, अत्यधिक लालच करना, अशुद्धता और दयाहीनता, ये सभी प्रकार के दोष स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से मिलते हैं।।1।। स्त्रियों के विषय में चाणक्य की उपर्युक्त धारणा का कारण क्या रहा था, यह कहना तो कठिन है, परंतु सभी स्त्रियों में ये स्वाभाविक दुर्गुण हों, यह संभव नहीं है। चाणक्य के काल में स्त्री-शिक्षा का निश्चित रूप से अकाल रहा होगा। इसी आधार पर चाणक्य ने स्त्री को मूर्ख, लालची, अशुद्ध, झूठी, छली आदि कहा होगा, लेकिन दयाहीनता की भावना स्त्री का स्वाभाविक दोष नहीं माना जा सकता। इनमें से बहुत-से दोष पुरुषों में भी देखे जा सकते हैं। बल्कि झूठ बोलना, छल-कपट करना, दयाहीनता, लालच आदि दोष तो पुरुष वर्ग में ही अधिक पाए जा सकते हैं। गुण और दोष स्वभाव से भी होते हैं और उन्हें अर्जित भी किया जाता है, परंतु ये सभी परिस्थिति पर अधिक निर्भर करते हैं। 28 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वर्रांगना। विभवो दानशक्तिश्च नाऽल्पस्य तपसः फलम्॥ भोजन करने तथा उसे अच्छी तरह से पचाने की शक्ति हो तथा अच्छा भोजन समय पर प्राप्त होता हो, प्रेम करने के लिए अर्थात रति-सुख प्रदान करने वाली उत्तम स्त्री के साथ संसर्ग हो, खूब सारा धन और उस धन को दान करने का उत्साह हो, ये सभी सुख किसी तपस्या के फल के समान हैं, अर्थात कठिन साधना के बाद ही प्राप्त होते हैं॥2॥ चाणक्य का विश्वास है कि शुद्ध और सुपाच्य भोजन का मिलना और उसे अच्छी तरह पचाने की शक्ति भाग्य से ही मिलती है या फिर अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा ही गरिष्ठ अथवा पौष्टिक भोजन पचाया जा सकता है और अच्छे स्वास्थ्य वाला व्यक्ति ही स्त्री के साथ रति-सुख का आनन्द ले सकता है। स्वस्थ व्यक्ति पूरे उत्साह के साथ धन भी उपार्जित कर सकता है और उसी उत्साह से उसे दान करने की क्षमता भी अपने भीतर उत्पन्न कर सकता है। जो स्वस्थ नहीं है, कमजोर है, जिसकी पाचन क्रिया ठीक नहीं है, जो सदैव बीमार और रोगग्रस्त रहता है, उसे यदि अच्छा भोजन, स्वस्थ और सुंदर युवती तथा विपुल धन-वैभव प्राप्त हो भी जाए तो वह उनका उपयोग नहीं कर सकता। अतः अच्छा स्वास्थ्य साधना के द्वारा ही संभव है। यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दाऽनुगामिनी। विभवे यश्च संतुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि॥ जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो, स्त्री उसके अनुसार चलने वाली हो, अर्थात पतिव्रता हो, जो अपने पास धन से संतुष्ट रहता हो, उसका स्वर्ग यहीं पर है॥3॥ 29 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
मनुष्य को आज के जीवन में अथवा किसी भी काल में क्या चाहिए? यही कि उसकी संतान उसके कहने में चलती हो, आज्ञाकारी हो। उसकी स्त्री पतिव्रता हो, अर्थात् उसी के प्रति पूरी तरह समर्पित हो और जो धन-वैभव उसे मिला हो, वह उसी पर संतोष धारण किए हो तो उसे किसी स्वर्ग को परलोक में तलाश करने की आवश्यकता नहीं है। वह सुख, वह स्वर्ग तो उसके पास इसी लोक में है। कहने का आशय यही है कि आदमी को सदैव संतोषी होना चाहिए। उसे परमात्मा ने जो दिया है या प्रयत्न से उसने जो कुछ भी अर्जित किया है, वह उसी पर संतोष करे। कहा भी है—'संतोष सबसे बड़ा धन है।' इसी प्रकार यदि उसने अपनी संतान में श्रेष्ठ गुणों का समावेश कराया है तो उसकी संतान निश्चित रूप से आज्ञाकारी होगी। यह स्वभाव भी तभी उत्पन्न होता है, जब उसने अपने बच्चों को भी संतोष करना सिखाया हो। यही स्थिति पत्नी के साथ भी है। पत्नी में यदि कहीं असंतोष की भावना पनप रही है तो वह भावना उसी तक सीमित नहीं रहती, वह उसके बच्चों में भी पनपने लगती है। इस प्रकार असंतोष के जन्म लेते ही सारा परिवार बिखरकर रह जाता है और जो व्यक्ति अपने ही परिवार से अप्रसन्न हो, परेशान हो, वह व्यक्ति धनवान होते हुए भी नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हो जाता है। मूल भाव यही है कि परिवार का पूरा उत्तरदायित्व यदि पिता संभालता है तो निश्चित रूप से उसकी पत्नी तथा उसकी संतान उसकी आज्ञाकारिणी होगी। 30
ते पुत्रा ये पितृर्भक्ताः सः पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥ पुत्र वे ही हैं जो पिता भक्त हैं। पिता वही है जो बच्चों का पालन-पोषण करता है। मित्र वही है जिसमें पूर्ण विश्वास हो और स्त्री वही है जिससे परिवार में सुख-शान्ति व्याप्त हो।।4।। जो पुत्र अपने माता-पिता की सेवा करता है, वही वास्तव में पुत्र कहलाने का अधिकारी है। इतिहास में श्रवण कुमार की पितृ-भक्ति की कथा मिलती है, परंतु यह तभी संभव है, जब पिता भी अपने बच्चों के भरण-पोषण के दायित्व को समझता हो। यदि पिता अपने बच्चों के भरण-पोषण की चिंता न करके अपने ही व्यसनों में लिप्त रहता है तो न तो उसके बच्चे उसका आदर करेंगे और न उसकी पत्नी ही उसके प्रति समर्पित होगी। मित्र की परख बड़ी कठिन है। कठिन स्थितियों में जो बराबर साथ देता है, उसे मित्र समझा जा सकता है। इसके अलावा जिस स्त्री के हाव-भाव से स्नेह की वर्षा होती है, जिसकी वाणी में मिठास होती है, जिसमें गहरी सहनशक्ति होती है, जो हर परिस्थिति में परिवार को संजोए रहती है, जो दुर्दिन में पति की सबसे बड़ी संबल बनी रहती है, जो कुशल गृहिणी के कर्तव्य का पूरा-पूरा पालन करती है, ऐसी पत्नी से घर सुख-शान्ति से भरपूर रहता है। परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥ जो मित्र प्रत्यक्ष रूप से मधुर वचन बोलता हो और पीठ पीछे अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से आपके सारे कार्यों में रोड़ा अटकाता हो, ऐसे मित्र को उस घड़े के समान त्याग देना चाहिए जिसके भीतर विष भरा हो और ऊपर मुंह के पास दूध भरा हो।।5।। 31
ऐसा मित्र, जो आपके मुंह पर तो मीठी-मीठी और चिकनी-चुपड़ी खुशामदी बातें करता हो और पीठ पीछे आपकी बुराई करता हो, आपके सारे कार्यों में विघ्न डालता हो, उसे तत्काल छोड़ देना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग मित्र नहीं परम शत्रु होते हैं। ऐसे व्यक्ति 'आस्तीन के सांप' होते हैं। वे उसी प्रकार धोखा देने वाले होते हैं, जैसे कोई विष भरे घड़े के मुंह में गर्दन के आस-पास थोड़ा-सा दूध डालकर देने चला आए। वास्तविक मित्र वही होता है जो मुंह पर तो खरी-खोटी सुना देता है पर पीठ पीछे किसी को अपने मित्र की न तो निन्दा करने देता है और न उसके किसी कार्य को बिगाड़ने देता है। न विश्वसेत् कुमित्रे च मित्रे चाऽपि न विश्वसेत्। कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत्॥ बुरे मित्र पर और अपने मित्र पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि कभी नाराज होने पर संभवतः आपका विशिष्ट मित्र भी आपके सारे रहस्यों को प्रकट कर सकता है॥6॥ चाणक्य यहां मित्र के बारे में अत्यन्त सावधानी बरतने की ओर संकेत कर रहे हैं। उनका कहना है कि जो आपका विरोधी है, पर मित्र होने का दावा करता है, उस पर तो कभी विश्वास करना ही नहीं चाहिए। इसके अलावा जो आपका विश्वसनीय मित्र है, उसे भी आपको अपने परिवार तथा अपनी कोई भी बात ऐसी नहीं बतानी चाहिए जो आपको कभी शर्मिन्दा कर सके क्योंकि संभवतः किन्हीं विशेष परिस्थितियों में आपका मित्र यदि आपसे नाराज हो जाए तो वह आपके परिवार तथा आपके जीवन के उन अप्रिय गूढ़तम रहस्यों को प्रकट कर सकता है और आपको अपमानित होने तक की स्थिति में ला सकता है। 32 सम्पूर्ण चाणक्य नीति—2
मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्। मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चाऽपि नियोजयेत्॥ मन से विचारे गए कार्य को कभी किसी से नहीं कहना चाहिए, अपितु उसे मंत्र की तरह रक्षित करके अपने (सोचे हुए) कार्य को करते रहना चाहिए॥7॥ अपनी योजना को बता देने से उसका गूढ़ महत्त्व कम हो जाता है। कभी-कभी मित्रगण ही ईर्ष्या के वशीभूत होकर आपको हतोत्साहित करने लग जाते हैं या फिर उसमें रोड़ा अटका देते हैं। वास्तव में आपने स्वयं अपनी योजना के विषय में जितना सोचा-समझा होता है, उतना दूसरे ने नहीं। आप तभी अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, जब आप अपने सोचे हुए कार्य पर अपनी शक्ति के अनुसार स्वयं अमल करें। उसे तब तक छिपाकर रखना चाहिए, जब तक जरूरी न हो जाए। अन्यथा कोई दूसरा ही आपसे पहले उसका लाभ उठा सकता है। कष्टं च खलु मूर्खत्वं कष्टं च खलु यौवनम्। कष्टात्कष्टतरं चैव परगेहनिवासनम्॥ निश्चित रूप से मूर्खता दुःखदायी है और यौवन भी दुःख देने वाला है परंतु कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरे के घर पर रहना है॥8॥ निश्चित रूप से मूर्ख व्यक्ति का समाज में कोई सम्मान नहीं है। विवेकहीन व्यक्ति को पग-पग पर अपमानित होना पड़ता है और परिहास का पात्र बनना पड़ता है। इसी प्रकार यौवन के आने पर भी आदमी कभी-कभी अपना विवेक और आपा खो बैठता है। जवानी में आदमी का जोश और उत्साह तो खूब बढ़ा-चढ़ा होता है, पर वह अपना होश खोए रहता है। उसमें अपनी शक्ति का अहम इस कदर बढ़ जाता है कि उसे अपने सामने वाला व्यक्ति तुच्छ दिखाई देने लगता है। उसका 33
यह अहंकार ही उसे दुःख पहुंचाता है। चाणक्य का कहना है कि किसी को विवशता में जब दूसरे के घर पर निर्भर रहना पड़े तो उसका अपना वर्चस्व समाप्त हो जाता है। उसे दूसरे की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। उसकी स्वाधीनता नष्ट हो जाती है। यही उसके दुःखों का सबसे बड़ा कारण है। शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे। साधवो न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने॥ हर एक पर्वत में मणि नहीं होती और हर एक हाथी में मुक्तामणि नहीं होती। साधु लोग सभी जगह नहीं मिलते और हर एक वन में चंदन के वृक्ष नहीं होते॥9॥ चाणक्य का यहां आशय यही है कि अच्छी चीजें सभी जगह प्राप्त नहीं होतीं। पर्वतशृंखलाओं के मध्य खनिज पदार्थ भरे पड़े हैं। उनमें हीरे-जवाहरातों की खाने भी हैं परंतु सभी पर्वतों में ये प्राप्त नहीं होते। इसी तरह प्रत्येक हाथी के मस्तक में मुक्तामणि नहीं होती, हर एक वन में चन्दन के वृक्ष और सभी जगह साधु अर्थात् सज्जन पुरुष नहीं मिलते। विशेष गुण वाली वस्तुओं को विशिष्ट स्थानों में ही खोजना पड़ता है। पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः। नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥ बुद्धिमान लोगों का कर्त्तव्य होता है कि वे अपनी संतान को अच्छे कार्य-व्यापार में लगाएं क्योंकि नीति के जानकार व सद्व्यवहार वाले व्यक्ति ही कुल में सम्मानित होते हैं॥10॥ आचार्य चाणक्य का विचार है कि माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कारों से युक्त करें, जिससे जीवन में उन्हें कोई कठिनाई न हो। अच्छे और श्रेष्ठ 34 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
संस्कारवान बच्चे ही अपने कुल का नाम रोशन करते हैं। समाज उन्हें सम्मानित करता है। माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः। न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥ जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, वे उनके शत्रु हैं। ऐसे अपढ़ बालक सभा के मध्य में उसी प्रकार शोभा नहीं पाते, जैसे हंसों के मध्य में बगुला शोभा नहीं पाता।।11।। बच्चे देश का भविष्य होते हैं। किसी भी राष्ट्र का चरित्र, वहां के बच्चों में देखा जा सकता है। इसी बात को ध्यान में रखकर आचार्य चाणक्य ने माता-पिता को उनके बच्चों की ओर से सचेत किया है। माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिलाएं ताकि वे विद्वानों के मध्य बैठकर शोभा पा सकें। अपने संस्कारों और शिक्षा के तेज से ही वे शोभा पाते हैं। अन्यथा जैसे एक बगुला हंसों के बीच में शोभा नहीं पाता, उसी तरह मूर्ख और अनपढ़ बच्चे विद्वानों के मध्य शोभा नहीं पाते। शिक्षा से विहीन व्यक्ति बिना पूंछ का जानवर ही कहलाता है। अपने बच्चों को शिक्षित न करने वाले माता-पिता उसके शत्रु हैं। लालनाद् बहवो दोषास्ताडनाद् बहवो गुणाः। तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत्॥ अत्यधिक लाड़-प्यार से पुत्र और शिष्य गुणहीन हो जाते हैं और ताड़ना से गुणी हो जाते हैं। भाव यही है कि शिष्य और पुत्र को यदि ताड़ना का भय रहेगा तो वे गलत मार्ग पर नहीं जाएंगे।।12।। माता-पिता और गुरु की ताड़ना के पीछे पुत्र और शिष्य को ऊपर उठाने की भावना रहती है। वे उसे शारीरिक कष्ट 35 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
नहीं देना चाहते। यदि वे ऐसा करते भी हैं तो भीतर से उनका कोमल हृदय दुःखी होता है। माता-पिता और गुरु की मार-पिटाई के पीछे बच्चे का भविष्य छिपा होता है। यदि वे उसे अधिक लाड़-प्यार करें तो वह ढीठ होकर बिगड़ जाता है इसलिए उन्हें डांटना-फटकारना उनकी भलाई के लिए ही होता है। श्लोकेन वा तदर्धेन पादेनैकाक्षरेण वा। अबन्ध्यं दिवसं कुर्याद् दानाध्ययनकर्मभिः॥ एक श्लोक, आधा श्लोक, श्लोक का एक चरण, उसका आधा अथवा एक अक्षर ही सही या आधा अक्षर प्रतिदिन पढ़ना चाहिए॥13॥ आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक के द्वारा शिक्षा के महत्त्व को दर्शाया है। उनका कहना है कि मानव-जीवन सभी जीवों में श्रेष्ठ है इसीलिए मनुष्य को अपना जीवन सफल बनाने के लिए अध्ययन, दूसरों की भलाई अथवा दान अवश्य करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि जीवन का एक नियम बना लेना चाहिए कि प्रतिदिन चाहे हम आधा अक्षर ही पढ़ें, पर पढ़ें जरूर। स्वाध्याय से ही ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान से ईश्वर की प्राप्ति होती है। शिक्षा से ही लोक-व्यवहार का रहस्य प्रकट होता है। कान्तावियोगः स्वजनापमानः ऋणस्य शेषं कुनृपस्य सेवा। दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥ स्त्री का वियोग, अपने लोगों से अनाचार, कर्ज का बंधन, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता और अपने प्रतिकूल सभा, ये सभी अग्नि न होते हुए भी शरीर को दग्ध कर देते हैं॥14॥ आचार्य चाणक्य का कहना है कि पत्नी का वियोग 36 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
आदमी को तोड़कर रख देता है। वह असहाय और अकेला रह जाता है। उसके दुःख-सुख का कोई साथी नहीं होता। इसी तरह अपने ही लोगों के द्वारा अपमानित होना सर्वाधिक दुःख पहुंचाता है। व्यक्ति यदि कर्ज न चुका पाए तो उसे पग-पग पर अपमानित होना पड़ता है। जीवन में दरिद्र होने का दुःख सबसे बड़ा है। वह अपनी निर्धनता के कारण अपना सिर गर्व से नहीं उठा पाता। इसी भांति जब आदमी अपने प्रतिकूल किसी सभा का आयोजन देखता है, अर्थात्-समाज में उसे भला-बुरा कहा जाता है तो उसे मर्मान्तक पीड़ा होती है। चाणक्य ने कहा कि ये चीजें यद्यपि आग नहीं हैं, पर इनके द्वारा आदमी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व जलकर राख हो जाता है। नदीतीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनी। मन्त्रिहीनाश्च राजानः शीघ्रं नश्यन्त्यसंशम्॥ नदी के किनारे खड़े वृक्ष, दूसरे के घर में गई स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इसमें संशय नहीं करना चाहिए।।15।। बरसात के दिनों में नदी में जब बाढ़ आती है, तब उसके किनारे खड़े वृक्ष उखड़कर पानी में गिर जाते हैं और बह जाते हैं। इसी प्रकार स्त्री यदि दूसरे के घर में रहेगी तो यह भरोसा नहीं कि वह कब भ्रष्ट हो जाए या पतन के मार्ग पर बढ़ जाए, अर्थात स्त्री को दूसरे के घर में नहीं रहने देना चाहिए। इसी प्रकार जिस राजा को उचित सलाह देने वाला गुणी मंत्री नहीं होगा, वह राजा अपनी गलत हरकतों द्वारा शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। इसमें कदापि संदेह नहीं करना चाहिए। 37
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा। वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां परिचर्यका॥ ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल छोटा बनकर रहना, अर्थात सेवा-कर्म करना है।।16।। विद्याविहीन, ज्ञानरहित ब्राह्मण की कोई शक्ति नहीं होती, धन यदि वणिक (व्यापारी) के पास न हो तो वह व्यापार करने में असफल हो जाता है। इसलिए धन का होना उसके लिए परम आवश्यक है। इसी प्रकार यदि शूद्र व्यक्ति अपने सेवा कर्म से पीछे हटता है तो वह एक तरह से अपनी शक्ति को ही क्षीण करता है। आचार्य चाणक्य ने भारतीय वर्ण-व्यवस्था, अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की शक्तियों का यहां परिचय दिया है। भले ही आज के युग में अपने-अपने कर्म से वर्ण-व्यवस्था की स्थिति को नकार दिया गया हो, पर प्राचीन काल से चली आ रही इस वर्ण-व्यवस्था के मूल में एक सुव्यवस्थित समाज की संरचना का रहस्य छिपा हुआ है। निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्। खगाः वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागतो गृहम्॥ वेश्या निर्धन मनुष्य को, प्रजा पराजित राजा को, पक्षी फलरहित वृक्ष को व अतिथि उस घर को, जिसमें वे आमंत्रित किए जाते हैं, को भोजन करने के पश्चात छोड़ देते हैं।।17।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में सहज अनुभवजन्य बातों को समझाया है। उनका कहना है कि जेब में जब धन न हो तब वेश्या के पास नहीं जाना चाहिए क्योंकि वेश्या को सिर्फ धन से ही मतलब होता है। यह वेश्या का स्वभाव ही है। 38
इसी प्रकार राजा के पराजित होकर अपमानित होने पर प्रजा भी उसका साथ छोड़ देती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार फलरहित वृक्ष को त्यागकर पक्षी उड़ जाते हैं, उसी प्रकार अतिथि को भोजन करने के बाद गृहस्थ का घर छोड़ देना चाहिए। जो वस्तुएं गुणहीन हैं, वे त्याज्य हैं, उनका कभी साथ नहीं करना चाहिए। गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्। प्राप्तविद्या गुरुं शिष्याः दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा॥ ब्राह्मण दक्षिणा ग्रहण करके यजमान को, शिष्य विद्याध्ययन करने के उपरान्त अपने गुरु को और हिरण जले हुए वन को त्याग देते हैं॥18॥ इस श्लोक में चाणक्य ने कहा है कि किसी प्रयोजन के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी के पास जाता है तो उसे कार्य पूरा होते ही वह जगह छोड़ देनी चाहिए। उद्देश्य पूर्ति होने के बाद वहां रुकना किसी भी दृष्टि से उत्तम नहीं है। दुराचारी च दुर्द्दष्टिर्दुराऽऽवासी च दुर्जनः। यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति॥ बुरा आचरण अर्थात दुराचारी के साथ रहने से, पाप दृष्टि रखने वाले का साथ करने से तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है।।19।। बुरी संगति का सदैव बुरा असर पड़ता है। यहां चाणक्य ने इसी ओर ध्यान खींचा है। दुश्चरित्र व्यक्ति का साथ करने अथवा गलत जगहों पर जाने या रहने से मनुष्य का चरित्र नष्ट हो जाता है। जिस व्यक्ति का चरित्र नष्ट हो जाता है, वह जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान है। 39
समाने शोभते प्रीतिः राज्ञि सेवा च शोभते। वाणिज्यं व्यवहारेषु दिव्या स्त्री शोभते गृहे॥ मित्रता बराबर वालों में शोभा पाती है, नौकरी राजा की अच्छी होती है, व्यवहार में कुशल व्यापारी और घर में सुंदर स्त्री शोभा पाती है॥20॥ मित्रता कभी भी दो स्तर वालों में सफल नहीं होती। एक-सा स्वभाव, एक समान समाज में जीवन स्तर, एक-से कर्म दो व्यक्तियों के बीच में मित्रता के आधार हो सकते हैं। नौकरी हमेशा सरकारी अच्छी होती है क्योंकि इसमें स्थायित्व होता है। जो व्यापारी चतुर और व्यवहार-कुशल होता है, वह इस समाज में सम्मान का पात्र होता है और सुंदर स्त्री घर में ही शोभनीय होती है। 40
॥ अथ तृतीय अध्याय ॥ कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः। व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम्॥ दोष किसके कुल में नहीं है? कौन ऐसा है, जिसे दुःख ने नहीं सताया? अवगुण किसे प्राप्त नहीं हुए? सदैव सुखी कौन रहता है?॥1॥ यह संसार दुःखों का सागर है। इस संसार में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसे दुःख न हुआ हो। सभी व्यक्तियों में कुछ-न-कुछ दुःख, रोग और अवगुण अथवा कुछ-न-कुछ बुरी आदतें पाई जाती हैं। इस संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो सदैव सुखी रहता हो। उसे किसी-न-किसी तरह के संकटों का, दुखों का, रोगों का, बुरी आदतों का सामना करना ही पड़ता है। दुःख और सुख तो साथ-साथ लगे ही रहते हैं। जैसे रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आती है। आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्। सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥ मनुष्य का आचरण-व्यवहार उसके खानदान को बताता 41 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
है, भाषण अर्थात उसकी बोली से देश का पता चलता है, विशेष आदर-सत्कार से उसके प्रेमभाव का तथा उसके शरीर से भोजन का पता चलता है।।2।। मनुष्य के स्वभाव से, उसकी बातचीत से, उसके व्यवहार से और उसके शरीर से कितनी ही बातों का पता बिना परिचय के ही लगाया जा सकता है, जो आदमी शान्त और शील स्वभाव का होगा, जिसका आचरण, व्यवहार आदि सहृदय होगा, वह व्यक्ति निश्चित रूप से उच्च कुल का होगा, परंतु जिसका व्यवहार दुष्टता से भरा होगा, वह निश्चय ही नीच खानदान का होगा। इसी प्रकार आदमी की बोल-चाल से उसके स्थान का पता चल जाता है कि वह कहां का रहने वाला है, क्योंकि उसकी बोली में स्थानीय शब्दों का पुट आ जाता है। आदमी के आदर-सत्कार से उसके प्रेमभाव का पता चल जाता है कि वह सच्चा है अथवा झूठा या दिखावटी है। इसी तरह आदमी के स्वस्थ और दुबले-पतले शरीर को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह आदमी कैसी खुराक खाता होगा। ये सभी सामान्य बातें हैं। कभी-कभी अति मृदु व्यवहार करने वाला व्यक्ति अत्यन्त दुष्ट व चालाक निकलता है और अत्यधिक दुबला-पतला व्यक्ति बहुत ज्यादा खाना खाता है। अपवाद सभी जगह मिल जाते हैं। सुकुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत्। व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत्॥ कन्या का विवाह अच्छे कुल में करना चाहिए। पुत्र को विद्या के साथ जोड़ना चाहिए। दुश्मन को विपत्ति में डालना चाहिए और मित्र को अच्छे कार्यों में लगाना चाहिए॥3॥ आचार्य चाणक्य का कथन है कि समझदार व्यक्ति 42 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अपनी पुत्री का विवाह वर पक्ष के खानदान को अच्छी तरह परखकर ही करता है। वह अपने पुत्र को अच्छी और उच्च शिक्षा प्रदान करता है या कराता है। शत्रु यदि निकट आ जाए तो उसे विपत्ति में डाल देता है और अपने प्रिय मित्र को वह अच्छे और महत्त्वपूर्ण कार्यों में लगाता है। दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः। सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे॥ दुर्जन और सर्प के सामने आने पर सर्प का वरण करना उचित है, न कि दुर्जन का, क्योंकि सर्प तो एक ही बार डसता है, परंतु दुर्जन व्यक्ति कदम-कदम पर बार-बार डसता है॥4॥ आचार्य चाणक्य ने कहा है कि सर्प और दुष्ट व्यक्ति में से यदि किसी का चुनाव करना पड़ जाए तो सर्प का ही चुनाव करना चाहिए न कि दुष्ट व्यक्ति का, क्योंकि सांप तो एक ही बार डसकर छोड़ देगा, परंतु दुष्ट व्यक्ति जीवन-भर कष्ट पहुंचाता रहेगा। इसका भाव यही है कि सांप तो तभी काटेगा, जब उसके ऊपर बेध्यानी में पांव पड़ जाए और उसे आपके द्वारा कष्ट पहुंचे, लेकिन दुष्ट व्यक्ति अपनी आदत के अनुसार बिना कारण के भी कष्ट पहुंचाता रहेगा। एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्। आदिमध्याऽवसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥ इसीलिए राजा खानदानी लोगों को ही अपने पास एकत्र करता है क्योंकि कुलीन अर्थात अच्छे खानदान वाले लोग प्रारम्भ में, मध्य में और अंत में, राजा को किसी दशा में भी नहीं त्यागते॥5॥ भाव यही है कि खानदानी अर्थात कुलीन वंश के लोगों का यह स्वाभाविक गुण होता है कि वे सम-विषम स्थितियों में भी राजा का साथ नहीं छोड़ते। राजा के हर सुख-दुःख में 43
अध्याय ४-६: कर्म-फल, पुत्र-पालन व लोक-व्यवहार
वे सदैव साथ रहते हैं और राजा के प्रति अपनी स्वामिभक्ति को नहीं छोड़ते। कुलीन वंश के लोग किसी भी परिस्थिति में अपनी वफादारी पर कभी आंच नहीं आने देते। प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः। सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥ प्रलय काल में सागर भी अपनी मर्यादा को नष्ट कर डालते हैं परंतु साधु लोग प्रलय काल के आने पर भी अपनी मर्यादा को नष्ट नहीं होने देते॥6॥ समुद्र की मर्यादा प्रसिद्ध है कि उसमें कितना ही जल गिरता जाए, पर वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, लेकिन प्रलय काल में सागर की मर्यादा भी छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाती है, मगर साधु पुरुष अपने कर्त्तव्य पथ से कभी नहीं हटते। अतः सागर की विशालता साधु पुरुष के हृदय की विशालता के सामने तुच्छ है। बड़ी-बड़ी भयानक लहरें धरती को लील जाती हैं, परंतु साधु पुरुष कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी अपनी मर्यादा को नहीं छोड़ते इसीलिए साधु पुरुष को सागर से भी गंभीर और मर्यादित माना गया है। मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः। भिनत्ति वाक्शल्येन अदृष्टः कण्टको यथा॥ मूर्ख व्यक्ति से बचना चाहिए। वह प्रत्यक्ष में दो पैरों वाला पशु है। जिस प्रकार बिना आंख वाले अर्थात अंधे व्यक्ति को कांटे भेदते हैं, उसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपने कटु व अज्ञान से भरे वचनों से भेदता है॥7॥ मूर्ख व्यक्ति का कभी साथ नहीं करना चाहिए। वह बिना 44 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri