भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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अपनी पुत्री का विवाह वर पक्ष के खानदान को अच्छी तरह परखकर ही करता है। वह अपने पुत्र को अच्छी और उच्च शिक्षा प्रदान करता है या कराता है। शत्रु यदि निकट आ जाए तो उसे विपत्ति में डाल देता है और अपने प्रिय मित्र को वह अच्छे और महत्त्वपूर्ण कार्यों में लगाता है। दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः। सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे॥ दुर्जन और सर्प के सामने आने पर सर्प का वरण करना उचित है, न कि दुर्जन का, क्योंकि सर्प तो एक ही बार डसता है, परंतु दुर्जन व्यक्ति कदम-कदम पर बार-बार डसता है॥4॥ आचार्य चाणक्य ने कहा है कि सर्प और दुष्ट व्यक्ति में से यदि किसी का चुनाव करना पड़ जाए तो सर्प का ही चुनाव करना चाहिए न कि दुष्ट व्यक्ति का, क्योंकि सांप तो एक ही बार डसकर छोड़ देगा, परंतु दुष्ट व्यक्ति जीवन-भर कष्ट पहुंचाता रहेगा। इसका भाव यही है कि सांप तो तभी काटेगा, जब उसके ऊपर बेध्यानी में पांव पड़ जाए और उसे आपके द्वारा कष्ट पहुंचे, लेकिन दुष्ट व्यक्ति अपनी आदत के अनुसार बिना कारण के भी कष्ट पहुंचाता रहेगा। एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम्। आदिमध्याऽवसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम्॥ इसीलिए राजा खानदानी लोगों को ही अपने पास एकत्र करता है क्योंकि कुलीन अर्थात अच्छे खानदान वाले लोग प्रारम्भ में, मध्य में और अंत में, राजा को किसी दशा में भी नहीं त्यागते॥5॥ भाव यही है कि खानदानी अर्थात कुलीन वंश के लोगों का यह स्वाभाविक गुण होता है कि वे सम-विषम स्थितियों में भी राजा का साथ नहीं छोड़ते। राजा के हर सुख-दुःख में 43