सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवे सदैव साथ रहते हैं और राजा के प्रति अपनी स्वामिभक्ति को नहीं छोड़ते। कुलीन वंश के लोग किसी भी परिस्थिति में अपनी वफादारी पर कभी आंच नहीं आने देते। प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः। सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः॥ प्रलय काल में सागर भी अपनी मर्यादा को नष्ट कर डालते हैं परंतु साधु लोग प्रलय काल के आने पर भी अपनी मर्यादा को नष्ट नहीं होने देते॥6॥ समुद्र की मर्यादा प्रसिद्ध है कि उसमें कितना ही जल गिरता जाए, पर वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, लेकिन प्रलय काल में सागर की मर्यादा भी छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाती है, मगर साधु पुरुष अपने कर्त्तव्य पथ से कभी नहीं हटते। अतः सागर की विशालता साधु पुरुष के हृदय की विशालता के सामने तुच्छ है। बड़ी-बड़ी भयानक लहरें धरती को लील जाती हैं, परंतु साधु पुरुष कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी अपनी मर्यादा को नहीं छोड़ते इसीलिए साधु पुरुष को सागर से भी गंभीर और मर्यादित माना गया है। मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः। भिनत्ति वाक्शल्येन अदृष्टः कण्टको यथा॥ मूर्ख व्यक्ति से बचना चाहिए। वह प्रत्यक्ष में दो पैरों वाला पशु है। जिस प्रकार बिना आंख वाले अर्थात अंधे व्यक्ति को कांटे भेदते हैं, उसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपने कटु व अज्ञान से भरे वचनों से भेदता है॥7॥ मूर्ख व्यक्ति का कभी साथ नहीं करना चाहिए। वह बिना 44 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri