सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्। मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चाऽपि नियोजयेत्॥ मन से विचारे गए कार्य को कभी किसी से नहीं कहना चाहिए, अपितु उसे मंत्र की तरह रक्षित करके अपने (सोचे हुए) कार्य को करते रहना चाहिए॥7॥ अपनी योजना को बता देने से उसका गूढ़ महत्त्व कम हो जाता है। कभी-कभी मित्रगण ही ईर्ष्या के वशीभूत होकर आपको हतोत्साहित करने लग जाते हैं या फिर उसमें रोड़ा अटका देते हैं। वास्तव में आपने स्वयं अपनी योजना के विषय में जितना सोचा-समझा होता है, उतना दूसरे ने नहीं। आप तभी अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, जब आप अपने सोचे हुए कार्य पर अपनी शक्ति के अनुसार स्वयं अमल करें। उसे तब तक छिपाकर रखना चाहिए, जब तक जरूरी न हो जाए। अन्यथा कोई दूसरा ही आपसे पहले उसका लाभ उठा सकता है। कष्टं च खलु मूर्खत्वं कष्टं च खलु यौवनम्। कष्टात्कष्टतरं चैव परगेहनिवासनम्॥ निश्चित रूप से मूर्खता दुःखदायी है और यौवन भी दुःख देने वाला है परंतु कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरे के घर पर रहना है॥8॥ निश्चित रूप से मूर्ख व्यक्ति का समाज में कोई सम्मान नहीं है। विवेकहीन व्यक्ति को पग-पग पर अपमानित होना पड़ता है और परिहास का पात्र बनना पड़ता है। इसी प्रकार यौवन के आने पर भी आदमी कभी-कभी अपना विवेक और आपा खो बैठता है। जवानी में आदमी का जोश और उत्साह तो खूब बढ़ा-चढ़ा होता है, पर वह अपना होश खोए रहता है। उसमें अपनी शक्ति का अहम इस कदर बढ़ जाता है कि उसे अपने सामने वाला व्यक्ति तुच्छ दिखाई देने लगता है। उसका 33