सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह अहंकार ही उसे दुःख पहुंचाता है। चाणक्य का कहना है कि किसी को विवशता में जब दूसरे के घर पर निर्भर रहना पड़े तो उसका अपना वर्चस्व समाप्त हो जाता है। उसे दूसरे की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। उसकी स्वाधीनता नष्ट हो जाती है। यही उसके दुःखों का सबसे बड़ा कारण है। शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे। साधवो न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने॥ हर एक पर्वत में मणि नहीं होती और हर एक हाथी में मुक्तामणि नहीं होती। साधु लोग सभी जगह नहीं मिलते और हर एक वन में चंदन के वृक्ष नहीं होते॥9॥ चाणक्य का यहां आशय यही है कि अच्छी चीजें सभी जगह प्राप्त नहीं होतीं। पर्वतशृंखलाओं के मध्य खनिज पदार्थ भरे पड़े हैं। उनमें हीरे-जवाहरातों की खाने भी हैं परंतु सभी पर्वतों में ये प्राप्त नहीं होते। इसी तरह प्रत्येक हाथी के मस्तक में मुक्तामणि नहीं होती, हर एक वन में चन्दन के वृक्ष और सभी जगह साधु अर्थात् सज्जन पुरुष नहीं मिलते। विशेष गुण वाली वस्तुओं को विशिष्ट स्थानों में ही खोजना पड़ता है। पुत्राश्च विविधैः शीलैर्नियोज्याः सततं बुधैः। नीतिज्ञाः शीलसम्पन्ना भवन्ति कुलपूजिताः॥ बुद्धिमान लोगों का कर्त्तव्य होता है कि वे अपनी संतान को अच्छे कार्य-व्यापार में लगाएं क्योंकि नीति के जानकार व सद्व्यवहार वाले व्यक्ति ही कुल में सम्मानित होते हैं॥10॥ आचार्य चाणक्य का विचार है कि माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कारों से युक्त करें, जिससे जीवन में उन्हें कोई कठिनाई न हो। अच्छे और श्रेष्ठ 34 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri