सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 54, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ अथ चतुर्थ अध्याय ॥ आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च। पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥ यह निश्चित है कि शरीरधारी जीव के गर्भकाल में ही आयु, कर्म, धन, विद्या, मृत्यु, इन पांचों की सृष्टि साथ-ही-साथ हो जाती है॥1॥ इस नीति के द्वारा चाणक्य मानव-जीवन की सभी बातों को पूर्व निर्धारित मानते हैं। उनका मत है कि मनुष्य जीवन की अवधि, मृत्यु, सुख-दुःख, मान-अपमान, विद्या और सम्पत्ति का भोग सभी कुछ ईश्वर के अधीन है। बिना उसकी मर्जी के पत्ता तक नहीं हिलता। अतः सब कुछ उस पर छोड़कर मनुष्य को अपने कर्म में प्रवृत्त हो जाना चाहिए। साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः। ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥ साधु-महात्माओं के संसर्ग से पुत्र, मित्र, बंधु और जो अनुराग करते हैं, वे संसार-चक्र से छूट जाते हैं और उनके कुल-धर्म से उनका कुल उज्ज्वल हो जाता है॥2॥ 52 CC0. Vasishthe Tripathi Collection. Digitized by eGangotri