सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
॥ अथ चतुर्थ अध्याय ॥ आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च। पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥ यह निश्चित है कि शरीरधारी जीव के गर्भकाल में ही आयु, कर्म, धन, विद्या, मृत्यु, इन पांचों की सृष्टि साथ-ही-साथ हो जाती है॥1॥ इस नीति के द्वारा चाणक्य मानव-जीवन की सभी बातों को पूर्व निर्धारित मानते हैं। उनका मत है कि मनुष्य जीवन की अवधि, मृत्यु, सुख-दुःख, मान-अपमान, विद्या और सम्पत्ति का भोग सभी कुछ ईश्वर के अधीन है। बिना उसकी मर्जी के पत्ता तक नहीं हिलता। अतः सब कुछ उस पर छोड़कर मनुष्य को अपने कर्म में प्रवृत्त हो जाना चाहिए। साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा मित्राणि बान्धवाः। ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥ साधु-महात्माओं के संसर्ग से पुत्र, मित्र, बंधु और जो अनुराग करते हैं, वे संसार-चक्र से छूट जाते हैं और उनके कुल-धर्म से उनका कुल उज्ज्वल हो जाता है॥2॥ 52 CC0. Vasishthe Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
भाव यह है कि जिस कुल में साधु-महात्मा जैसा कोई पुत्र उत्पन्न हो जाता है, उसके संसर्ग से बाकी सभी लोगों का भी सांस्कारिक परिष्कार हो जाता है। दर्शनध्यानसंस्पर्शैर्मत्सी कूर्मी च पक्षिणी। शिशुं पालयते नित्यं तथा सज्जनसंगतिः॥ जिस प्रकार मछली देख-रेख से, कछुवी चिड़िया स्पर्श से (चोंच द्वारा) सदैव अपने बच्चों का पालन-पोषण करती हैं, वैसे ही अच्छे लोगों के साथ से सर्व प्रकार से रक्षा होती है॥३॥ यहां चाणक्य ने सद्-संगति पर जोर दिया है। अच्छे लोगों का साथ होने पर किसी प्रकार की हानि नहीं होती। सज्जनों का साथ सदैव सुखकारी और हितरक्षक होता है। यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो यावन्मृत्युश्च दूरतः। तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति॥ यह नश्वर शरीर जब तक निरोग व स्वस्थ है या जब तक मृत्यु नहीं आती, तब तक मनुष्य को अपने सभी पुण्य-कर्म कर लेने चाहिए क्योंकि अंत समय आने पर वह क्या कर पाएगा॥४॥ समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। समय गुजरता जाता है इसीलिए किसी कार्य को कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। कहा भी है—‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, फेर करेगा कब?’ अतः समय का कोई भरोसा नहीं। जो पुण्य-कर्म करने हैं, अभी कर लेने चाहिए, फिर समय नहीं मिलेगा। कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी। प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥ विद्या कामधेनु के समान सभी इच्छाएं पूर्ण करने वाली 53
है। विद्या से सभी फल समय पर प्राप्त होते हैं। परदेस में विद्या माता के समान रक्षा करती है। विद्वानों ने विद्या को गुप्त धन कहा है, अर्थात विद्या वह धन है जो आपातकाल में काम आती है। इसका न तो हरण किया जा सकता है न ही इसे चुराया जा सकता है॥5॥ विद्या सभी प्रकार से सुरक्षित और समय पड़ने पर रक्षा करने वाली है। इसे जितना दिया जाता है, यह उतनी ही बढ़ती है। इससे बड़ा धन कोई दूसरा नहीं है। इसे न ही कोई छीन सकता और न ही कोई आपस में बांट सकता। वरमेको गुणी पुत्रो निर्गुणैश्च शतैरपि। एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥ सैकड़ों अज्ञानी पुत्रों से एक ही गुणवान पुत्र अच्छा है। रात्रि का अंधकार एक ही चंद्रमा दूर करता है, न कि हजारों तारें॥6॥ इसी प्रकार के तीन श्लोक अध्याय तीन में संख्या 14, 16 और 17 भी हैं। आचार्य चाणक्य ने इस प्रकार बार-बार गुणी पुत्र के होने की बात कही है। गुणी पुत्र जीवन-भर सुख देने वाला होता है। मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः। मृतः स चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्॥ बहुत बड़ी आयु वाले मूर्ख पुत्र की अपेक्षा पैदा होते ही जो मर गया, वह अच्छा है क्योंकि मरा हुआ पुत्र कुछ देर के लिए ही कष्ट देता है, परंतु मूर्ख पुत्र जीवन-भर जलाता है॥7॥ मूर्ख पुत्र के विषय में चाणक्य ने अध्याय तीन में श्लोक संख्या 15 में भी यही बात कही है। मूर्ख पुत्र जीवन-भर का दुःख होता है। 54 CC0. Vasishta Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या। पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥ बुरे ग्राम का वास, नीच कुल की सेवा, बुरा भोजन, झगड़ालू स्त्री, मूर्ख लड़का, विधवा कन्या, ये छः बिना अग्नि के भी शरीर को जला देते हैं॥8॥ चाणक्य का कथन है कि ऐसे गांव में कभी नहीं रहना चाहिए, जहां के लोग दुःख में साथ देने वाले न हों। नीच व्यक्ति की नौकरी में सदैव अपमान ही झेलना पड़ता है। खराब भोजन स्वास्थ्य को खराब कर देता है। कलह करने वाली स्त्री परिवार को नर्क बना देती है, मूर्ख पुत्र अपनी अज्ञानता से बार-बार मुसीबतें खड़ी करने वाला होता है और घर में विधवा बेटी का दुःख जीवन-भर जलाता रहता है। ये छः बिना अग्नि के भी जीवन-भर शरीर को चिंता की अग्नि से जलाते रहते हैं। किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गुर्विणी। कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान् न भक्तिमान्॥ उस गाय से क्या लाभ, जो न बच्चा जने और न दूध ही दे। ऐसे पुत्र के जन्म लेने से क्या लाभ, जो न तो विद्वान हो, न किसी देवता का भक्त हो॥9॥ भाव यह है कि दूध देने वाली गाय के समान ही ऐसे पुत्र की कामना की गई है जो विद्वान भी हो और ईश्वर में आस्था रखने वाला भी हो। ऐसा पुत्र सदैव सुख देने वाला और मां-बाप का नाम रोशन करने वाला होता है। संसारतापद्ग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः। अपत्यं च कलत्रं च सतां संगतिरेव च॥ इस संसार में दुःखों से दग्ध प्राणी को तीन बातों से 55 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
सुख-शान्ति प्राप्त हो सकती है—सुपुत्र से, पतिव्रता स्त्री से और सद्संगति से॥10॥ संसार दुःखों का सागर है। यहां हर पल कोई-न-कोई दुःख मनुष्य को सताता ही रहता है। ऐसे दुःखमय संसार में यदि उसे सुपुत्र, पतिव्रता स्त्री और सज्जनों की संगति मिल जाए तो उसे चिंता, दुःख व अशान्ति से बहुत राहत मिल सकती है। सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः। सकृत् कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्॥ राजा लोग एक ही बार बोलते हैं (आज्ञा देते हैं), पंडित लोग किसी कर्म के लिए एक ही बार बोलते हैं (बार-बार श्लोक नहीं पढ़ते), कन्याएं भी एक ही बार दी जाती हैं। ये तीन एक ही बार होने से विशेष महत्त्व रखते हैं॥11॥ राजा का, विद्वान का और कन्या के पिता का वचन अथवा कथन अटल होता है। इनके वचन लौटाए नहीं जा सकते। इसी प्रकार अच्छे कर्म के लिए बार-बार नहीं कहा जाता। एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः। चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पंचभिर्बहुभी रणः॥ तपस्या अकेले में, अध्ययन (पढ़ाई) दो के साथ, गाना तीन के साथ, यात्रा चार के साथ, खेती पांच के साथ और युद्ध बहुत से सहायकों के साथ होने पर ही उत्तम होता है॥12॥ आचार्य चाणक्य ने उक्त श्लोक के माध्यम से जानकारी दी है कि मनुष्य को तप अर्थात ईश्वरभक्ति करनी हो तो उसे एकांत स्थान खोजना चाहिए। अध्ययन दो व्यक्ति मिलकर करें। मिलकर अध्ययन करने का लाभ यह है कि आपस में अध्ययन संबंधी विषय पर विचार-विमर्श भी साथ-साथ चलता रह सकता है। गाने के विषय में तीन लोगों की महत्ता 56
इसलिए है कि स्वर के उतार-चढ़ाव के लिए एक से अधिक गले की, तीन की आवश्यकता होती है तभी सही लय-सुर बन पाता है। यात्रा के लिए चार व्यक्तियों की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि चारों दिशाओं के खतरे के प्रति सावधान रहा जा सके। खेत बोने के लिए पांच व्यक्तियों की आवश्यकता इसलिए बताई गई है ताकि चारों कोने और बीच का भाग सही तरह से बोया जा सके। युद्ध के लिए सेना का महत्त्व सभी जानते हैं। सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता। सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥ पत्नी वही है जो पवित्र और चतुर है, पतिव्रता है, पत्नी वही है जिस पर पति का प्रेम है, पत्नी वही है जो सदैव सत्य बोलती है।।13।। यहां आचार्य चाणक्य ने पत्नी के श्रेष्ठ स्वरूप के बारे में बताते हुए कहा है कि जो पत्नी समय पर चतुराई से काम निकालना जानती है और जो सदैव अपने पति के प्रति समर्पित, पवित्र, पतिव्रता, पति प्रेम की पात्रा और सच बोलने वाली है, वही सच्ची पत्नी है। अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबांधवाः। मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता॥ बिना पुत्र के घर सूना है। बिना बंधु-बांधवों के दिशाएं सूनी हैं। मूर्ख का हृदय भावों से सूना है। दरिद्रता सबसे सूनी है, अर्थात दरिद्रता का जीवन महाकष्टकारक है।।14।। पुत्र के बिना वंश-बेल सूख जाती है। पिता को अपना ही घर सूना लगने लगता है। बंधु-बांधवों के न होने पर वह कहीं आ-जा नहीं सकता, सारी दिशाएं उसे सूनी लगने लगती हैं। मूर्ख 57 CC0 Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
के हृदय में संवेदनशीलता की शून्यता बनी रहती है। वह किसी के सुख-दुःख में हिस्सा नहीं लेता। गरीबी के कारण निर्धन का कोई मित्र नहीं होता। यही कारण है कि उसे सारा संसार और अपना जीवन व्यर्थ दिखाई देने लगता है। तात्पर्य यह है कि जिसके पास धन नहीं है, उसके लिए दुनिया का प्रत्येक कोना सूना है। अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्। दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥ बार-बार अभ्यास न करने से विद्या विष बन जाती है। बिना पचा भोजन विष बन जाता है, दरिद्र के लिए स्वजनों की सभा या साथ और वृद्धों के लिए युवा स्त्री विष के समान होती है॥15॥ अभ्यास से ही शिक्षा (विद्या) का विकास होता है। जो भोजन पचता नहीं, वह शरीर पर कुप्रभाव डालता है। एक दरिद्र परिजन अपने ही लोगों को विष के समान दिखलाई पड़ने लगता है। उन्हें वह भार स्वरूप दिखाई देने लगता है। यदि किसी वृद्ध को युवा स्त्री मिल जाए तो वह उसे संतुष्ट न करने की स्थिति में जहर दिखाई देने लगती है। प्रत्येक वस्तु का अपना उचित स्थान और महत्त्व होता है। त्यजेद्धर्म दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्। त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां निःस्नेहान् बान्धवांस्त्यजेत्॥ दयाहीन धर्म को छोड़ दो, विद्याविहीन गुरु को छोड़ दो, झगड़ालू और क्रोधी स्त्री को छोड़ दो और स्नेहविहीन बंधु-बांधवों को छोड़ दो॥16॥ भाव यह है कि ऐसे धर्म को कभी नहीं अपनाना चाहिए, 58
जिसमें प्राणी-मात्र के लिए दया-भाव न हो। ऐसे गुरु को नहीं अपनाना चाहिए, जिसमें विद्वता न हो। ऐसी पत्नी को स्वीकार नहीं करना चाहिए जो क्रोधी स्वभाव की हो और कलह करने वाली हो। साथ ही ऐसे परिजनों से संबंध नहीं रखना चाहिए जो दुःख-सुख में काम न आते हों। अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बंधनं जरा। अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपो जरा॥ बहुत ज्यादा पैदल चलना मनुष्यों को बुढ़ापा ला देता है, घोड़ों को एक ही स्थान पर बांधे रखना और स्त्रियों के साथ पुरुष का समागम (मैथुन) न होना और वस्त्रों को लगातार धूप में डाले रखने से बुढ़ापा आ जाता है।। 17 ।। निरन्तर यात्रा करते रहने से खान-पान और शरीर को आराम नहीं मिल पाता। इससे शरीर थककर चूर-चूर हो जाता है। युवावस्था की उमंग क्षीण हो जाती है। घोड़ों को यदि घुमाया-फिराया न जाए तो वे आलसी हो जाते हैं। आलस्य शरीर को शिथिल कर देता है। स्त्री-पुरुष का समागम स्वाभाविक क्रिया है। यदि स्त्री अथवा पुरुष इससे वंचित रह जाएं तो उन्हें बुढ़ापा घेर लेता है। वस्त्रों के धूप में पड़े रहने से वे पुराने पड़कर जर-जर हो जाते हैं। कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययऽऽगमौ। कश्चाऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥ बुद्धिमान व्यक्ति को बार-बार यह सोचना चाहिए कि हमारे मित्र कितने हैं, हमारा समय कैसा है—अच्छा है या बुरा और यदि बुरा है तो उसे अच्छा कैसे बनाया जाए। हमारा निवास-स्थान कैसा है (सुखद, अनुकूल), हमारी आय कितनी है और व्यय कितना है, मैं कौन हूं-आत्मा हूं, अथवा शरीर, स्वाधीन हूं अथवा पराधीन तथा मेरी शक्ति कितनी है।।18।। 59 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
इन प्रश्नों पर विचार करते हुए मनुष्य को अपना जीवन बिताना चाहिए तथा आत्मकल्याण के लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो व्यक्ति इन बातों पर विचार नहीं करता, वह पत्थर के समान निर्जीव होता है और सदा लोगों के पांवों में पड़ा ठोकरें खाता रहता है। मनुष्य को समझदारी से काम लेकर जीवन बिताना चाहिए। जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैवे पितरः स्मृताः॥ जन्म देने वाला पिता, उपनयन-संस्कार कराने वाला, विद्या देने वाला गुरु, अन्नदाता और भय से रक्षा करने वाला—ये पांच 'पितर' माने जाते हैं॥19॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में पंच पितर के साथ एक पितर को रक्षा करने वाला भी कहा है। रक्षा जीवित ही कर सकता है, मरा हुआ नहीं। मरा अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता तो दूसरों की क्या करेगा। गीता में भी कौरव-पांडवों की सेना के आमने-सामने खड़े हो जाने के समय के वर्णन में 'पितर' शब्द आया है। अर्जुन ने वहां खड़े हुए पितरों-चाचा, ताऊ, पिता, दादा आदि को देखा था। पितर सिर्फ मरे हुए के लिए आता है, ऐसा सोचना भ्रामक है। राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च। पत्नी माता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥ राजा की पत्नी, गुरु की स्त्री, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता (सास) और अपनी जननी—ये पांच माताएं मानी गई हैं। इनके साथ मातृवत् व्यवहार ही करना चाहिए॥20॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने पांच माताओं की प्रतिष्ठा स्थापित करते हुए कहा है—राजा चूंकि पूरे राज्य की जनता के लिए पिता तुल्य होता है, अतः राजा की पत्नी माता रूप 60 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
में होती है, उसका सम्मान आवश्यक है। गुरु पिता के समान होता है अतः उसकी पत्नी भी माता समान होती है, सम्मान की पात्र है। मित्र का महत्त्व अत्यंत विश्वसनीय पात्र के रूप में है। मित्र सुख-दुख में बराबर का साथी होता है, अतः मित्र की पत्नी को भी माता के समान मानना चाहिए। पत्नी की माता, अर्थात सास को भी माता रूप में मानना चाहिए। पत्नी जो जीवनसंगिनी बन गई, उसकी मां को माता समान मानना चाहिए। अपनी मां तो मां होती ही है। उसके प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए। अग्निदेवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्। प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनः॥ अग्नि देव ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के देवता हैं। ऋषि-मुनियों के देवता हृदय में हैं। अल्प बुद्धि वालों के देवता मूर्तियों में हैं और सारे संसार को समान रूप से देखने वालों के देवता सभी जगह निवास करते हैं॥21॥ जो तत्त्वज्ञानी हैं, जिन्होंने इस चराचर सृष्टि के रहस्य को जान लिया है, उनके लिए सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही उस परम शक्तिसम्पन्न परमात्मा का घर है। वह कण-कण में व्याप्त है। सभी प्राणियों में है। जड़ में है, चेतन में है, परंतु दो बार जन्म लेने वाले, एक बार माता के गर्भ से और दूसरी बार गुरु के द्वारा संस्कारित होने पर, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अग्नि अर्थात 'यज्ञ' को ही अपना देवता मानते हैं। ऋषि-मुनि परमात्मा के स्वरूप का ध्यान अपने हृदय में करते हैं और अल्प बुद्धि लोग पत्थरों की मूर्ति में ही भगवान का स्वरूप तलाशते हैं। यह अपनी-अपनी आस्था की बात है। 61
॥ अथ पंचम अध्याय ॥ गुरुरग्निर्द्विजातिनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः॥ स्त्रियों का गुरु पति है। अतिथि सबका गुरु है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का गुरु अग्नि है तथा चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण है।।1।। यहां आचार्य चाणक्य ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है, परंतु जो ज्ञानी है, वही ब्राह्मण है। कोई जन्म से ही ब्राह्मण नहीं हो जाता। इस श्लोक में 'ब्राह्मण' से चाणक्य का तात्पर्य ज्ञान से परिपूर्ण व्यक्ति से है। यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते, निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते, त्यागेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा॥ जिस प्रकार घिसने, काटने, आग में तापने-पीटने, इन चार उपायों से सोने की परख की जाती है, वैसे ही त्याग, शील, गुण और कर्म, इन चारों से मनुष्य की पहचान होती है।।2।। व्यक्तित्व की पहचान, आदमी के शील-स्वभाव, उसके कर्म, उसके गुण और उसकी त्याग-भावना के द्वारा होती है। 62 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
तावद् भयेषु भेतव्यं यावद् भयमनगतम्। आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशंकया॥ भय से तभी तक डरना चाहिए, जब तक भय आए नहीं। आए हुए भय को देखकर निशंक होकर प्रहार करना चाहिए, अर्थात उस भय की परवाह नहीं करनी चाहिए॥३॥ भयभीत व्यक्ति अपने सारे कार्य भय के वशीभूत होकर बिगाड़ लेता है, लेकिन जो व्यक्ति भय के उपस्थित होने पर उसका विरोध करता है, उसका कार्य कभी खराब नहीं होता। एकोदरसमुद्भूताः एकनक्षत्रजातकाः। न भवन्ति समाः शीले यथा बदरिकंटका॥ एक ही माता के पेट से और एक ही नक्षत्र में जन्म लेने वाली संतान समान गुण और शील वाली नहीं होती, जैसे बेर के कांटे॥4॥ सभी बच्चों का स्वभाव अलग-अलग होता है। भले ही वे जुड़वां पैदा हुए हों। बेर के पेड़ पर फल भी लगता है और कांटे भी। यह ईश्वर की विचित्र लीला है जिसे समझना सरल नहीं। निःस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मंडनप्रियः। नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः॥ जिसका जिस वस्तु से लगाव नहीं है, उस वस्तु का वह अधिकारी नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सौंदर्य प्रेमी नहीं होगा तो श्रृंगार-शोभा के प्रति उसकी आसक्ति नहीं होगी। मूर्ख व्यक्ति प्रिय और मधुर वचन नहीं बोल पाता और स्पष्ट वक्ता कभी धोखेबाज, धूर्त या मक्कार नहीं होता॥5॥ जो व्यक्ति सहज है, जिसमें किसी के प्रति कोई लगाव या दुराव नहीं है, वह व्यक्ति व्यर्थ की साज-संवार से अपने को अलग 63 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
रखता है। जो चालाक और धूर्त होते हैं, वे ही मधुर वचन बोलते हैं, मूर्ख नहीं। साफ-साफ बोलने वाला कड़वा जरूर होता है, पर धोखेबाज नहीं होता। मूर्खाणां पंडिता द्वेष्याः अधनानां महाधनाः। वाराऽऽ ङ्गनाः कुलस्त्रीणां सुभगानां च दुर्भगाः॥ मूर्खों के पंडित, दरिद्रों के धनी, विधवाओं की सुहागिनें और वेश्याओं की कुल-धर्म रखने वाली पतिव्रता स्त्रियां शत्रु होती हैं॥6॥ यह सांसारिक नियम है कि मूर्ख व्यक्ति पंडितों से ईर्ष्या करते हैं, निर्धन व्यक्ति धनिकों से ईर्ष्या करते हैं। वेश्याएं या व्यभिचारिणी स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली कुल-वधुओं से ईर्ष्या करती हैं और विधवाएं सुहागिनों को देखकर अपने भाग्य को कोसती रहती हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। दूसरे को सुखी देखकर कोई सुखी नहीं होता। आलस्योपहता विद्या परहस्तगतं स्त्रियः। अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥ आलस्य से (अध्ययन न करना) विद्या नष्ट हो जाती है। दूसरे के पास गई स्त्री, बीज की कमी से खेती और सेनापति के न होने से सेना नष्ट हो जाती है॥7॥ युद्ध क्षेत्र में सेनानायक का अभाव सेना का मनोबल तोड़ देता है और वह शत्रु का सामना न करके भागने लगती है और हार जाती है। इसी प्रकार यदि खेत में पर्याप्त बीज न डाला जाए तो खेती अथवा उपज ठीक से नहीं हो पाती। दूसरे के पास गई स्त्री के सकुशल लौटने की उम्मीद कम ही रहती है और यदि 64 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri सम्पूर्ण चाणक्य नीति-4
अध्ययन की प्रक्रिया को निरंतर बनाए न रखा जाए तो जो विद्या अर्जित की जाती है, वह धीरे-धीरे स्मृति से मिटने लगती है। अतः विद्या, स्त्री, कृषि और सेना के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते। गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते॥ विद्या अभ्यास से आती है, सुशील स्वभाव से कुल का बड़प्पन होता है। श्रेष्ठत्व की पहचान गुणों से होती है और क्रोध का पता आंखों से लगता है॥४॥ इस प्रकार विद्या की रक्षा के लिए अभ्यास करते रहना जरूरी है। शील-स्वभाव से कुल को मान-सम्मान मिलता है, सद्गुणों से श्रेष्ठता का पता चलता है और क्रोध का पता आंखों से लग जाता है। भाव यह है कि मनुष्य यदि अपने भावों को छिपाना भी चाहे तो छिपा नहीं सकता। स्वभाव, गुण और चेहरे से मनुष्य का पूरा परिचय मिल जाता है। वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते। मृदुना रक्ष्येत भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम्॥ धर्म की रक्षा धन से, विद्या की रक्षा निरंतर साधना से, राजा की रक्षा मृदु स्वभाव से और पतिव्रता स्त्रियों से घर की रक्षा होती है॥9॥ धर्मानुष्ठान (यज्ञ, धर्मशालाएं, तीर्थाटन, मंदिर निर्माण, पूजा आदि) के लिए धन अनिवार्य होता है। बिना अभ्यास के विद्या भी पास नहीं टिकती। राजा अपने मृदु स्वभाव से ही प्रजा को अपने अनुकूल करता है और कुलीन स्त्रियों से ही घर-गृहस्थी की मर्यादा बनी रहती है। अतः इसका ध्यान रखना बहुत जरूरीं है। 65 CC0 Vashistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा। अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्यन्ति चान्यथा॥ वेद पांडित्य व्यर्थ है, शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ है, ऐसा कहने वाले स्वयं ही व्यर्थ हैं। उनकी ईर्ष्या और दुःख भी व्यर्थ हैं। वे व्यर्थ में ही दुःखी होते हैं, जबकि वेदों और शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ नहीं है॥10॥ मूर्खता के वशीभूत होकर ही लोग आप्त ज्ञान को व्यर्थ बताते हैं, जबकि ज्ञान कोई भी व्यर्थ नहीं होता। ऐसा वे ही लोग कहते हैं जो वेदों में छिपे ज्ञान के मर्म को समझ नहीं पाते। जिन्हें शास्त्रों का ,विश्लेषण करना नहीं आता। दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्। अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥ दरिद्रता का नाश दान से, दुर्गति का नाश शालीनता से, मूर्खता का नाश सद्बुद्धि से और भय का नाश अच्छी भावना से होता है॥11॥ जो व्यक्ति दरिद्र रहते हुए भी सामर्थ्य के अनुसार दान देकर दूसरों के कष्टों का निवारण करता है, उसका दान समृद्ध व्यक्ति के दान से श्रेष्ठ होता है। शालीनता के साथ संकट काल को सहन करने वाला व्यक्ति अपने संकटों पर विजय प्राप्त करता है तथा सुशीलता कष्ट को दूर करती है। इसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति अज्ञान का नाश करता है। नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः। नाऽस्ति कोपसमो वह्निर्नार्र्ऽस्ति ज्ञानात् परं सुखम्॥ काम-वासना के समान दूसरा रोग नहीं, मोह के समान शत्रु नहीं, क्रोध के समान आग नहीं और ज्ञान से बढ़कर सुख नहीं॥12॥ 66
काम-वासना में लिप्त व्यक्ति धीरे-धीरे व्यभिचारी हो जाता है। काम-वासना एक भयानक रोग की भांति उसे जकड़ लेती है। मोह में पड़ा व्यक्ति अंधा हो जाता है। उसे भला-बुरा कुछ दिखाई नहीं देता। क्रोधी व्यक्ति क्रोध रूपी अग्नि में स्वयं तो जलता ही है, दूसरों को भी जलाता है। इस संसार में यदि कहीं सुख और आनंद है तो ज्ञानी बनने में है। जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्। नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्॥ मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। वह अकेला ही अपने अच्छे-बुरे कर्मों को भोगता है। वह अकेला ही नर्क में जाता है और परम पद को पाता है।।13।। जीवन और मृत्यु, कर्मों का भोग, नरक वास और परम शक्ति का सान्निध्य मनुष्य अकेला ही प्राप्त करता है। कोई उसके साथ न तो आता है, न जाता है। कोई उसका सहायक नहीं होता। सब भाई-बंधु यहीं रह जाते हैं। वह अकेला आता है और अकेला ही जाता है। जीवन का यही चक्र है, जो शाश्वत है, सनातन है। तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम्। जिताऽक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥ ब्रह्मज्ञानियों की दृष्टि में स्वर्ग तिनके के समान है, शूरवीर की दृष्टि में जीवन तिनके के समान है, इन्द्रजीत के लिए स्त्री तिनके के समान है और जिसे किसी भी वस्तु की कामना नहीं है, उसकी दृष्टि में यह सारा संसार तिनके के समान है। उसे सारा संसार क्षणभंगुर दिखाई देता है। वह तत्त्वज्ञानी हो जाता है।।14।। प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से आचार्य चाणक्य ने शिक्षा दी है कि मनुष्य को ज्ञान का अर्जन करना चाहिए और यह 67
ज्ञान इस हद तक सीखना चाहिए कि वह बह्मज्ञानी बन जाए। यदि मनुष्य शूरवीर है तो उसे जीवन का मोह नहीं होता, क्योंकि उसका जन्म ही वीरता दिखाते हुए प्रोणोत्सर्ग कर देने के लिए हुआ है। इंद्रियों को वश में रखने वाले के लिए स्त्री का कोई महत्त्व नहीं, वह तो उसके लिए तृण के समान है। इसी तरह जिसे लोभ नहीं उसके लिए संसार का कोई मोह नहीं हो सकता। विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥ प्रवास (विदेश) में विद्या ही मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगियों के लिए औषधि मित्र है और मरते हुए व्यक्ति का मित्र धर्म होता है अर्थात उसके सत्कर्म होते हैं, इसीलिए विद्या, पतिव्रता विदुषी स्त्री, रोग के समय उचित औषधि और मृत्यु काल निकट आने पर व्यक्ति के सत्कर्म ही उसका साथ देते हैं॥15॥ आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में विद्या के लिए कहा गया है कि विद्या कामधेनु के समान गुणों से युक्त है। यह असमय फल देने वाली है। यह प्रवास में माता के समान हितकारिणी और रक्षिका है। विद्या को गुप्त धन माना गया है। पत्नी पुरुष का आधा अंग है। पत्नी पति की सर्वश्रेष्ठ मित्र होती है। पत्नी धर्म, अर्थ और काम का मूल होती है। यहां तक कि भवसागर पार उतरने की इच्छा वाले पुरुष की सहयोगी होती है। रोगी के लिए औषध और मृत्यु के बाद उसके अच्छे कर्म मनुष्य के साथी होते हैं। CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 68
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्। वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च॥ समुद्र में वर्षा का होना व्यर्थ है, तृप्त व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है, धनिक को दान देना व्यर्थ है और दिन में दीपक जलाना व्यर्थ है।।16।। वर्षा की जरूरत सूखे मैदानों और कृषि के लिए खेतों में अधिक होती है, भोजन की जरूरत भूखे व्यक्ति के लिए होती है। दान की जरूरत निर्धन के लिए होती है और दीपक की जरूरत रात्रि का अंधकार दूर करने के लिए होती है। नोट—समुद्र में वर्षा, तृप्त व्यक्ति को भोजन खिलाना, धनवान को दान देना और दिन के प्रकाश में दीपक जलाना, ये सभी कार्य निरर्थक हैं, व्यर्थ हैं। नाऽस्ति मेघसमं तोयं नाऽस्ति चात्मसमं बलम्। नाऽस्ति चक्षुःसमं तेजो नाऽस्ति धान्यसमं प्रियम्॥ बादल के जल के समान दूसरा जल नहीं है, आत्मबल के समान दूसरा बल नहीं है, अपनी आंखों के समान दूसरा प्रकाश नहीं है और अन्न के समान दूसरा प्रिय पदार्थ नहीं है।।17।। बादलों का जल सर्वाधिक स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक होता है। आदमी का आत्म बल सभी शक्तियों से ऊपर होता है। आत्मबल हो तो मनुष्य कठिन-से-कठिन संकट व परिस्थितियों का भी हंसते-हंसते सामना कर लेता है तथा सफलता को प्राप्त करता है। जिन नेत्रों में ज्योति है, वे ही बाहरी प्रकाश और सौंदर्य का पान कर सकते हैं और बिना अन्न के जीवन की सुरक्षा असंभव है। 69 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः। मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥ निर्धन धन चाहते हैं, पशु वाणी चाहते हैं। मनुष्य स्वर्ग की इच्छा करते हैं और देवगण मोक्ष चाहते हैं॥18॥ संसार में सभी प्राणी किसी-न-किसी अभाव से ग्रस्त रहते हैं। इस अभाव को मिटाने के लिए वे प्रयत्न करते हैं। प्रायः जिस प्राणी के पास जिस वस्तु का अभाव होता है, वह उसी को पाना चाहता है। सत्येन धार्यते पृथिवी सत्येन तपते रविः। सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥ सत्य पर पृथ्वी टिकी है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से वायु बहती है, संसार के सभी पदार्थ सत्य में निहित हैं॥19॥ यहां सत्य की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि यह समस्त पृथ्वी, हवा की गति, सूर्य की तपिश और संपूर्ण ब्रह्मांड सत्य में ही समाया हुआ है। सत्य के द्वारा ही सारा ब्रह्मांड चलाया जाता है और कहा भी गया है 'सत्यं शिवं सुन्दरम्।' अर्थात सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है, सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवित-यौवनं। चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥ लक्ष्मी अनित्य और अस्थिर है, प्राण भी अनित्य है और जीवन भी अनित्य है। इस चलते-फिरते संसार में केवल धर्म ही स्थिर है॥20॥ इस संसार में केवल धर्म ही ऐसा है जो स्थिर रूप से मानव हृदय में रहता है। इसके अलावा समृद्धि (धन-सम्पत्ति), 70
जीवन और सभी चराचर पदार्थ समय आने पर नष्ट हो जाने वाले हैं, लेकिन धर्म अजर-अमर है। मनुष्य का सभी करा-धरा यहीं रह जाएगा, केवल धर्म ही उसके साथ जाएगा। अतः धर्म का संग्रह करना ही श्रेष्ठ है। नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः। चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥ पुरुषों में नाई धूर्त होता है, पक्षियों में कौवा, पशुओं में गीदड़ और स्त्रियों में मालिन धूर्त होती है।।21।। ये चारों सदैव दूसरों के कार्य को बिगाड़ने वाले होते हैं। जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥ मनुष्य को जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाला पुरोहित, विद्या देने वाला आचार्य, अन्न देने वाला, भय से मुक्ति दिलाने वाला अथवा रक्षा करने वाला, ये पांच पिता कहे गए हैं।।22।। पिता जीवन देता है, पुरोहित समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए यज्ञोपवीत संस्कार कराता है, आचार्य ज्ञान देकर जीवन और जगत के समस्त कार्य-व्यापार से परिचित कराता है, अन्न उत्पन्न करने वाला कृषक हमारे लिए भोजन की व्यवस्था करता है और राजा हमारी शत्रु से रक्षा करके हमें भयमुक्त करता है। अतः समाज ने इन्हें पिता अर्थात-पालन करने वाले का उच्च स्थान दिया है। 71 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri