सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 57, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुग्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या। पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निना षट् प्रदहन्ति कायम्॥ बुरे ग्राम का वास, नीच कुल की सेवा, बुरा भोजन, झगड़ालू स्त्री, मूर्ख लड़का, विधवा कन्या, ये छः बिना अग्नि के भी शरीर को जला देते हैं॥8॥ चाणक्य का कथन है कि ऐसे गांव में कभी नहीं रहना चाहिए, जहां के लोग दुःख में साथ देने वाले न हों। नीच व्यक्ति की नौकरी में सदैव अपमान ही झेलना पड़ता है। खराब भोजन स्वास्थ्य को खराब कर देता है। कलह करने वाली स्त्री परिवार को नर्क बना देती है, मूर्ख पुत्र अपनी अज्ञानता से बार-बार मुसीबतें खड़ी करने वाला होता है और घर में विधवा बेटी का दुःख जीवन-भर जलाता रहता है। ये छः बिना अग्नि के भी जीवन-भर शरीर को चिंता की अग्नि से जलाते रहते हैं। किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गुर्विणी। कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान् न भक्तिमान्॥ उस गाय से क्या लाभ, जो न बच्चा जने और न दूध ही दे। ऐसे पुत्र के जन्म लेने से क्या लाभ, जो न तो विद्वान हो, न किसी देवता का भक्त हो॥9॥ भाव यह है कि दूध देने वाली गाय के समान ही ऐसे पुत्र की कामना की गई है जो विद्वान भी हो और ईश्वर में आस्था रखने वाला भी हो। ऐसा पुत्र सदैव सुख देने वाला और मां-बाप का नाम रोशन करने वाला होता है। संसारतापद्ग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः। अपत्यं च कलत्रं च सतां संगतिरेव च॥ इस संसार में दुःखों से दग्ध प्राणी को तीन बातों से 55 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri