सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
( १८८ ) रहनेवाले जीव भी एक बार मुक्त होकर फिर कभी बन्धन में नहीं पड़ते हैं, ऐसा कोई नियम नहीं है; किन्तु वहाँ के भी मुक्त जीव लौट आते हैं, क्योंकि वह चन्द्रादिक लोक भी भू-लोकों के समान ही हैं। लोकस्य नोपदेशात् सिद्धिः पूर्ववत् ॥५७॥ अर्थ—जैसे इस लोक के पुरुषों की श्रवणमात्र से मुक्ति नहीं होती है, इसी तरह चन्द्रलोक के मनुष्यों की भी श्रवणमात्र से मुक्ति नहीं होती। पारम्पर्येण तत्सिद्धौ विमुक्तिश्रुतिः ॥५८॥ अर्थ—जो जन्मान्तरों से मुक्ति के वास्ते यत्न करते चले आते हैं वे लोग केवल श्रवणमात्र ही से मुक्ति को प्राप्त हो सकते हैं; इसलिये 'श्रुत्वा मुच्यते' सुनने से मुक्ति को प्राप्त हो जाता है, यह श्रुति भी सार्थक हो जायगी। गतिश्रुतेश्च व्यापकत्वेऽप्युपाधियोगाद्भोग देश- काल लाभो व्योमवत् ॥५६॥ अर्थ—आत्मा में जो गति सुनी जाती है उसको इस तरह से समझना चाहिये कि यद्यपि आत्मा शरीर में व्यापक है तथापि उस शरीररूपी उपाधि के योग से अनेक तरह के भोग देश और समयों का योग इसमें माना जाता है, अर्थात् भोगों की प्राप्ति, देशान्तर्गमन और प्रातः संध्या आदि का अतिक्रम आत्माही में मालूम होता है; परन्तु आत्मा वास्तव में इनसे पृथक् है; जैसे घट का आकाश। घट को उठाकर दूसरी जगह ले जाने से वह आकाश भी दूसरी जगह चला जाता है, इस बात को पहिले कह
( १८६ ) चुके हैं कि बिना जीव के सिर्फ वायु ही से शरीर का कार्य नहीं चलता, उसपर आचार्य अपना सिद्धान्त कहते हैं। अनधिष्ठितस्यपूतिभावप्रसङ्गात्तत्सिद्धिः ॥६०॥ अर्थ-यदि आत्मा इस शरीर का अधिष्ठाता न हो, तो शरीर में दुर्गन्ध आने लगे, इस कारण प्राण को शरीर का अधिष्ठाता नहीं कह सकते हैं। अदृष्टद्वारा चेदसम्बद्धस्य तदसम्भवाज्जलादि- वदङ्कुरे ॥६१॥ अर्थ-यदि अदृष्ट (प्रारब्ध) से प्राण को शरीर का अधिष्ठाता कहें तो भी योग्य नही ; क्योंकि प्राण का जब प्रारब्ध के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है, तो उसको हम अधिष्ठाता कैसे कह सकते हैं ? जैसे अंकुर के पैदा होने में जल भी हेतु है, परन्तु बिना बीज के जल से अंकुर पैदा नहीं हो सकता, इसी तरह यद्यपि शरीर की अनेक क्रियायें प्राण से होती हैं तो भी वह प्राण बिना आत्मा के कोई क्रिया नहीं कर सकता। निर्गुणत्वात्तदसम्भवादहङ्कारधर्मा ह्येते॥६२॥ अर्थ--ईश्वर निर्गुण है, इस कारण उसको बुद्धि आदि का होना असम्भव (झूठ) है; इसवास्ते वह सब अहंकार के धर्म बुद्धि आदि जीव में ही मानने चाहियें। विशिष्टस्य जीवत्वमन्वयव्यतिरेकात् ॥६३॥ अर्थ-जो ईश्वर के गुणों से पृथक् शरीरादि युक्त हैं उस- को जीव संज्ञा से बोलते हैं, इस बात को अन्वय व्यतिरेक से
( १६० ) जानना चाहिये, अर्थात् जीव के होने से शरीर में बुद्धि का प्रकाश और न होने से बुद्धि आदि का अप्रकाश दीखता है। अहंकार कर्त्तृधीना कार्यसिद्धिर्नैश्वराधीना प्रमाणाभावात् ॥६४॥ अर्थ—अहंकार ही धर्म आदि कार्यों का करनेवाला है, किन्तु धर्म को ईश्वर नहीं कराता ; क्योंकि यदि धर्मादि ईश्वर स्वयम् बनावे तो फल देना अन्याय हो जाय। अदृष्टोद्भू तिवत् समानत्वम् ॥६५॥ अर्थ—जिस वस्तु के कर्त्ता को हम प्रत्यक्ष नहीं देखते हैं उस कर्त्ता का हम अनुमान कर लेते हैं। दृष्टान्त—जैसे कि किसी घड़े को देखा और उसके कर्त्ता कुम्हार को नहीं देखा। तब अनुमान से मालूम करते हैं कि इसका बनाने वाला अवश्य है, चाहे वह दिखलाये नहीं। इसी प्रकार पृथिवी आदि अंकुरों का कर्त्ता भी कोई न कोई अवश्य है। महतोऽन्यत् ॥६६॥ अर्थ—इसी प्रकार इन्द्रियों की तन्मात्राओं का कर्त्ता भी महत्तत्व के सिवाय किसी को मानना चाहिये। वह कर्त्ता अहं- कार ही है। कर्मनिमित्तः प्रकृतेः स्वस्वामिभावोऽप्यनादि- बीजाङ्कुरवत् ॥६७॥ अर्थ—प्रकृति और पुरुष का स्वस्वामिभाव सम्बन्धी भी पुरुष के कर्मों की वासना से अनादि ही मानना चाहिये ; जैसे बीज और अंकुर का होना अनादि माना गया है।
( १६१ ) अविवेकनिमित्तो वा पंचशिखः ॥६८॥ अर्थ—प्रकृति और पुरुष का स्वस्वामिभाव सम्बन्ध कर्म की वासनाओं से नहीं है, किन्तु अविवेक से है ; पञ्चशिख आचार्य ऐसा कहते हैं ॥ लिङ्गशरीरनिमित्तक इति सनन्दनाचार्यः ॥६६॥ अर्थ—लिङ्ग शरीर के निमित्त प्रकृति और पुरुष का स्वस्वा- मिभाव सम्बन्ध है । सनन्दनाचार्य ऐसा मानते हैं । यद्वा तद्वा तदुच्छित्तिः पुरुषार्थस्तदुच्छित्तिः पुरुषार्थः ॥७०॥ अर्थ—प्रकृति और पुरुष का चाहे कोई क्यों न सम्बन्ध हो किन्तु किसी न किसी प्रकार से उस सम्बन्ध का नाश हो जाय उसको ही मोक्ष कहते हैं, सांख्याचार्य का यही मत है । "तदुच्छित्तिः" ऐसा दो बार कहना वीप्सा में है । इस अध्याय में जो-जो विषय कहे गये हैं इन बिषयों को पहिले पांच अध्यायों में खूब फैलाकर कह चुके हैं, इस वास्ते इन सूत्रों की व्यवस्था बहुत फैलाकर नहीं की है । इति सांख्यदर्शने षष्ठोऽध्यायः पूर्तिमगात् ॥ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।