भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५६—वसिष्ठजीद्वारा पञ्चमहायज्ञ-अनुष्ठानका सम्पादन २५०७४—शुक्राचार्यद्वारा बलिके समाधि-अवस्थासे न उठनेतककी अवधिमें कार्य करनेका दानवोंको आदेश ... ... ... २८०
५७—श्रीराम, राजा दशरथ तथा वसिष्ठ आदिके द्वारा ब्राह्मणोंको गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, शय्या, आसन, वस्त्र और बर्तन आदिका दान ... २५१७५—मनुष्य, नागराज, ग्रह, देववृन्द, पर्वत और दिक्पाल तथा वन-जीवोंका यथास्थान गमन ... २८०
५८—श्रीरामद्वारा विष्णु, शंकर, अग्नि और सूर्य आदि देवताओंका पूजन ... ... २५१७६—समाधिसे जगनेपर दैत्यराज बलिका अश्वमेध-अनुष्ठान ... ... २८१
५९—वसिष्ठजीको उनके निवासस्थानपर अपना कन्धा झुकाकर श्रीरामका प्रणाम करना ... २५१७७—श्रीहरिद्वारा पैरोंसे त्रिलोकको नापना और बलिको वैभव-भोगसे वञ्चित करना ... २८२
६०—विश्वामित्र तथा अन्य मुनियोंके साथ रथपर आरूढ होकर वसिष्ठजीका राजा दशरथकी सभामें प्रवेश ... ... २५२७८—प्रह्लादद्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्यपूजा ... ... २८५
६१—राजा जनकका अपने ऊँचे महलपर चढकर एकान्तमें स्थित होकर संसारकी नश्वरता और आत्माके विवेक-विज्ञानको सूचित करनेवाले अनेक आन्तरिक उद्गार और निश्चय प्रकट करना ... ... २५७७९—इन्द्र आदि देवता और मरुद्गणोंका क्षीर-सागरमें शेषनागकी शय्यापर विराजमान भगवान् श्रीहरिके पास गमन ... २८६
६२—राजा जनकद्वारा संसारकी विचित्र स्थितिपर विचार ... ... ... २६०८०—प्रह्लादद्वारा पूजागृहमें प्रत्यक्ष विराजमान भगवान् श्रीहरिका स्तवन ... ... २८७
६३—राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति ... २६१८१—प्रह्लादका आत्मचिन्तन ... ... २८९
६४—दीर्घतपा मुनिका अपनी स्त्री तथा दोनों पुत्र पुण्य और पावनके साथ अपने गङ्गातटीय आश्रममें निवास ... ... २६९८२—पातालमें आत्मचिन्तनलीन प्रह्लादको समाधिसे जगानेका प्रयत्न ... ... २९३
६५—दीर्घतपाका शरीर-त्याग ... ... २६९८३—उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन ... ३०१
६६—माता-पिताका और्ध्वदेहिक कर्म समाप्तकर पुण्यका अपने शोकाकुल बन्धु पावनके पास आगमन ... २७०८४—उद्दालक मुनिका गन्धमादन पर्वतकी रमणीय गुहामें प्रविष्ट होकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित होनेका प्रयत्न ... ... ३०२
६७—पुण्यके समझानेपर पावनको उत्कृष्ट बोधकी प्राप्ति और दोनोंका वन-प्रदेशमें विचरण ... २७१८५—महर्षि माण्डव्यका किरातराज सुरघुके महलमें पधारना ... ... ३११
६८—दैत्यराज बलि ... ... २७३८६—सुरघुद्वारा परमपदकी प्राप्ति ... ... ३१४
६९—राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचार-का उदय ... ... २७३८७—किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णादका संवाद ३१५
७०—विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक परमात्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश २७४८८—पिताओंकी और्ध्वदेहिक क्रियाकी समाप्तिके पश्चात् भास और विलासका विलाप ... ३२१
७१—शुक्राचार्यका ग्रहसमुदायसे भरे आकाश-मार्गसे देवलोकके लिये प्रस्थान ... ... २७८८९—वृद्धावस्थाको प्राप्त भास और विलासकी परस्पर भेंट ... ... ३२२
७२—दैत्यराज बलिका समाधिस्थ होना ... २७९९०—वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना ... ३४५
७३—समाधिमें मग्न दैत्यराज बलिके दर्शनके लिये असुरों आदिका आगमन ... ... २७९९१—वीतहव्य महामुनिकी समाधि ... ३४८
९२—महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बनकर परमात्मप्राप्तिरूप मुक्ता-वस्थाका निरूपण ... ... ३५१
९३—देवराजकी सभामें मुनिवर गातातपद्वारा