संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 302 में से
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२. गर्भ अण्डके अनेक रोगोंसे ।
( 'अण्डोंके रोग' प्रकरण देखो । )
१. अण्डोंके न होनेसे । यह रोग जन्मसे होता है ।
१. पैंसी स्त्री पूरी वन्य्या होती है । उसको कभी संतान नहीं होती । क्योंकि गर्भ और गर्भअण्डका बहुत बड़ा संबंध है । जब गर्भ-अण्ड ही नहीं रहेगा, तो गर्भ कैसे रह सकता है ?
२. अण्डोका अपूर्ण खिलना । यह रोग जन्मसे होता है ।
१. पैंसी दशामें जब कि गर्भ-अण्ड अधखिला रहता है, उससे रज उत्तम रीतिसे नहीं निकल सकता और न बन ही सकता है । जब ऐसा विकार होता है, तो गर्भाशयमें भी विकार अवश्य होता है; इसलिये गर्भ नहीं रहता ।
३. अण्डोंकी सूजनसे ।
१. पैंसी दशामें जब कि अण्डोंमें सूजन होती है, रज विराड़ जाता है । इसलिये दूषित रजके कारण गर्भ नहीं रहता ।
४. अण्डोंके पक जानेसे ।
१. जब अण्डे पक जाते हैं तो इनसे शुद्ध रज नहीं निकलता, अतएव दूषित रज निकलनेसे गर्भ नहीं रहता ।
५. अण्डोंके भ्रंश होनेसे ।
१. यह बहुत बड़ा रोग है । पैंसी दशामें शुद्ध रज नहीं निकलता और गर्भाशयमें परिवर्तन हो जाता है । अतएव गर्भ नहीं रहता ।