संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंगर्भ न रहने के कारण ।
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७. कफ और वायुके दूषित रजसे ।
१. इस रोगसे रजमें गाँठें पड़ जाती हैं । अतएव गर्भ नहीं रहता ।
६. पित्त और कफके दूषित रजमें ।
१. इस रोगमें रज पीप सरीखा गाढ़ा और वृद्धवृदार होता है अतएव गर्भ नहीं रहता ।
७. पित्त और वायुके दूषित रजमें ।
१. इस रोगमें रज क्षीण हो जाता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
८. त्रिदोष ( वात पित्त कफ ) के दूषित रजमें ।
१. इस रोगसे दूषित रज अनेक रंगका और निकम्मा होता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
४. प्रदर रोगके अनेक विकारोंसे ।
(इसके विषयमें इसी पुस्तकका 'प्रदर रोग' प्रकरण देखो) ।
१. इस रोगमें गर्भाशय और योनिमें विकार पैदा हो जाता है और रज निकम्मा पड़ जाता है । पुरुषके वीर्य से प्रदरके श्वेत पदार्थका संयोग हो जानेसे पीर्य्य के कीड़े नाश हो जाते हैं । यह रोग रज और वीर्य्य दोनों को नष्ट कर देता है । इसलिये गर्भ नहीं रहता ।
५. गर्भाशयके अनेक रोगोंसे ।
(इस विषयमें इसी पुस्तकका "गर्भाशयके रोग" प्रकरण देखो ।)
१. गर्भाशयके बाहरी मुखका छोटा पड जाना—इसमें दो भेद हैं ।
१. जन्मसे गर्भाशयका मुख छोटा होना । इस कारण वीर्य्य गर्भाशयके अंदर नहीं जाता ।