भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

१०. फलवाहिनी नलीके रोगोंसे ।

(इस विषयमें इसी पुस्तकका "फलवाहिनी नली" प्रकरण देखो ।)

१ फलवाहिनी नलीका शोथ ।

१. इस रोगमें नली सूज जाती है अतएव थ्रएड और गर्भाशय दूषित हो जाते हैं, इसलिये गर्भ नहीं रहता ।

२ फलवाहिनी नलीका देहा हो जाना ।

१. इस रोगमें नली टेढ़ी हो जाती है, अतएव गर्भ-थ्रएड और गर्भाशयमें विकार उत्पन्न हो जाता है, इसलिये गर्भ नहीं रहता ।

३ फलवाहिनी नलीमें रक्त जम जाना ।

१. उस रोगमें रक्त जमकर गर्भ-थ्रएड और गर्भाशय दोनोंमें विकार उत्पन्न हो जाता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।

११ उपद्रुश्यसे ।

(इस विषयमें इसी पुस्तकका 'उपद्रुश्य' प्रकरण देखो ।)

१ यह वृत्तदार रोग है, इसमें योनि और गर्भाशय इत्यादि नष्ट हो जाते हैं । रजजंतु निकम्मे पड़ जाते हैं, अतएव थोड़े हुए रोगमें गर्भ नहीं रहता ।

१२. रजकीयके निकम्मे होनेसे ।

१ जब रजका क्रीडा निकम्मा हो जाती है, तो गर्भ नहीं रहता ।

(२) पुरुषोंमें होनेवाले कारण ।

१३. लिंगेन्द्रियके छोटे होनेसे ।

१. छोटी लिंगेन्द्रिय ठीक रीतिसे वीर्ये अंग्रह नहीं पहुंचा सकती, अतएव ऐसा होनेपर गर्भ नहीं रहता । (श० क०)