संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 302 में से
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सन्तति-शास्त्र ।
१०. फलवाहिनी नलीके रोगोंसे ।
(इस विषयमें इसी पुस्तकका "फलवाहिनी नली" प्रकरण देखो ।)
१ फलवाहिनी नलीका शोथ ।
१. इस रोगमें नली सूज जाती है अतएव थ्रएड और गर्भाशय दूषित हो जाते हैं, इसलिये गर्भ नहीं रहता ।
२ फलवाहिनी नलीका देहा हो जाना ।
१. इस रोगमें नली टेढ़ी हो जाती है, अतएव गर्भ-थ्रएड और गर्भाशयमें विकार उत्पन्न हो जाता है, इसलिये गर्भ नहीं रहता ।
३ फलवाहिनी नलीमें रक्त जम जाना ।
१. उस रोगमें रक्त जमकर गर्भ-थ्रएड और गर्भाशय दोनोंमें विकार उत्पन्न हो जाता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
११ उपद्रुश्यसे ।
(इस विषयमें इसी पुस्तकका 'उपद्रुश्य' प्रकरण देखो ।)
१ यह वृत्तदार रोग है, इसमें योनि और गर्भाशय इत्यादि नष्ट हो जाते हैं । रजजंतु निकम्मे पड़ जाते हैं, अतएव थोड़े हुए रोगमें गर्भ नहीं रहता ।
१२. रजकीयके निकम्मे होनेसे ।
१ जब रजका क्रीडा निकम्मा हो जाती है, तो गर्भ नहीं रहता ।
(२) पुरुषोंमें होनेवाले कारण ।
१३. लिंगेन्द्रियके छोटे होनेसे ।
१. छोटी लिंगेन्द्रिय ठीक रीतिसे वीर्ये अंग्रह नहीं पहुंचा सकती, अतएव ऐसा होनेपर गर्भ नहीं रहता । (श० क०)