भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्निविशाल ।

१८. प्रेमहू रोगसे ।

१. इस रोगमें वीर्यमें दमका करता है, यह वीर्य प्रकारका होता है। वीर्यमें शीघ्र होनेके कारण उसके जन्म निकलने होता है, अतएव ऐसे बड़े हुए रोगमें गर्भ नहीं रहता।

२०. वीर्यमें जन्मओंका न होना ।

१. यह अविनैयुत से होता है । जिनका अविनैयुत है, किंवा जन्मका वीर्यमें जन्मओं को उठती ही क्ली होती है। ऐसे दूषित जन्ममें नैयुत करनेसे गर्भ नहीं रहता ।

२१. शिगमिन्मिका बीड़ा पड़ जाना ।

१. यह जैग वीर्यमें दोष लादेवाजी और हस्तमैयुत इत्यादि हुए क्ली से होता है । अतएव ऐसे दूषित जन्ममें गर्भ नहीं रहता ।

२२. नामदी से ।

१. जिनके वरुद्धे नामदे होते हैं, वे सब क्ली से गर्भ पाए नहीं कर सकते । अतएव ऐसे क्ली संयोग से गर्भ नहीं रहता ।

२३. त्रनेक प्रकारके दूषित वीर्यसे ।

(इस विषयमें इसी पुस्तकका "सूत्र और दूषित रज वीर्य" प्रकार देखो ।)

१. बहुत हागई जन्म वीर्यसे ।

१. ऐसे वीर्यका सूक्ष्मतासे काला सिरे दूषित होता है, अतएव गर्भ धारण के उपयोगों नहीं होता ।

१. निरुद्धे दूषित वीर्यसे ।

१. इस रोगमें वीर्यमें नीचे पीने सूक्ष्मता दूषित होता है । इसदिने इससे गर्भ नहीं रहता ।