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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

ही रहता है। वीर्य जव मज्जा धातुसे बनकर २६ से लेकर ३६ घंटे पर्यन्त वीर्यशयमें रह चुकता है, तव उस वीर्यके कौठे पुष्ट होते हैं। जो लोग इससे कम समयमें या दिन रातमें कई बार प्रसंग करते हैं तो कच्चे रहते हैं उनके वीर्यमें वीर्य-जन्तु होते ही नहीं, यदि होते भी हैं तो कच्चे रहते हैं और उनमें कूदने और गर्भ बनानेकी शक्ति ही नहीं होती।

इसमें एक बहुत बड़ी वारीकी यह है कि पुरुषकी कम अवस्थामें ऐसे जन्तु कभी नहीं पकते। एक विद्वानकी राय है कि जन्तुओंका पकना वीस वर्षकी अवस्थासे प्रारंभ होता है, और पचीस वर्षकी अवस्थामें खूब अच्छी तरह पक जाते हैं इनके बाद हमेशा पकते रहते हैं। यह बात उन लोगोंमें पाई जाती है कि जिन्होंने पचीस वर्षतक ब्रह्मचर्य पालन किया है, परन्तु जिसका ब्रह्मचर्य इस नियत समयतक नहीं रहा, उनके वीर्य-जन्तु हमेशा बुरी दशामें रहते हैं। इस विषयमें ऐसा नहीं होता कि जिन्होंने पच्चीस वर्षतक ब्रह्मचर्य नहीं पालन किया है, सोलह अथवा वीस वर्षकी अवस्थासे ही स्त्री संयोग प्रारंभ हो गया है, तां उनका वीर्य जन्तु पचीस वर्षकी अवस्थामें जाकर पक जावेगा। यह एक बड़ी भूल है, ऐसे लोगोंके वीर्य जन्तु आगे चलकर नहीं पकते, किन्तु अधिकचरे रह जाते हैं। इसी प्रकार स्त्रियोंमें रजवती होनेके समयसे लेकर १६ वर्ष तक रज-जन्तु पक कर ठीक हो जाते हैं और सीतही अवस्थाओंमें पुष्टता आ जाती है। वैद्यकने भी ऐसा ही माना है कि पचीस वर्षकी अवस्थामें पुरुष और सोलह वर्षकी अवस्थामें स्त्री दोनों बराबरकी शक्तिवाले होते हैं। १० क

इस विषयमें स्त्री और पुरुषोंको कुर्पके संमान समझना चाहिये। जिस प्रकार दो चार हाथ भूमिमें गले हुए कुर्प थोडा