संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 302 में से
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सन्तति-शान्त ।
६. गर्भाशयमें जलका भर जाना ।
इसका निश्च कारण है ।
१. किसी कारण गर्भाशयका मुख बन्द हो जानेसे गर्भाशय-को ढके रहनेवाली फिल्लीसे जल या रक्त मिला हुआ जल गर्भाशयमें इकट्ठा हो जाता है । ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. पेट फूल जाता है । हाथ पैरोंसे गर्भके चिन्ह मालूम होने हैं । कै, जो मचलाना, घुमनी, बदनमें सुस्ती इत्यादि मालूम होती हैं ।
ऐसी दशा में स्त्रियाँ प्रायः गर्भका तन्देह करती हैं । बड़े हुए रोगमें बड़ी कठिनाई पड़ती है ।
१०. गर्भाशयकी गाँठ ।
यह दो प्रकारकी होती है ( १ ) मामूली ( २ ) मिली हुई ।
१. गर्भाशयकी मामूली गाँठ ।
यह ठोस होती है । देखनेमें आकार गोल होता है । किसी किसीकी लम्बी और कुछ देढ़ी भी होती है । जब यह गर्भाशयके मुखपर होती है तो स्त्री बंध्या हो जाती है और यदि गर्भाधान होनेके बाद ऐसी गाँठ पड़ जाय, तो प्रसवमें बड़ी-कठिनाई पड़ती है ।
२. गर्भाशयकी मिली हुई गाँठ ।
इसकी बनावट गोल मांस के रेशों से बनी होती है । इसमें कुछ चोफसों जान पड़ता है और गर्भ सरीसा प्रतीत होता है । ज्यों ज्यों गाँठ बढ़ती जाती है, त्यों त्यों भारीपन आता जाता है । रजका भाव एकाएक बन्द हो जाता है । दर्द, बरदघुमती, हाथ पाँवमें जलन, कमज़ोरी, चेहरेकी रंगत पीली और स्त्रीमें सुस्ती आ जानी है ।