भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १५८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ शैव-

द्ववलक्षणकृत्यपञ्चककारणं स्वेच्छानिर्मितं तच्छरीरं न चास्म- च्छरीरसदृशम् । तदुक्तं श्रीमन्मृगेन्द्रे --"मलाद्यसम्भवाच्छाक्तं वपुर्नैतादृशं प्रभो " इत । अन्यत्रापि- "तद्वपु पञ्चभिर्मन्त्रैः पञ्चकृत्योपयोगिभि । ईशतत्पुरुषाघोिवामाद्यैर्मस्तकादिमत्॥" इति ॥ ८ ॥ अनुमानसे स्वतन्त्र ईश्वर कर्ता सिद्ध हो परन्तु अशरीरी कर्ता कहीं दृष्ट नहीं हे सर्वत्र घटादि कर्ता कुलालादि शरीरवान् ही दृष्ट हे यदि ईश्वरकोभी शरीरी मानो तो ईश्वरभी अस्मदादिवत् क्लेशकर्मादियुक्त परिमितशक्तिमान् अल्पज्ञ हो जायगा यहभी नही कह सक्तं क्योकि जिस समय प्रथम आत्मा शरीरमें प्रवेश करता हे उस समय आत्मा अशरीर होते हुएभी शरीर प्रवेश और चलनादिमें कर्ता रहता है अत सशरीर ही कर्ता होता है इसमे कोई प्रबल युक्ति नहीं हे ईश्वरको सकर्तृक मानभी लो तोभी पूर्वोक्त दोष नहीं आसकता कारण मलकर्मादि पाश जाल न होनेसे ईश्वरका प्राकृत शरीर नही किन्तु शक्तिकल्पित है शक्तिरूप ईशानादि मन्त्रपञ्चकसे मस्त- कादि जग यथा 'ईशान. सर्वविद्यानाम्' इससे मस्तक तथा 'तत्पुरुषाय' इत्यादिसे मुख 'अघोरेभ्योथघोरघोरतरेभ्य ' इत्यादिसे हृदय, वामदेवमन्त्रसे गुह्य 'सद्योजात' इत्यादिसे पादयुक्त ईश्वर कल्पित होनेपरभी यथाक्रम अनुग्रह, तिरोभाव, आदान, लक्षण स्थितिलक्षण पाच कार्यके हेतु स्वेच्छानिर्मित ईश्वरशरीर अस्मदादि शरीरके समान नहीं है। मृगेन्द्रनेभी कहा हे कि प्रभुका शरीर पापरहित होनेसे प्राकृत शरीर सदृश नहीं है। अन्यत्रापि, ईश्वर शरीर पञ्च कृत्योंके उपयोगी ईश, तत्पुरुष, अघोर, वाम इत्यादि पञ्च मन्त्रोंसे कल्पित मस्तकादिमान् है ॥ ८ ॥ ननु पञ्चवक्त्रस्त्रिपञ्चदृगित्यादिना आगमेषु परमेश्वरस्य मुख्यत एव शरीरेन्द्रियादियोग श्रूयत इति चेत् सत्यं निराकारे ध्यान- पूजाद्यसम्भवेन भक्तानुग्रहकरणाय तत्तदाकारग्रहणाविरोधात् । तदुक्तं श्रीमत्पौष्करे--"साधकस्य तु रक्षार्थ तस्य रूपमिदं स्मृतम्" इति । अन्यत्रापि-आकारावांस्त्वं नियमादुपास्यो न वत्स्वनाकारमुपैतिबुद्धिः " इति ॥ ९ ॥ यदि कहो पञ्चवक्रादि मन्त्रोंसे वेदमें परमेश्वरका शरीरेन्द्रियादि सम्बन्ध वास्तव- विक प्रतिपादन करते हैं अत कल्पित मानना अयुक्त हे सत्य हे निराकारका

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