सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें⁻दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १६७ ) होनेसे पाशशब्द औपचारिक है फल चाहनेवाले जो करते हैं वह कर्म्म है वह धर्मा- धर्मात्मक द्विविध प्रवाहरूपसे अनादि है जिस प्रकार मल अनादि है उसी प्रकार उसका कर्मभी अनादि है यदि कर्म अनादि न होता तो जगत्का वैचित्र्य कैसे होता ? प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत् शक्तिसहित जिसमें लीन हो और सृष्टिके समय जिसमें व्यक्त हो वह माया है अतएव सौग्भ्येमे कहा है कि महाक्षय ( प्रलय ) में शक्तिके साथ कार्यलीन और विकृति ( सृष्टि ) में कलादि कार्यरूपसे व्यक्त होते हैं यद्यपि इस विषयमें बहुत कहना है तथापि ग्रन्थविस्तर भीतिसे छोडे देता हूँ । पतिशब्दार्थ विद्या अविद्या इस प्रकार पति पशु और पाशरूप पदार्थ त्रयका दिग्दर्शन किया । पति, विद्या, अविद्या, पशु, पाश और पाशनिवृत्तिका कारण संक्षेपसे ये ६ पदार्थ निरूपण किये हैं । ये सब ज्ञानरत्नाल्ल्यादिमें प्रसिद्ध है । अत उससे जान लेना इति सर्वदर्शनसंग्रहे शैवदर्शन समाप्त । अथ प्रत्यभिज्ञादर्शनम् ॥ ८ ॥ अत्रापेक्षाविहीनाना जडाना कारणत्वं दुष्यतीत्यपरितुष्यन्तो मतान्तरमन्विष्यन्तः परमेश्वरेच्छावशादेव जगन्निर्माणं परि- घुष्यन्तः स्वसंवेदनोपपत्त्यागमसिद्धप्रत्यगात्मतादात्म्ये नानावि- धमानमेयादिभेदाभेदशालिपरमेश्वरोऽनन्यमुखप्रेक्षित्त्वलक्षणस्वा- तन्त्र्यभाक् स्वात्मदर्पणे भावान् प्रतिबिम्बवदभासयदििति भण- न्तो वाह्याभ्यन्तरचर्य्याप्राणायामादिक्लेशप्रयासकलावैधुर्य्येण सर्वसुलभमभिनवं प्रत्यभिज्ञामात्रं परापरसिद्धयुपायमभ्युपग- च्छन्तः परे माहेश्वरा प्रत्यभिज्ञाशास्त्रमभ्यस्यन्ति ॥ १ ॥ निरपेक्ष जडका कारणत्व असम्भव है इत्यादि वादमें धमन्तोप प्रकट करके मतान्तर स्थापनेच्छासे ईश्वरकी इच्छावश जगतकी सृष्टि होती है इस प्रकार उद्घोष करते हुए आत्मसंवेदन युक्ति और शास्त्र बलसे सिद्ध जो प्रत्यगात्माका जभेद उसमें अनेक विध प्रमाण प्रमेयादिके साथ भिन्नाभिन्नरूप परमेश्वर अन्यके अनपेक्षरूप स्वातन्त्र्ययुक्त आत्मरूपी दर्पणपे प्रतिबिम्बके समान भासित होते हैं इस प्रकार कहते हुए बाह्य चर्या ( सेवा ) आन्तर प्राणायामादिक्लेशके बिना ही सबको सुलभ