सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १६९ ) यथाभिलषितमिति दास परमेश्वरस्वरूपस्वातन्त्र्यपात्रमित्यर्थः । जनशब्देनाधिकारिविषयनियमाभाव प्रादर्शि । यस्य यस्य हीदं स्वरूपकथनं तस्य तस्य महाफलं भवति प्रधानस्यैव परमार्थफलत्वात् ॥ ५ ॥ ईश्वरस्य–मायासे परे होनेपरभी महामायाके अधिष्ठानभूत ब्रह्म विष्णु आदि जिनके ऐश्वर्यलेशसे ईश्वर हो गये हैं वही अनवच्छिन्न (अप्रतिहत) प्रकाश आनन्द स्वातन्त्र्ययुक्त भगवान् महेश्वर हैं उनके दास्य अर्थात् स्वामी अभिलषित सम्पूर्ण वस्तु जिसके लिये दे वह परमेश्वरस्वरूपका स्वातन्त्र्यपात्र दास है । जन इस पदसे अधिकारीविशेषका अनियम दिखाया जिन २का यह स्वरूपकथन हो उन सबको महा- फलहोता है प्रधानकोही परमार्थ फल होता है ॥ ५ ॥ तथोपदिष्टं शिवदृष्टौ परमगुरुभिर्भगवत्सोमानन्दनाथपादैः– एकवारं प्रमाणेन शास्त्राद्वा गुरुवाक्यतः । ज्ञाते शिवत्वे सर्व- स्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना ॥ करणेन नास्ति कृत्यं कापि भावन- या सकृत् । ज्ञाते सुवर्णे करणं भावनां वा परित्यजेत्॥” इति॥ अपिशब्देन स्वात्मनस्तदभिन्नतामाविष्कुर्वता पूर्णत्वेन स्वा- त्मनि परार्थसम्पत्त्यतिरिक्तप्रयोजनान्तरावकाशश्च पराकृतः । परार्थश्च प्रयोजनं भवत्येव तल्लक्षणयोगात् न ह्ययं देवशाप- स्वार्थ एव प्रयोजनं न परार्थ इति । अत एवोक्तमक्षपादेन– ‘यमर्थमधिकृत्य प्रवर्त्तते तत् प्रयोजनम् ’ इति ॥ ६ ॥ शिवदृष्टिमे सोमानन्दनाथने वैसाही उपदेश किया है–एक बार प्रमाण(प्रत्यक्षादि) शास्त्रद्वारा अथवा गुरुवाक्यसे अथवा दृढ युक्तियोंसे सर्वभावस्थ शिवत्वज्ञान होनेपर पुनः साधनोंका और भावनाका प्रयोजन नहीं है सुवर्णवर्णवस्तुका यथार्थ ज्ञान होनेपर उसके साधन कसौटी आदिको त्याग दिया जाता है । अपिशब्दसे अपनी आत्माको शिवके साथ अभेद प्रतिपादन होनेसे पूर्णतया स्वात्मामें परार्थसम्पत्तिसे अतिरिक्त प्रयोजनान्तरके प्रसंगका निषेध किया । प्रयोजन लक्षणसमन्वित होनेसे परार्थ प्रयोजन होताही है प्रयोजन स्वार्थही होता है परार्थ नहीं ऐसा कोई देवताका