भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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म्भारमभित्तावेव तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्ला- घ्याय शूलिने ॥” इति ॥ १४ ॥ यदि घटादि कार्यके प्रति मृदादि परमार्थतः कारण होता तो योगियोंकी इच्छा- मात्रसे कैसे घटादि उत्पन्न होते ? यदि कहो मृदादिसे जायमान घटादि कार्य कुछ अन्य है और योगियोंकी इच्छासे उत्पन्न कार्य अन्य है उसमेंभी कारणभेदसे कार्य भेद प्रसिद्ध है जो लोग कहते हैं उपादान ( समवायिकारण ) के विना कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती । योगीलोग इच्छासे परमाणुको संघटित करते हैं उनसे कहना चाहिये कि प्रसिद्ध कार्यकारणभावका विपर्यय होता तो घटमृत्पिण्डचक्रादि देहके लिये स्त्रीपुरुषसंयोगादिकी भी अपेक्षा होगी एवञ्च योगियोंकी इच्छामात्रसे तत्काल घटादिकी उत्पत्ति कथमपिसम्भवित न होगी तथाच महाऐश्वर्यशाली भगवान् महादेव प्रारब्धकोभी उलङ्घनरूप स्वातन्त्र्ययुक्त कार्य करते हैं इस पक्षमें कोई झगडा ही नहीं है वसुगुप्ताचार्यनेभी कहा है उपादानादि सामग्री ओर भित्तिके विना जो संसाररूप चित्रका विस्तार करते हैं ऐसे कलाकुशल शूलीके लिये नमस्कार है ॥ १४ ॥ ननु प्रत्यगात्मन परमेश्वराभिन्नत्वे संसारसम्बन्धः कथं भवे- दिति चेत्तत्रोक्तमागमाधिकारे—“एष प्रमाता मायान्धः संसारी कर्मबन्धन । विद्यादिज्ञापितैश्वर्यश्चिद्घनो मुक्त उच्यते ॥” इति ॥ ननु प्रमेयस्य प्रमातृभिन्नत्वे बन्धमुक्तयोः प्रमेयं प्रति को विशेषः अत्राप्युत्तरमुक्तं तत्त्वार्थसंग्रहाधिकारे—“मेयं साधारणं मुक्तः स्वात्माभेदेन मन्यते । महेश्वरो यथा बद्धः पुनरत्यन्तभेदवत् ॥” इति ॥ १५ ॥ जीवात्मा यदि परमेश्वरसे अभिन्न हो तो संसारका सम्बन्ध कैसे होगा ? परमेश्वर विनिर्मुक्त है इस शंकाका समाधान आगमाधिकारमें कहा है कि उक्त प्रमाता ( चे- तन ) मायासे अज्ञानी होकर पुण्यपापरूप कर्मबन्धनयुक्त संसारी होता है विद्यासे स्वरूप और ऐश्वर्यादि बोधित होनेपर चिद्घनानन्द मुक्त होते हैं ? यदि प्रमेय (विषय) प्रमातासे भिन्न हो तो बन्ध ओर मोक्ष दशामें प्रमेयका विशेषही क्या होगा ? उत्तर-यद्यपि मेय उभयसाधारण है तथापि मुक्त महेश्वर अपनेसे अभिन्नरूपसे मानते हैं बद्ध संसारी अत्यन्त भेदरूपसे मानते हैं ॥ १५ ॥