सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १७७ ) करोति तदा तत्क्षणमेव पूर्णभावमत्येति । एवं स्वात्मनि विश्वेश्वरात्मना भासमानेऽपि तन्निर्भासनं तदीयगुणपरामर्श- विरहसमयं पूर्णं भावं न सम्पादयति । यदा तु गुरुवचनादिना सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वदिलक्षणपरमेश्वरोत्कर्षपरामर्शो जायते तदा तत्क्षणमेव पूर्णात्मतालाभ ॥ १८ ॥ शंका-प्रमाताके विश्रान्तिसारभूत कार्य प्रत्यभिज्ञानके बिना नहीं होता है प्रत्यभिज्ञान होनेसे होता है, ऐसा नियम क्या कही दृष्ट है ? उत्तर-जिस प्रकार नायकके गुणोंको सुन अत्यन्त अनुरागवाली नायिका कामातुर हो विरहपीडाके सहनेमें असमर्थ मदनलेखाका अवलम्बन करके अपनी अवस्थाको निवेदन करती है और आतुरतासे नायकके समीप जाकर उनको अवलोकन करनेपरभी पूर्व अप- रिचित और जन साधारणसे बोधित न होनेके कारण अपने हृदयके भावको नही प्रकट करसकती हे । जब किसीके द्वारा ' तुम्हारा अभिमत पुरुष यही है' ऐसा विदित हो जाय तब अपने हृदयके भावको उससे प्रकट करती है उसी प्रकार विश्वेश्वररूपसे आत्मा प्रकाशित होनेपरभी वह प्रकाश उनके गुणपरामर्शके विना पूर्णभावको संपादन नहीं कर सकता जब गुरुवचनादिसे सर्वज्ञत्व सर्वकर्तृत्वादि परमेश्वरका उत्कर्षज्ञात होता है तब पूर्णतया आत्मस्वरूप प्राप्त होजाता है ॥ १८ ॥ तदुक्तं चतुर्थे विमर्शे-“तैस्तैरप्युपयाचितैरुपन्नतस्तस्याः स्थितोऽप्यन्तिके कान्तो लोकसमान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा। लोकस्यैष तथानपेक्षितगुणः स्वात्मापि विश्वेश्वरो नैवायं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता॥” इति॥ अभि नवगुप्तादिभिराचार्यैर्विहितप्रतानोऽपि अयमर्थः संग्रहमुपक्रम- माणैरस्माभिर्विस्तराभिया न प्रतानित इति सर्वं शिवम् ॥ १९ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे प्रत्यभिज्ञादर्शनं समाप्तम् ॥ ८ ॥ जिस प्रकार नायक अनेक प्रार्थनाओंद्वारा आकर नायिकाके समीपमें स्थितभी हो किंतु अपरिचित होनेके कारण अन्य पुरुषकी समान नायिकाके रमण करने योग्य नहीं होता है उसी प्रकार आत्मस्वरूपसे प्रकाशमान विश्वेश्वरभी पूर्व अपरिचित होनेसे लोगोंको स्वकीय वैभव प्रकट करने योग्य नहीं होते हैं अतः प्रत्यभिज्ञाशास्त्रकी आवश्यकता है। यह सब अभिनवगुप्ताचार्यादिके ग्रंथोंमें प्रपञ्चित है यहाँ केवल दिग्दर्शन मात्र है ॥ १९ ॥ इति प्रत्यभिज्ञादर्शन समाप्त । १२