सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [रसेश्वर- अथ रसेश्वरदर्शनम् ॥ ९ ॥ अपरे माहेश्वरा परमेश्वरतादात्म्यवादिनोऽपि पिण्डस्थैर्ये सर्वाभिमता जीवन्मुक्ति सेत्स्यतीत्यास्थाय पिण्डस्थैर्योपायं पारदादिपदवेदनीय रसमेव सङ्गिरन्ते । रसस्य पारदत्वं संसार- परपारप्रमाणहेतुत्वेन । तदुक्तम्- ‘संसारस्य परं पारं दत्तेऽसौ पारदः स्मृतः ॥’ इति ॥ १ ॥ कोई माहेश्वर परमेश्वरके साथ तादात्म्य मानते हुए भी शरीरकी स्थिरता होने- हीसे सर्वाभिमत जीवन्मुक्ति होसकती है ऐसा मानकर शरीरकी स्थिरताके उपायभूत पारदरस ( पारे ) को मानते हैं संसारसे जो पार करदे उसको पारद कहते हैं ॥ १ ॥ रसार्णवेऽपि-पारदो गदितो यस्मात्परार्थं साधकोत्तमै । सुप्तोऽयं मत्समो देवि मम प्रत्यङ्गसम्भवः ॥ मम देहरसो यस्माद्रसस्तेनायमुच्यते ॥” इति ॥ २ ॥ रसार्णवमेंभी कहाहै-हे पार्वति ! हमारे अंगसे उत्पन्न ओर शोधन होनेपर हमारे समान फलदायी है इस कारण श्रेष्ठ साधकोंने उत्कृष्ट प्रयोजनके लिये पारदहीको कहा है । मेरी देहका रस ( वीर्य ) होनेसे पारद रस कहाता है ॥ २ ॥ प्रकारान्तरेणापि जीवन्मुक्तियुक्तौ नेयं वाचो युक्तिर्युक्तिमतीति चेन्न षट्सपि दर्शनेषु देहपातानन्तरं मुक्तेरुक्ततया तत्र विश्वासातुपपत्त्या निर्विचिकित्सप्रवृत्तेरनुपपत्तेः । तदप्युक्तं तत्रैव-“षड्दर्शनेऽपि मुक्तिस्तु दर्शिता पिण्डपातने । कराम- लकवत्सापि प्रत्यक्षा नोपलभ्यते । तस्मात्तं रक्षयेत्पिण्डं रसै- श्चैव रसायनै ॥” इति । गोविन्दभगवत्पादाचार्यैरपि-“ इति धनशरीरभोगात्मता नित्यान्सदैव यतनीयम् । मुक्तौ सा च ज्ञानात्तच्चाभ्यासात्स च स्थिरे देहे ॥” इति ॥ ३ ॥ यदि कहो जब प्रकारान्तरसेभी मुक्ति होती है तो यह युक्ति ठीक नहीं सोभी नहीं कह सकते षड्दर्शनोंमें शरीर नाशके अनन्तर मुक्ति कही है परन्तु मरनेपर मुक्ति होती है इसमें विश्वास न होनेसे उस विषयमें निःसन्देह प्रवृत्तिभी असम्भव है