भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १७९) अतएव कहा है ३ दर्शनोंमें मरनेके बाद मुक्ति कही है परन्तु सोभी हाथके आमलेकी समान प्रत्यक्ष नहीं होती । जीवन्मुक्ति सबको प्रत्यक्ष है अतः रस और रसायनासे शरीरकी रक्षा करे। गोविन्दभगवत्पादाचार्यनेभी लिखा है धन शरीर और भोगको नित्य जानकर मुक्तिके लिये सदा यत्न करे मुक्तिभी ज्ञानसे होती है ज्ञान अभ्याससे होता है और अभ्यास शरीरकी स्थिरतासे होता है ॥ ३ ॥ ननु विनश्वरतया दृश्यमानस्य देहस्य कथं नित्यत्वमनुमीय- तइति चेन्मैवं मंस्था, पाट्कौशिकस्य शरीरस्यानित्यत्वे रसा- भ्रकपदाभिलप्यहरगौरीसृष्टिजातस्य नित्यत्वोपपत्तेः ! तथा च रसहृदये- "ये चात्यक्तशरीरा हरगौरीसृष्टिजान्तरं प्राप्ताः । वन्द्यास्ते रससिद्धा मन्त्रगणः किङ्करो येषाम् ॥" इति ॥ तस्माज्जीवन्मुक्ति समीहमानेन योगिना प्रथमं दिव्यतनुर्वि- धेया हरगौरीसृष्टिसंयोगजनितत्वञ्च रसस्य हरजत्वेनाभ्रकस्य गौरीसम्भवत्वेन तत्तदात्मकत्वमुक्तम् । "अभ्रकस्तव बीजं तु मम बीजं तु पारदः । अनयोर्मेलनं देवि मृत्युदारिद्र्यनाश- नम् ॥" इति ॥ ४ ॥ यदि कहो शरीरका नाश प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेसे उसको नित्य मानना अतीव असंगत है यहभी नहीं कह सकते क्योंकि पाट्कौशिक शरीर अनित्य होनेपरभी रस अभ्रकपदवाच्य हर गौरी सृष्टिसे उत्पन्न शरीरको नित्य माननेमें अनुपपत्ति नहीं है । रसहृदयमेंभी कहा है जिन्होंने शरीरको त्याग नही किया हो और हरगौरीसे कल्पान्तरमे प्राप्त हो मन्त्रगण जिनके किङ्कर हों ऐसे रससिद्ध अत्यन्त वन्दनीय है अतः जीवन्मुक्ति चाहनेवाले योगियोंको प्रथम दिव्य शरीर सम्पादन करना चाहिये रस हरसे और अभ्रक गौरीसे उत्पन्न होनेके कारण 'हरगौरी सृष्टि संयोगजनित कहाते हैं । हे ! पार्वती अभ्रक ( अबरक ) तुम्हारा बीज है और पारा मेरा बीज है इन दोनोंका सम्मेलन मृत्यु और दारिद्र्य नाशक होता है ॥ ४ ॥ अत्यल्पमिदमुच्यते देवदैत्यमुनिमानवादिषु बहवो रससामर्थ्या- द्दिव्यं देहमाश्रित्य जीवन्मुक्तिमाश्रिताः श्रूयन्ते । रसेश्वरसि- द्धान्ते--"देवा केचिन्महेशाद्या दैत्या कंसपुरःसराः । मुनयो

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