सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रसेश्वर- वालखिल्याद्या नृपा सोमेश्वरादय ॥ गोविन्दभगवत्पादा- चार्यौ गोविन्दनायक । चर्वटि कपिलो व्यालि कापालि कन्दलायन ॥ एतेऽन्ये बहवः सिद्धा जीवन्मुक्ताश्चरन्ति हि । तनुं रसमयीमाप्य तदात्मककथाचणा ॥” इति ॥ ५ ॥ यह तो बहुतही अल्प बात है रसेश्वरसिद्धान्तमे देव, दैत्य, मनुष्य और मुनि- योंमें अनेक रसप्रभावसे जीवन्मुक्त वर्णित हैं यथा महेशादि देव, बल्यादि असुर, वालखिल्यादि मुनि और सोमेश्वरादि नृप रसके प्रभावसे जीवन्मुक्त होगये हैं । गो- विन्दभगवत्पाद, गोविन्दनायक, चर्वटि इत्यादि अनेक सिद्ध रसायनिक कथामे निपुण रसमय शरीर प्राप्त कर जीवन्मुक्त होकर विचरते हैं ॥ ५ ॥ अयमेवास्यार्थ परमेश्वरेण परमेश्वरी प्रति प्रपञ्चितः । “कर्म- योगेन देवेशि प्राप्यते पिण्डधारणम् । रसश्च पवनश्चेति कर्म- योगो द्विधा स्मृतः ॥ मूर्च्छितो हरति व्याधीन्मृतो जीवयति स्वयम् । बद्धः खेचरतां कुर्याद्रसो वायुश्च भैरवि ॥ ” इति । मूर्च्छितस्वरूपमप्युक्तम्-“ नानावर्णो भवेत्सूतौ विहाय घनचापलम् । लक्षणं दृश्यते यस्य मूर्च्छितं तं वदन्ति हि ॥ आर्द्रत्वञ्च घनत्वञ्च तेजो गौरवचापलम् । यस्यैतानि न दृश्यन्ते तं विद्यान्मृतसूतकम् ॥” इति ॥ अन्यत्र बद्धस्वरूपमप्यभ्य- धायि--“अक्षतश्च लघुद्रावी तेजस्वी निर्मलो गुरु । स्फोटनं पुनरावृत्तौ बद्धसूतस्य लक्षणम् ॥” इति ॥ ६ ॥ हे पार्वति ! कर्मयोगसे शरीरकी स्थिरता होती है रस और पवनभेदसे कर्म्मयोग दो प्रकार है । हे पार्वति ! रस और वायु मूर्छित होनेसे रोगोंको हरण करते हैं और मृत शुद्ध होनेसे स्वयं जिलाते हैं तथा बद्ध होनेसे गगनचारी बनाते हैं । मूर्छित स्वरूपको कहते हैं कि घन चापलको छोडकर नानावर्ण जब होते हैं तब उसको मूर्छित कहते हैं । आर्द्रत्व, घनत्व, तेज, गौरव, चापल ये जिसमें न हों उसको मृत सूतक जानना । बद्धस्वरूप कहते हैं-अक्षत, लघुद्रावी, तेजस्वी, निर्मल, गुरु पुनरावृत्तिमें स्फोटन, बद्धसूतका लक्षण है ॥ ६ ॥