भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १८१) ननु हरगौरीसृष्टिसिद्धौ पिण्डस्थैर्यमास्थातुं पार्यते तत्सि- द्धिरेव कथमिति चेन्न अष्टादशसंस्कारवशात्तदुपपत्ते । तदुक्त माचार्यै --"तस्य हि साधनविधौ सुधियां प्रति कर्म निर्मला- प्रथमम् । अष्टादश संस्कारा विज्ञातव्याः प्रयत्नेन ॥ " इति । ते च संस्कारा निरूपिता " स्वेदनमर्द्दनमूर्च्छनस्थापन- पातननिरोधनियमाश्च । दीपनगमनग्रासप्रमाणमथ जारणा- पिधानम् ॥ गर्भद्रुतिबाह्यद्रुतिक्रारणसरागसारणाश्चैव । क्राम- णवेधौभक्षणमष्टादशेति रसकर्म ॥ " इति । तत्प्रपञ्चस्तु गोविन्दभगवत्पादाचार्यसर्वज्ञरामेश्वरभट्टारकप्रभृतिभिः प्राची- नैराचार्यैर्निरूपित इति ग्रन्थभूयस्त्वभयादुदास्यते ॥ ७ ॥ हरगौरीसृष्टि सिद्ध होगी तो शरीरभी स्थिर होगा परन्तु सिद्धि कैसे होती है सो कहते हैं । अष्टादश संस्कारसे सिद्धि होती है उसके साधनविधिमें प्रथम १८ उत्तम संस्कार बुद्धिमानोको जान लेने चाहिये । संस्कार-स्वेदन, मूर्च्छन, स्थापन, पातन, निरोधन, नियम, दीपन, गमन, ग्रासप्रमाण, जारण, पिधान, गर्भद्रुति, बाह्यद्रुति, क्षारण, सराग, सारण, क्रामण, वेध, और भक्षण ये अष्टादश रसकर्म हैं । इसका विस्तृत वर्णन गोविन्दभगवत्पादाचार्यप्रभृति प्राचीनआचार्योंने किया है ॥ ७ ॥ न च रसशास्त्रं धातुवादार्थमेवेति मन्तव्यं देहवन्धद्वारा मुक्तेरेव परमप्रयोजनत्वात् । तदुक्तं रसार्णवे-लोहबंधस्त्वया देव यद्वत्त- परमीशित । त्वं देहवेधमाचक्ष्व येन स्यात् खेचरी गति ॥ यथा लोहे तथा देहे कर्त्तव्य सूतक सता ॥ समानं कुरुते देवि प्रत्ययं देहलोहयो । पूर्वं लोहे परीक्षेत पश्चाद् देहे प्रयोजयेत्॥" इति ॥ ८ ॥ यह न समझना कि आचार्योंने रसायनशास्त्र केवल धातुपुष्टि प्रतिपाद कही है, किन्तु देहरक्षाद्वारा मुक्तिहीका परम प्रयोजक है । हे देव आपने लोहबन्ध तो दिया अब जिसमे आकाशमार्गमे गमन हो वह देहबन्ध बताइये देह और लोहमें समान