सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १८१) ननु हरगौरीसृष्टिसिद्धौ पिण्डस्थैर्यमास्थातुं पार्यते तत्सि- द्धिरेव कथमिति चेन्न अष्टादशसंस्कारवशात्तदुपपत्ते । तदुक्त माचार्यै --"तस्य हि साधनविधौ सुधियां प्रति कर्म निर्मला- प्रथमम् । अष्टादश संस्कारा विज्ञातव्याः प्रयत्नेन ॥ " इति । ते च संस्कारा निरूपिता " स्वेदनमर्द्दनमूर्च्छनस्थापन- पातननिरोधनियमाश्च । दीपनगमनग्रासप्रमाणमथ जारणा- पिधानम् ॥ गर्भद्रुतिबाह्यद्रुतिक्रारणसरागसारणाश्चैव । क्राम- णवेधौभक्षणमष्टादशेति रसकर्म ॥ " इति । तत्प्रपञ्चस्तु गोविन्दभगवत्पादाचार्यसर्वज्ञरामेश्वरभट्टारकप्रभृतिभिः प्राची- नैराचार्यैर्निरूपित इति ग्रन्थभूयस्त्वभयादुदास्यते ॥ ७ ॥ हरगौरीसृष्टि सिद्ध होगी तो शरीरभी स्थिर होगा परन्तु सिद्धि कैसे होती है सो कहते हैं । अष्टादश संस्कारसे सिद्धि होती है उसके साधनविधिमें प्रथम १८ उत्तम संस्कार बुद्धिमानोको जान लेने चाहिये । संस्कार-स्वेदन, मूर्च्छन, स्थापन, पातन, निरोधन, नियम, दीपन, गमन, ग्रासप्रमाण, जारण, पिधान, गर्भद्रुति, बाह्यद्रुति, क्षारण, सराग, सारण, क्रामण, वेध, और भक्षण ये अष्टादश रसकर्म हैं । इसका विस्तृत वर्णन गोविन्दभगवत्पादाचार्यप्रभृति प्राचीनआचार्योंने किया है ॥ ७ ॥ न च रसशास्त्रं धातुवादार्थमेवेति मन्तव्यं देहवन्धद्वारा मुक्तेरेव परमप्रयोजनत्वात् । तदुक्तं रसार्णवे-लोहबंधस्त्वया देव यद्वत्त- परमीशित । त्वं देहवेधमाचक्ष्व येन स्यात् खेचरी गति ॥ यथा लोहे तथा देहे कर्त्तव्य सूतक सता ॥ समानं कुरुते देवि प्रत्ययं देहलोहयो । पूर्वं लोहे परीक्षेत पश्चाद् देहे प्रयोजयेत्॥" इति ॥ ८ ॥ यह न समझना कि आचार्योंने रसायनशास्त्र केवल धातुपुष्टि प्रतिपाद कही है, किन्तु देहरक्षाद्वारा मुक्तिहीका परम प्रयोजक है । हे देव आपने लोहबन्ध तो दिया अब जिसमे आकाशमार्गमे गमन हो वह देहबन्ध बताइये देह और लोहमें समान
( १८२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रसेश्वर- सूतक करना चाहिये । हे देवि लोहे और देहमें समान विश्वास कर प्रथम लोहेमें परीक्षा कर पश्चात् देहमें प्रयोग करे ॥ ८ ॥ ननु सच्चिदानन्दात्मकपरतत्त्वस्फुरणादेव मुक्तिसिद्धौ किमनेन दिव्यदेहसम्पादनप्रयासेनेति चेत्तदेतदवातं वार्त्तशरीरालाभे तद्वार्त्ताया अयोगात् । तदुक्तं रसहृदये—“गलितानल्पविकल्पः सर्व्वाध्वविवक्षितश्चिदानन्द । स्फुरितोऽप्यस्फुरिततनोः करोति किं जन्तुवर्गस्य॥ इति। “ यं जरया जर्जरितं काशश्वा- सादिदु खविशदञ्च । योग्यं तं न समाधौ प्रतिहतबुद्धीन्द्रिय- प्रसरम् ॥ बाल षोडशवर्षो विषयरसास्वादलम्पट परत । यातविवेको वृद्धो मर्त्य कथमप्नुयान्मुक्तिम् ॥” इति च ॥ ९ ॥ सच्चिदानन्द आत्मतत्त्व प्रकाशसे ही मुक्ति हो जायगी दिव्यदेहप्राप्तिसे क्या प्रयोजन है ऐसा नहीं कह सकते क्योकि वार्त्तशरीर ( दिव्यशरीर ) न होनेसे मुक्ति की वार्त्ताभी असम्भव है । रसहृदयमे कहा है सम्पूर्ण विकल्प जालसे रहित हो ओर सर्व तीर्थंकरोका अभिमत चिदानन्द आत्मतत्त्व प्रकाशित होनेपरभी अप्रकाशित शरीरका क्या कर सकता है अर्थात् कुछभी नहीं कर सकता जो जरावस्थासे जर्ज- रित हो खाँसी श्वास आदि दु खसे पीडित हो बुद्धि और इन्द्रियोंके व्यापारसे कुण्ठित हो वह समाधिके योग्य नहीं हे, बालक, सोलह वर्षका युवा, विषयभोगमें लम्पट ओर अप्राप्तविवेक वृद्ध मनुष्य किस प्रकार मुक्ति पासक्ते हैं ॥ ९ ॥ ननु जीवत्वं नाम संसारित्वं तद्विपरीतत्वं मुक्तत्वं तथा च पर- स्परविरुद्धयो कथमेकायतनत्वमुपपन्नं स्यादिति चेत्तदनुपपन्नं विकल्पाानुपपत्ते । मुक्तिस्तावत् सर्वतीर्थंकरसम्मता । सा किं ज्ञेयपदे निविशते न वा चरमे शशविषाणकल्पा स्यात् । प्रथमे न जीवनं वर्जनीयमजीवतो ज्ञातृत्वानुपपत्तेः । तदुक्तं रसे- श्वरसिद्धान्ते-“रसाङ्गम्येमार्गोक्तो जिवमोक्षोऽस्त्यधोमना । प्रमाणान्तरवादेषु युक्तिभेदावलम्बिषु ॥ ज्ञानज्ञेयमिदं विद्धि सर्वतन्त्रेषु सम्मतम् । न जीवन् ज्ञास्यति ज्ञेयं यदतोऽस्त्येन जनिनम् ॥” इति ॥ १० ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १८३ ) यदि कहो जीवित संसारी होता है संसाररहित मुक्त कहा जाता है तब परस्पर विरुद्ध जीवत्व मुक्तत्व एकमें कैसे रहेगा ? यह ठीक नही है मुक्ति सब दर्शनकारोको अभिमत है वह मुक्ति ज्ञानका विषय है या नही ? यदि न हो तो खरगोशके सींगके समान तुच्छ होगी । ज्ञानका विषय मानो तो जीवनके विना ज्ञातृत्व असम्भव होनेसे जीवन्मुक्तिभी सिद्ध होगी यह रसेश्वरसिद्धान्तमे प्रसिद्ध है रसाङ्गसिद्धान्तमें प्रति- पादित जीवन्मोक्षसे भिन्न २ मुक्ति और प्रमाणान्तरवादी विमुख रहते हैं परन्तु मुक्ति- को सब सिद्धान्तवादियोंके ज्ञानका विषय कहा है जीवनके विना ज्ञान नहीं हो सकता और ज्ञानके विना ज्ञेयभी नही हो सकता है अत जीवन्मोक्ष अवश्य मानना होगा ॥ १० ॥ न चेदमदृष्टचरमिति मन्तव्यं विष्णुस्वामिमतानुसारिभिः नृपञ्चास्यशरीरस्य नित्यत्वोपपादनात । तदुक्तं साकारसिद्धौ- “सच्चिन्नित्यनिजाचिन्त्यपूर्णानन्दैकविग्रहम् ॥ नृपञ्चास्यमहं वन्दे श्रीविष्णुस्वामिसम्मतम् ॥” इति ॥ ११ ॥ यह किसी सिद्धान्तमें नहीं देखा गया है ऐसा नही कह सकते क्योकि विष्णुस्वा- मिमतानुयायियोंने नृसिंहशरीरको नित्य माना है और साकारसिद्धिमे कहा है कि सत् चित् नित्य स्वकीय अचिन्त्य परिपूर्ण ज्ञान और आनन्दस्वरूप श्रीविष्णुस्वा- मीके सम्मत नरसिंहका मैं वन्दना करता हू ॥ ११ ॥ नन्वेतत् सावयवं रूपवदवभासमानं नृकण्ठीरवाङ्गं सदिति न सङ्गच्छत इत्यादिनाक्षेपपुरःसरं सनकादिप्रत्यक्षं सहस्रशीर्षा पुरुष इत्यादि श्रुति , तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शंख- गदार्युदायुधम् इत्यादिपुराणलक्षणेन प्रमाणत्रयेणसिद्धं नृपञ्चा- ननाङ्गं कथमसत् स्यादिति । सदादीनि विशेषणानि गर्भश्री- कान्तामिश्रै विष्णुस्वामिचरणपरिणतान्त करणे प्रतिपादि- तानि । तस्मादस्मदिष्टदेहनित्यत्वमत्यन्तादृष्टं न भवतीति पुरुषार्थकामुकै पुरुषैरैष्टव्यम् ॥ १२ ॥ रूपवान्के समान प्रतीयमान सावयव नृसिंह शरीर सत्य नहीं हो सकता इत्यादि आक्षेपोंका समाधानभी सनकादिकोंके प्रत्यक्ष, सहस्र शीर्षेति श्रुति ( अनेक
( १८४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रसेश्वर- शिर, पाद, नेत्र, अनेक पाठवान् पुरुष ) पुरुषसूक्त, तथा विकसित कमलके समान जिनके नेत्र चार भुजासे युक्त शंख, चक्र, गदादि आयुधोंको धारण किये पीताम्बर कौस्तुभ श्रीवत्सादि भूषणोंसे भूषित अद्भुत बालकको श्रीवसुदेवजी देखते हुए इत्यादि पुराण प्रमाणोंसे सिद्ध नरसिंह शरीर असत् नहीं हो सकता अत' हमारा अभिमत देहनित्यत्व अत्यन्त अदृष्ट न होनेसे मोक्षार्थियोंको रसायनसे शरीर स्थैर्य्यही सम्पादन करना चाहिये ॥ १२ ॥ अतएवोक्तम्-“आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् । श्रेय पर किमप्यन्यच्छरीरमजरामरं विहायैकम्॥” इति । अजरा- मरीकरणसमर्थश्च रसेन्द्र एव । तदाह-“एकोऽसौ रसराज शरीरमजरामरं कुरुते” इति ॥ किं वर्ण्यते रसस्य माहात्म्यं दर्शनस्पर्शनादिनापि महत्फलं भवति । तदुक्तं रसार्णवे- “दर्शनात् स्पर्शनात्तस्य भक्षणात् स्मरणादपि । पूजनाद्रसदा- नाच्च दृश्यते षड्विधं फलम् ॥ १३ ॥ अतएव कहा है कि विद्याका स्थान धर्म अर्थ काम और मोक्षका मूल परमश्रेष्ठ अजर अमर शरीरको छोडकर अन्य श्रेष्ठ क्या हो सकता है अजर और अमरका साधक केवल रसन्द्रही है रसका माहात्म्य कहाँतक वर्णन करें। दर्शन, स्पर्शन, भक्षण, स्मरण, पूजन और रसदानसे षड्विध फल होते हैं ॥ १३ ॥ केदारादीनि लिङ्गानि पृथिव्यां यानि कानिचित् । तानि दृष्ट्वा तु यत्पुण्यं तत्पुण्यं रसदर्शनात् ॥” इत्यादिना॥ अन्यत्रापि- “काश्यादिसर्वलिङ्गेभ्यो रसलिङ्गार्चनं शिवम् । प्राप्यते येन तल्लिङ्गं भोगारोग्यामृतामरम् ॥ ” इति ॥ १४ ॥ पृथिवीमें केदारनाथ और विश्वनाथ प्रभृति जो शिवलिङ्ग हैं उनके दर्शनसे जो पुण्य होता है वह रसके दर्शनसे हो जाता है । काशीविश्वनाथादि शिवलिङ्गके अर्चनकी अपेक्षा रसलिङ्गका अर्चन बहुत श्रेष्ठ है। क्योंकि रसलिङ्गसे भोग आरोग्य और अमृत ( मोक्ष ) तीनों प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥ रसनिन्दायां प्रत्यवायोऽपि दर्शित । “ प्रमादाद्रसनिन्दायां श्रुतायेन स्मरेत् सुधी । द्राक् त्यजेन्निन्दकं नित्यं निन्द्या
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत.। ( १८५) पूरितोशुभम् ॥" इति । तस्मादस्मदुक्तया रीत्या दिव्यं देहं सम्पाद्य योगाभ्यासवशात् परतत्त्वे दृष्टे पुरुषार्थप्राप्तिर्भा- वति । तदा- "भ्रुयुगमध्यगतं यत् शिखिविद्युत्सूर्य्यवज्जग- द्भासि । केषाञ्चित् पुण्यदृशामुन्मीलति चिन्मयं ज्योति. ॥ १५॥ रसकी निन्दा करनेका प्रायश्चित्त कहते हैं प्रमादवश रसकी निन्दा सुने तो रसका सम्यक् प्रकार ध्यान करे और निन्दकको त्याग दे क्योंकि निन्दायुक्त अशुभ होता है । अतः हमारे कथनानुसार दिव्य शरीर प्राप्त कर योगाभ्यासद्वारा साक्षात्कार करनेसे मुक्त होते हैं पुण्यशालियोंको पुण्यवश भृकुटीके मध्यमें प्राप्त अग्नि बिजली और सूर्यके समान जगत्को प्रकाश करनेवाली चिन्मयज्योति विकसित होती है ॥ १५ ॥ परमानन्दैकरसं परं ज्योतिः स्वभावमविकल्पम् । विगलित- सकलक्लेशज्ञेयं शान्तं स्वसंवेद्यम् ॥ तस्मिन्नाधाय मन स्फुर- दसिलं चिन्मयं जगत् पश्यन् । उत्सन्नकर्मबन्धो ब्रह्मत्वमि- हैव चाप्नोति ॥" इति । श्रुतिश्च- 'रसो वै स रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' ॥ इति ॥ १६ ॥ परमानन्दैकरस परमज्योति समस्त विकल्प और समस्त क्लेशोंसे रहित स्वसंवेद्य रसतत्त्वमें ध्यानादि द्वारा चित्त लगाकर जगत्को प्रकाशमान चिन्मय देखनेवाले कर्म्मबन्धनसे रहित होकर इस संसारमेंही ब्रह्मरूप होते हैं । रस ( आस्वादन करने योग्य ) ईश्वर है रस प्राप्तिसे पुरुष आनन्दवान् होता है ॥ १६ ॥ तदित्थं भवेदन्दुःखभरतरणोपायो रस एवेति सिद्धम् । तथा च रसस्य परब्रह्मणा साम्यमिति प्रतिपादकः श्लोक । "यः स्यात् प्रावरणाविमोचनधियां साध्य प्रकृत्या पुन सम्पन्नो सहते न दीव्यति परं वैश्वानरे जाग्रति । जातो यद्यपरं न वेद- यति च स्वस्मात् स्वयं द्योतते यो ब्रह्मैव स दैन्यसंसृतिभयात् पायादसौ पारद ॥" इति ॥ १७ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे रसेश्वरदर्शनं समाप्तम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार अन्यके दुःखभारके नाश करनेम समर्थ रसही है यह सिद्ध हुआ । यह पारद संसारबन्धनसे मुक्ति चाहनेवालोंको स्वभावसे साधनीय है जिस प्रकार
९. वैशेषिक व न्याय दर्शन (औलूक्य-अक्षपाद मत)
( १८६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ औलूक्य- प्रचण्ड वैश्वानरके सामने अन्यवस्तुका प्रकाश नहीं होता है उसी प्रकार सिद्ध ( शोधित ) पारदके सन्मुख अन्य सब रसायन निस्तेज हो जाती हैं। जिस पारदसे अभिनव शरीर प्राप्त पुरुष दूसरेको नहीं जानता है और स्वयं प्रकाशमान रहता है ओर जो पारद साक्षात् ब्रह्म है वह पारद संसार भयसे रक्षा करे ॥ १७ ॥ सर्वदर्शनसंग्रहान्तर्गत रसेश्वरदर्शन समाप्त ॥ अथौलूक्यदर्शनम् ॥ १० ॥ इह खलु निखिलप्रज्ञावन्निसर्गप्रतिकूलवेदनीयतया निखिला- त्मसंवेदनसिद्धं दुःखं जिहासुस्तद्धानोपायं जिज्ञासुः परमेश्वर- साक्षात्कारमुपायमाकलयति । “ यदा चर्मवदाकाशं वेष्टय- न्तीह मानवाः । तदा शिवमविज्ञाय दुःखान्तो न भविष्यति ॥” इत्यादिवचननिचयप्रामाण्यात् ॥ १ ॥ संसारमें समस्त विवेकियोँको प्रतिकुलरूपसे प्रसिद्ध दुःखको त्यागनेकी इच्छासे दुःखनाशका उपाय ईश्वर साक्षात्कार कहते हैं । जिस प्रकार चर्मवत् आकाशका वेष्टन असम्भव है उसी प्रकार ईश्वरज्ञानके बिना दुःखनिवृत्ति असम्भव है इत्यादि वचन उसमें प्रमाण है ॥ १ ॥ परमेश्वरसाक्षात्कारश्च श्रवणमननभावनाभिर्भावनीयः । यदा- ह-“ आगमेनानुमानेन ध्यानाभ्यासबलेन च । त्रिधा प्रकल्प- यन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् ॥ ” इति ॥ २ ॥ ईश्वरसाक्षात्कार श्रवण मनन निदिध्यासनसे होता है । कहा है आगम, अनुमान और ध्यानाभ्यास इन तीनो प्रकारोंसे प्रज्ञाको स्थिर करनेपर उत्तम योग प्राप्त होता है ॥ २ ॥ तत्र मननमनुमानाधीनम्, अनुमानञ्च व्याप्तिज्ञानाधीनम्,व्याप्ति- ज्ञानञ्च पदार्थविवेकसापेक्षम्-अतः पदार्थषट्कम् । ‘अथातो धर्मं व्याख्यास्याम’ इत्यादिकायां दशलक्षण्यां कणभक्षेण भगवता व्यवस्थापि । तत्राह्निकद्वयात्मके प्रथमेऽध्याये समवे- ताशेषपदार्थकथनमकारि । तत्रापि प्रथमाह्निके जातिमन्निरूप-
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १८७ ) णम्,द्वितीयाह्निके जातिविशिष्टयोर्निरूपणम्, आह्निकद्वययुक्त द्वितीयेऽध्याये द्रव्यनिरूपणम् । तत्रापि प्रथमाह्निके भूतवि- शेषणलक्षणम्, द्वितीये दिक्कालप्रतिपादनम् । आह्निकद्वययुक्ते तृतीये आत्मान्त•करणलक्षणम् । तत्राप्यात्मलक्षणं प्रथमे, द्वितीये अन्तःकरणलक्षणम् । आह्निकद्वययुक्ते चतुर्थे शरीरत- दुपयोगिविवेचनम् । तत्रापि प्रथमे तदुपयोगिविवेचनं, द्वितीये शरीरविवेचनम् । आह्निकद्वयवति पञ्चमे कर्मप्रतिपादनम् । तत्रापि प्रथमे शरीरसम्बन्धिकर्मचिन्तनम्, द्वितीये मानसकर्म- चिन्तनम् । आह्निकद्वयशालिनि षष्ठे श्रौतधर्मनिरूपणम् । तत्रापि प्रथमे दानप्रतिग्रहधर्मविवेक , द्वितीये चातुराश्रम्यो- चितधर्मनिरूपणम् । तथाविधे सप्तमे गुणसमवायप्रतिपादनम् । तत्रापि प्रथमे बुद्धिनिरपेक्षगुणप्रतिपादनं, द्वितीये तत्सापेक्षगु- णप्रतिपादनं, समवायप्रतिपादनञ्च । अष्टमे निर्विकल्पकस- विकल्पकप्रत्यक्षप्रमाणचिन्तनम् । नवमे बुद्धिविशेषप्रतिपाद- नम् । दशमे अनुमानभेदप्रतिपादनम् ॥ ३ ॥ श्रुतअर्थका स्थिरत्वप्रयोजक मनन अनुमानके आधीन है अनुमान व्याप्ति- ज्ञानके आधीन हे व्याप्ति ज्ञानपदार्थज्ञानके आधीन हे इसलिये ' अथातो धर्म व्याख्यास्याम ' इत्यादि दश अध्यायात्मक ग्रन्थमें भगवान् कणादने छ पदा- र्थोंका व्यवस्थापन किया है प्रथमाध्यायके प्रथमाह्निकमे जातिमात्रका निरूपण, द्वितीयाह्निकमें जातिविशिष्टका, आह्निक द्वयात्मक द्वितीयाध्यायमें द्रव्यका निरूपण, उसमेंभी प्रथम आह्निकमें भूतविशेष पृथिव्यादि पाञ्चका लक्षण, द्वितीयमें दिक् कालका प्रतिपादन, तृतीयाध्यायके प्रथम आह्निकम आत्माका लक्षण, द्वितीयमें अन्त करणका लक्षण, एवम् आह्निकद्वयात्मक चतुर्थाध्यायके प्रथमाह्निकम शरीरो- पयोगीका विचार, द्वितीयमें शरीर निरूपण, एव पञ्चमाध्यायके प्रथम आह्निकमें शरीर सम्बन्धी कर्मके विचार द्वितीयम मानसकर्मका विचार, षष्ठाध्याय प्रथमाह्निकमे दानप्रतिग्रह ओर धर्मका विचार, द्वितीयमें ब्रह्मचर्यादि आश्रम धर्मका विचार सप्तमाध्याय प्रथमाह्निकमें बुद्धि निरपेक्ष गुणोंका प्रतिपादन, द्वितीयम बुद्धिमापेक्ष गुण, तथा समवायका प्रतिपादन, अष्टमाध्यायमें निर्विकल्पक और सविकल्पक
( १८८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ औलूक्य- प्रत्यक्ष प्रतिपादन, नवमाध्यायमें बुद्धिविशेष प्रतिपादन और दशम अध्यायमें अनुमानभेदका प्रतिपादन है ॥ ३ ॥ तत्र उद्देशो लक्षणं परीक्षा चेति त्रिविधास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः । ननु विभागापेक्षया चातुर्विध्ये वक्तव्ये कथं त्रैविध्यमुक्तमिति चेन्मैव मस्या विभागरय विशेषोद्देश एवान्तर्भावात् । तत्र द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवाया भावा इति षडेव ते पदार्था इत्युद्देश ॥किमत्र क्रमनियमे कारणम्। उच्यते समस्तपदार्था- यतनत्वेन प्रधानस्य द्रव्यस्य प्रथममुद्देश । अनन्तरं गुणत्वो- पाधिना सकलद्रव्यवृत्तेर्गुणस्य तदनु सामान्यवत्त्वसाम्यात् कर्मण पश्चात्तत्रितयाश्रितस्य सामान्यस्य तदनन्तरं समवा- याधिकरणस्य विशेषस्य अन्ते अवशिष्टस्य समवायस्येति क्रम- नियम ॥ ४ ॥ उद्देश, लक्षण, परीक्षा रूप प्रकारत्रयसे शास्त्रकी प्रवृत्ति हे यद्यपि विभाग मिलाकर चार प्रकार कहना उचित था तथापि सामान्य धर्मका व्याप्य परस्पर विरुद्ध धर्मकथनरूप विभाग उद्देशहीमे अन्तर्भूत होनेसे पृथक् नहीं कहा केवल वस्तुका नाम मात्र कथा करना उद्देश है । यथा द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवायरूप छ भावरूप पदार्थ हैं । उक्त क्रमसे पाठमें नियमभी यह हे कि, गुणादि समस्त पदार्थोंका आश्रय होनेसे प्रथम द्रव्यका उपादान है । अनन्तर गुणत्वरूप उपाधि सम्पूर्ण द्रव्यवृत्ति होनेसे गुणका उपादान है । पश्चात् सामान्यवत्त्व साधर्म्य होनेसे कर्मका उपादान है अनन्तर तीनोंम रहनेवाले सामान्यका उपादान है अनन्तर ममवायका आश्रयविशेषका उपादान है और अन्तमें समवायका उपादान है ॥ ४ ॥ ननु षडेव पदार्था इति कथं कथ्यते अभावस्यापि सद्भावा- दिति चेन्मैवं वोच , नञर्थानुलिखितधीविषयतया भावरूपतया षडेवेति विवक्षितत्वात् । तथापि कथं षडेवेति नियम उपप- द्यते विकल्पानुपपत्ते । तथाहि नियमव्यवच्छेद्यं प्रमितं न वा प्रमितत्वे कथं निषेध. अप्रमितत्वे कथन्तरां, न हि कश्चित्
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( १८९ ) प्रेक्षावान् मूषिकविषाणं प्रतिषेद्धुं यतते । ततश्चानुपपत्तेर्नो नियम इति चेन्मैवं मंस्थाः सप्तमतया प्रमिते अन्धकारादौ भावत्वस्य भावतया प्रमिते शाक्तसख्यादौ सप्तमत्वस्य च निषेधादिति कृतं विस्तरेण ॥ ५ ॥ यद्यपि अभावको लेकर सात पदार्थ होनेसे छःका कथन अयुक्त है तथापि नञर्थ रहित भावरूप पदार्थ छ ही हैं ऐसे अभिप्रेत होनेसे अनुपपत्ति नही होगी अस्तु तथापि छःही है ऐसा नियम नहीं हो सकता क्योकि नियमसे व्यावर्तनीय ( हटाने योग्य ) सप्तम अष्टमादि पदार्थ प्रसिद्ध है या अप्रसिद्ध है ? प्रसिद्ध है तो निषेध नहीं हो सकता । यदि अप्रसिद्ध मानो तो सुतरां निषेध व्यर्थ है । कोई बुद्धिमान् मूषिकशृङ्गका निषेध नही करते अप्रसिद्ध प्रतियोगिक अभावभी नहीं मानते एवञ्च उभयतः पाशारज्जु न्यायवत् नियम अनुपपन्न है तथापि सप्तमत्वेन प्रसिद्ध अन्ध- कारमें भावत्व एवं भावत्वेन प्रसिद्ध शक्तिसादृश्यादिमें सप्तमत्वके व्यावर्तनार्थ नियम चरितार्थ होता है ॥ ५ ॥ तत्र द्रव्यादित्रितयस्य द्रव्यत्वादिजातिलक्षणम् । द्रव्यत्वं नाम गगनसमवेतत्वे सत्यरविन्दसमवेतत्वे सति नित्यत्वे सति गन्धासमवेतत्वम् । गुणत्वं नाम समवायिकारणासमवायिका- रणभिन्नसमवेतसत्तासाक्षाद्व्याप्यजाति । कर्मत्व नाम नित्य- समवेतत्वसहितसत्तासाक्षाद्व्याप्यजाति । सामान्यं तु प्रध्वंस- प्रतियोगित्वरहितमनेकसमवेतम् । विशेषो नामान्योऽन्याभाव- विरोधिसामान्यरहितः समवेत । समवायस्तु समवायरहित- सम्बन्ध इति षण्णां लक्षणानि व्यवस्थितानि ॥ ६ ॥ द्रव्य, गुण, कर्मका लक्षण द्रव्यत्वादि जातिमत्त्व है आकाशमें समवेत हो अरविन्दमे समवेत हो नित्य हो और गन्धमें आवृत्ति हो वही द्रव्यत्व है समवायिकारण अस- मवायि कारणसे भिन्न जो ज्ञानेच्छादि उसमे समवेन सत्ताका साक्षात् व्याप्य जाति- मत्त्व गुणत्वका लक्षण है । कर्मत्वका लक्षण नित्य समवेतत्वसहित सत्ताका साक्षात् व्याप्यजातित्व है । सामान्यका लक्षण ध्वसके अप्रतियोगी अनेक वस्तुओंमें समवाय सम्बन्धसे वर्तमान है । अन्योन्याभावविरोधी सामान्यसे शून्य समवेत विशेष पदार्थ है समवायरहित सम्बन्धविशेष समवाय हे ॥ ६ ॥
( १९० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ औलूक्य- द्रव्यं नवविधम्-पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसीति। तत्र पृथिव्यादिचतुष्टयस्य पृथिवीत्वादिजातिर्लक्षणम् । पृथि- वीत्वं नाम पाकजरूपसामानाधिकरण्यद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्य- जातिः । अप्त्वं नाम सरित्सागरसमवेतत्वे सति सलिलसमवेत- सामान्यम् । तेजस्त्वं नाम चन्द्रचामीकरसमवेतत्वे सति ज्वलन- समवेतं सामान्यम् । वायुत्वं नाम त्वगिन्द्रियसमवेतद्रव्यत्वसा- क्षाद्व्याप्यजातिः । आकाशकालदिशामेकत्वादपरजात्यभावे पारिभाषिक्यस्तिस्रः संज्ञा भवन्ति, आकाशः कालो दिगिति । संयोगाजन्यजन्यविशेषगुणसमानाधिकरणविशेषाधिकरणमा- काशम् । विभुत्वे सति दिगसमवेतपरत्वासमवायिकारणाधि- करणं कालः । अकालत्वे सत्यविशेषगुणा महती दिक् । आत्ममनसोरात्मत्वमनस्त्वे । आत्मत्वं नाम अमूर्त्तसमवेत- द्रव्यत्वापरजातिः । मनस्त्वं नाम द्रव्यसमवायिकारणत्वरहि- ताणुसमवेतद्रव्यत्वापरजातिः ॥ ७ ॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, और मन यह नौ द्रव्य हैं। पृथिवीत्वजातिमत्त्व पृथिवीका लक्षण और जलत्वजातिमत्त्व जलका, तेजस्त्व जातिमत्त्व तेजका, वायुत्वजातिमत्त्व वायुका लक्षण है। पाकजरूप अर्थात् विजातीय तेजके संयोगसे जायमान रूप जिसमें हो उसमें रहनेवाली द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य जातित्व पृथिवीत्व है साक्षात् व्याप्य उसको कहते हैं जो स्वव्याप्यका व्याप्य न हो यथा घटत्व द्रव्यत्वका साक्षात् व्याप्य नहीं है कारण द्रव्यत्वका व्याप्य पृथिवीत्व का व्याप्य होगया पृथिवीत्वादि साक्षाद्व्याप्य है जलम समवेत जोग जलमे भिन्नमें असमवेतसामान्य जलत्व है । चन्द्रमरकतादिसमवेतत्वविशिष्ट वह्निसमवेतसामान्य तेजस्त्व जाति है। त्वगिन्द्रियमें समवेतद्रव्यत्व साक्षात् व्याप्यजाति वायुत्व है आकाश काल दिक् एक एक व्यक्ति होनेसे एक मात्र व्यक्तिसमवेतमें जातित्व न होनेके कारण द्रव्यत्व छोडकर उसमें अन्यजाति नहीं रहती है संयोगसे अजन्यविशेष गुण ( शब्द ) का आश्रय आकाश है । विभुत्वसमानाधिकरणपरत्वका असमवायिकारण परोपरोंका अधिकरण काल है । रागभिन्नत्व समानाधिकरणविशेष गुण शून्यत्ववि शिष्ट विभुत्ववान् दिक् है। आत्मा और मनका आत्मत्व जातिमत्त्व और मनस्त्वजा-
- दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १९१ ) तिमत्त्व लक्षण है । मूर्त्तिभिन्न द्रव्यसमवेत जाति आत्मत्व है । मनस्त्व द्रव्यसमवायि- कारणत्वसे भिन्न अणुसमवेतद्रव्यत्व व्याप्य जाति है ॥ ७ ॥ रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापर- त्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च कण्ठोक्ताः सप्तदश चशब्दस- मुच्चिताः गुरुत्वद्रवत्वस्नेहसंस्कारादृष्टशब्दाः सप्तैवेत्येवं चतु- र्विंशतिर्गुणा । तत्र रूपादि शब्दान्तानां रूपत्वादिजातिर्लक्ष- णम् । रूपत्वं नाम नीलसमवेतगुणत्वापरजातिः । अनया दिशा शिष्टानां लक्षणानि द्रष्टव्यानि ॥ कर्म पञ्चविधम्-उत्क्षेपणाकु- ञ्चनप्रसारणगमनभेदात् । भ्रमणरेचनादीनां गमन एवान्त- र्भावः । उत्क्षेपणादीनामुत्क्षेपणत्वादिजातिर्लक्षणम् । तत्र उत्क्षेपणत्वं नाम ऊर्ध्वदेशसंयोगासमवायिकारणप्रमेयसमवेत- कर्मत्वापरजाति । एवमवक्षेपणादीनां लक्षणं कर्त्तव्यम् ॥ ८ ॥ रूपादि १७ गुण सूत्रमें कण्ठतः पठित हैं सूत्रस्य चशब्दसे गुरुत्वादिसात गुणका संग्रह है सब मिलकर २४ गुण हैं । पूर्वोक्त प्रकार रूपत्वादि जातिमत्त्व इनका लक्षण है। नीलवर्णमें समवायसम्बन्धसे विद्यमान गुणत्व साक्षात् व्याप्यजाति है इस प्रकार अन्यका भी लक्षण समझलेना। उत्क्षेपणादि भेदोंसे कर्म पाच प्रकार हैं भ्रमण, रेचन, स्यन्दन, ऊर्ध्वज्वलन और तिर्यग्गमन, यह पाँचों गमनहीमें अन्तर्भूत हैं उत्क्षेपणत्व ऊर्ध्वदेश संयोगका असमवायिकारण वस्तुसमवेत कर्मत्व व्याप्यजाति है इसी प्रकार अपक्षेपणादिका भी लक्षण है ॥ ८ ॥ सामान्यं द्विविधं परमपरञ्च । परं सत्ता द्रव्यगुणसमवेता गुण- कर्मसमवेता वा, अपरं द्रव्यत्वादि तल्लक्षणं प्रागेवोक्तम् । विशे- षाणामनन्तत्वात् समवायस्य चैकत्वाद्विभागो न सम्भवति । तल्लक्षणञ्च प्रागेवावादि ॥ ९ ॥ परत्व अपरत्व भेदसे सामान्य दो प्रकार है । द्रव्य गुण कर्मसमवेत सत्ता जाति पर सामान्य अपर पूर्वोक्त द्रव्यत्वादि है विशेषण अनन्तरूप और समवाय एक होनेसे उसका विभाग असम्भव है ॥ ९ ॥ “द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे । यस्य न स्ख- लिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥” इति आभाणकस्य
( १९२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ औलूक्य- सद्भावात् द्वित्वाद्युत्पत्तिप्रकार प्रदर्श्यते । तत्र प्रथममिन्द्रि- यार्थसन्निकर्षस्तस्मादेकत्वसामान्यज्ञानं, ततोऽपेक्षाबुद्धिः, ततो द्वित्वोत्पत्तिस्ततो द्वित्वसामान्यज्ञानं तस्माद्वित्वगुण- ज्ञानं तत संस्कारः ॥ १० ॥ द्वित्वसंख्याकी किस प्रकार उत्पत्ति है पाकजरूपादिकी उत्पत्ति एव विभाग विभागज विभाग कैसे होते हैं, इत्यादि जाननेमें जिसकी बुद्धि कुण्ठित न हो उस- को वैशेषिक कहते हैं इत्याद लोकोक्ति है । अतः द्वित्वादिकी उत्पत्तिका क्रम कहते हैं प्रथम इन्द्रियका अर्थके साथ सम्बन्ध अनन्तर एकत्वज्ञान ( अयमेकः अयमपि एक इति ) अनन्तर अपेक्षाबुद्धि ( एतदेकत्वविशिष्टोऽयमेक. ) अनन्तर द्वित्वकी उत्पत्ति ( इमौ द्वौ ) अनन्तर द्वित्वत्वसामान्य ज्ञान पश्चात् द्वित्वगुणज्ञान और तदनन्तर सस्कार कहा है ॥ १० ॥ तदाह-“आदाविन्द्रियसन्निकर्षघटनादेकत्वसामान्यधीरेकत्वो- भयगोचरा मतिरतोद्वित्व ततो जायते । द्वित्वत्वप्रमितिस्त- तोऽनुपरतो द्वित्वप्रमानन्तरं द्वे द्रव्ये इति धीरियं निगदिता द्वित्वोदयप्रक्रिया ॥” इति ॥ ११ ॥ प्रथम इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष होनेसे एकत्वसामान्यका ज्ञान होता है अनन्तर एकत्व दोनोंमें है ऐसा ज्ञान होता है अनन्तर द्वित्वकी उत्पत्ति तदुत्तर द्वित्वत्वका ज्ञान अनन्तर द्वित्वगुणज्ञान तदुत्तर दो द्रव्य हैं ऐसा बुद्धि होती है यही द्वित्वोत्पत्ति- प्रक्रिया है ॥ ११ ॥ द्वित्वादेरपेक्षाबुद्धिजन्त्यत्वे किं प्रमाणम् । अत्राहुराचार्याः- अपेक्षाबुद्धिर्द्वित्वादेरुत्पादिका भवितुमर्हति व्यञ्जकत्वानुप- पत्ते । तेनानुविधीयमानत्वात् शब्दं प्रति संयोगादिति ॥ वयं तु ब्रूमः द्वित्वादिकमेकत्वद्वयविषयानित्यबुद्धिव्यङ्ग्यं न भवति अनेकाश्रितगुणत्वात् पृथक्त्वादिवदिति ॥ १२ ॥ द्वित्वादिकी अपेक्षा बुद्धिजन्मत्वमें युक्तिभी उदयनाचार्यने कही है-कारण उत्पा- दक व्यञ्जक भेदसे दो प्रकार हैं । द्वित्वादिके प्रति अपेक्षा बुद्धि व्यञ्जक नहीं हो सकती अतः उत्पादिका है यथा दण्डभेरीके संयोगानन्तर उत्पन्नशब्दके प्रति
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । (१९३) संयोगकारण हे एवम् अपेक्षा बुद्धिके अनन्तर उत्पन्न द्वित्वके उक्त प्रति अपेक्षाबुद्धि उत्पादिका है मैं कहता हू द्वित्वादि एकत्वद्वय (एक एक) विषय अनित्यबुद्धि व्यङ्ग नहीं हो सकती क्योंकि पृथक्त्वादिवत् अनेकमें रहनवालागुण है ॥ १२ ॥ निवृत्तिक्रमो निरूप्यते । अपेक्षाबुद्धित एकत्वसामान्यज्ञानस्य द्वित्वोत्पत्तिसमकालं निवृत्तिः, अपेक्षाबुद्धेर्द्वित्वसामान्यज्ञा- नात् द्वित्वगुणबुद्धिसमसमयं, द्वित्वस्यापेक्षाबुद्धिनिवृत्तेर्द्रव्यबु- द्धिसमकालं, गुणबुद्धेः, द्रव्यबुद्धितः संस्कारोत्पत्तिसमकालं द्रव्यबुद्धेस्तदनन्तरं संस्कारादिति ॥ १३ ॥ निवृत्तिक्रम कहते हैं-अपेक्षाबुद्धिसे द्वित्वोत्पत्तिकालमें एकत्वसामान्यज्ञानकी निवृत्ति होती है । द्वित्वत्वसामान्यज्ञानके अनन्तर द्वित्वगुणसमकालमें द्वित्वोत्पादक अपेक्षाबुद्धिकी निवृत्ति होती है अपेक्षाबुद्धिनाशके अनन्तर द्रव्यगुण समकालमें द्वित्वकी निवृत्ति है द्रव्यबुद्धिसे संस्कारोत्पत्तिकालमें गुणबुद्धिकी निवृत्ति होती है अनन्तर सस्कारसे द्रव्यबुद्धिकी निवृत्ति होती है ॥ १३ ॥ तथा च संग्रहश्लोकाः । "आदावपेक्षाबुद्ध्या हि नश्येदेकत्व- जातिधी । द्वित्वोदयसमं पश्चात् सा च तज्जातिबुद्धितः ॥ द्वित्वाख्यगुणधीकाले ततो द्वित्वं निवर्त्तते । अपेक्षाबुद्धिना- शेन द्रव्यधीजन्मकालत ॥ गुणबुद्धिर्द्रव्यबुद्ध्या संस्कारोत्प- त्तिकालत. ॥ द्रव्यबुद्धिश्च संस्कारादिति नाशक्रमो मतः ॥ "इति ॥ बुद्धेर्बुद्धयन्तरविनाश्यत्वे संस्कारविनाश्य- त्वे च प्रमाणं विवादाध्यासितानि ज्ञानानि उत्तरोत्तरकार्यनि- नाश्यनि क्षणिकविभुविशेषगुणत्वात् शब्दवत् । द्रव्यारम्भ- कसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागजनककर्मसमकालमेकत्वसामान्यचि- न्तया आश्रयनिवृत्तेरेव द्वित्वनिवृत्ति कर्मसमकालमपेक्षाबुद्धि- चिन्तनादुभाभ्यामिति संक्षेपः । अपेक्षाबुद्धिर्नाम विनाशकनि- नाशप्रतियोगिनी बुद्धिरिति वोद्धव्यम् ॥ १४ ॥ इसीका सग्रह श्लोकोंमे किया है प्रथम अपेक्षाबुद्धिमे द्वित्वोत्पत्तिसमकालमें एकत्व बुद्धिका नाश होता है इत्यादि सब पूर्वोक्तही अर्थ है पूर्वपूर्व ज्ञानके उत्तरोत्तर ज्ञान १३
( १९४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ औलूक्य-
और संस्कारमे विनाशमें प्रमाण यह है कि शब्दवत् व्यापकद्रव्यका क्षणिकविशेष गुण होनेसे विवादग्रस्त ज्ञान स्वोत्तर उत्पद्यमान कार्य (गुण) से नष्ट होता है इत्यादि अनुमान है द्रव्यके आरम्भक संयोगके विरोधी विभागोत्पादक कर्म्मके समकालमें एकत्वज्ञानसे आश्रयकी निवृत्ति होती है कर्म समकालमें अपेक्षाबुद्धि- संस्कारसे अपेक्षाबुद्धि और आश्रयबुद्धि दोनोंकी निवृत्ति होती है। विनाशककी विना शक बुद्धि अपेक्षाबुद्धि है। मुक्तावलीमें अनेक एकत्व (अयमेक अयमेक इत्यादि) बुद्धिको अपेक्षाबुद्धि मानी है ॥ १४ ॥ अथ द्व्यणुकनाशमारभ्य कतिभि क्षणै पुनरन्यद्द्व्यणुक- मुत्पद्य रूपादिमद्भवतीति जिज्ञासायामुत्पत्तिप्रकार कथ्यते । नोदनादिक्रमेण द्व्यणुकनाशः१, नष्टे द्व्यणुके परमाणवग्निसं- योगात् श्यामादीनां निवृत्तिः२, निवृत्तेषु श्यामादिषु पुनरन्यस्मा- दग्निसंयोगाद्रक्तादीनामुत्पत्तिः३ उत्पन्नेषु रक्तादिषु अदृष्टवदात्म- संयोगात् परमाणौ द्रव्यारम्भणाय क्रिया, तया पूर्वदेशाद्विभागः५, विभागेन पूर्वदेशसंयोगनिवृत्ति , तस्मिन्निवृत्ते परमाण्वन्तरेण संयोगोत्पत्तिः७, संयुक्ताभ्यां परमाणुभ्यां द्व्यणुकारम्भ , आरब्धे द्व्यणुके कारणगुणादिभ्यः कार्यगुणादीनां रूपादीनामुत्पत्ति- रिति यथाक्रमं नव क्षणा । दशक्षणादिप्रकारान्तरं विस्तरभया- न्नेह प्रतन्यते । इत्थं पीलुपाकप्रक्रिया । पीठपाकप्रक्रिया तु नैया- यिकधीसम्मता ॥ १५ ॥ जब द्व्यणुकनाशसे लेकर कितने क्षणमें द्व्यणुकान्तर उत्पन्न होकर रूपवान् होता है इस जिज्ञासाशान्तिके लिये उत्पत्तिक्रम कहते है-अग्निसंयोगानन्तर क्रिया पूर्वसंयोगनाशक्रमसे द्व्यणुकका नाश होता है १ द्व्यणुक नाश होनेपर अग्निसंयोग वश श्यामरूपकी निवृत्ति होती है २ श्यामतानिवृत्तिके अनन्तर पुन अग्निसंयोगसे रक्तादिरूपोंकी उत्पत्ति होती है ३ रक्तोत्पत्तिके अनन्तर अदृष्टवान् (पुण्यपापयुक्त) आत्म संयोगसे परमाणुमें द्रव्यारम्भक क्रिया होती है ४ उसी क्रियासे पूर्वदेशसे विभाग होता है ५ विभागोत्तर पूर्वसंयोगका नाश होता है ६ अनन्तर परमाण्वन्तरसे संयोग होता है ७ संयुक्तपरमाणुद्वयसे द्व्यणुकका आरम्भ होता है ८ द्व्यणुकोत्पत्तिके अन न्तरकारण (परमाणु) गुणसे कार्यगुणकी उत्पत्ति होती है ९ एव नव क्षण होते हैं
~दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १९५) दशक्षण एकादशक्षणादि क्रम मुक्तावल्यादिग्रन्थोंमें स्पष्ट हैं यही पीलुपाक ( परमाणुपाक ) वादियोंकी प्रक्रिया है। इनके मतमें परमाणुसेही रूपनाशपूर्वक रूपान्तरोत्पत्ति होती है पिठर ( द्व्यणुकादि अवयवी ) पाकवादियोंकी प्रक्रिया नैया- यिकोंके सम्मत है ॥ १५ ॥ विभागजविभागो द्विविधः । कारणमात्रविभागजः कारणाकार- णविभागजश्च । तत्र प्रथमः कथ्यते । कार्य्यव्याप्ते कारणे कर्मोत्पन्नं यदावयवान्तराद्विभागं विधत्ते न तदाकाशादिदेशा- द्विभागं ।यदात्वाकाशादिदेशाद्विभागः न तदावयवान्तरादिति स्थितिनियमः कर्मणो गगनविभागाकर्तृत्वस्य द्रव्यारम्भकसँ- योगविरोधिभागारम्भकत्वेन धूमस्य धूमध्वजसँसर्गेणैव व्यभि- चारानुपलम्भात् ततश्चावयवकर्म अवयवान्तरादेव विभागं करोति नाकाशादिदेशात् तस्माद्विभागाद्द्रव्यारम्भकसंयोगनि- वृत्तिः। तत कारणाभावात् कार्य्याभाव इति न्यायाद्वयविनि- वृत्ति , निवृत्तेऽवयविनि तत्कारणयोरवयवयोर्वर्त्तमानो विभागः कार्य्यविनाशविशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वाऽवयवमपेक्ष्य मक्रियस्यैवावयवस्य कार्य्यसंयुक्तादाकाशदेशाद्विभागमारभते न निष्क्रियस्य कारणाभावात् ॥ १६ ॥ कारणमात्र विभागज और कारणाकारणविभागज भेदसे विभागज विभाग दो प्रकार है उसमें प्रथम इस भाँति है कि कार्यसे व्याप्त कारणमें उत्पन्न कर्म्म जिस समय अवयवसे विभाग उत्पन्न करता है उस समय आकाशदेशसे विभाग नहीं होता जब आकाशदेशसे विभाग होगा तब अवयवान्तरमे न होगा ऐसा स्थितिका नियम है जिस प्रकार धूमका वह्निके साथ व्यभिचार नहीं होता है अर्थात् वह्निके अभावस्थलमें नहीं रहता है इसी प्रकार द्रव्यका आरम्भक संयोगविरोधी विभाग आरम्भक होनेसे गगनादि विभाग कर्तृत्व कर्मका नहीं रहता है। इसलिये अवयवका कर्म अवयवान्तरमे विभागोत्पादन करता है आकाशदेशमें नहीं करता अनन्तर विभागसे द्रव्यके आरम्भकप्रयोगकी निवृत्ति होती है अनन्तर कारण न होनेसे कार्य्यभी नहीं होता है इस न्यायसे अवयवी ( कार्य ) की निवृत्ति होती है अवयवकी
( १९६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ औलूक्य- निवृत्ति होनेसे उसके कारण अवयव द्वयमें वर्तमान विभाग कार्य विनाशसहकृत कालकी अथवा स्वतन्त्र अवयवकी अपेक्षा कर क्रियायुक्त अवयवको कार्यसंयुक्त आकाश देशसे विभाग उत्पन्न करता है निष्क्रियका कारणत्व नही है ॥ १६ ॥ द्वितीयस्तु हस्ते कर्मोत्पन्नमवयवान्तराद्विभागं कुर्वत् आका- शादिदेशेभ्यो विभागानारभते । ते कारणाकारणविभागाः कर्म या दिशं प्रति कार्य्यारम्भाभिमुखं तामपेक्ष्य कार्य्याका र्थ्यविभागमारभते यथा हस्ताकाशविभागाच्छरीराकाशवि- भागः । न चासौ शरीरक्रियाकार्य्यस्तदा तस्य निष्क्रियत्वात् नापि हस्तक्रियाकार्य्यं व्यधिकरणस्य कर्मणो विभागकर्तृ- त्वानुपपत्तेः । अत पारिशेष्यात् कारणाकारणविभागस्य कारणत्वमङ्गीकरणीयम् ॥ १७ ॥ कारणाकारणविभाग हस्तमें उत्पन्न कर्म अवयवान्तरसे विभाग करते हुए आकाशदेशसेभी विभाग करता है वे विभाग कारणाकारणविभाग है । जिस देशके प्रति कार्योन्मुख कर्म हो उसी देशकी अपेक्षा कार्याकार्यविभागारम्भ होता है । जैसे हाथ और व आकाशके विभागसे शरीर आकाशका विभाग होता है यह विभाग शरीरक्रियाजन्य नहीं है क्योंकि उस कालमें शरीर निष्क्रिय है न तो हस्तक्रियाजन्य है भिन्न अधिकरणवृत्तिकर्म्म अन्यका विभागजनक नही हो सकता अत परिशेषात् कारणाकारणविभागकोभी अवश्य कारण मानना चाहिये ॥ १७ ॥ यदवादि अन्धकारादौ भावत्वं निविद्यत इति तदसङ्गतं तत्र चतुर्द्धा विवादसम्भवात्। तथाहि द्रव्यं तम इति भट्ठा वेदान्ति- नश्च भणन्ति । आरोपितं नीलरूपमिति श्रीधराचार्या , आलो- कज्ञानाभाव इति प्रभाकरैकदेशिन , आलोकाभाव इति नैया- यिकादय इति चेत्तन्न द्रव्यत्वपक्षो न घटते विकल्पानुपपत्ते । द्रव्यं भवदन्धकारं द्रव्याद्यन्यतममन्यद्वा । नाद्य यत्रान्तर्भागोऽ स्य तस्य यावन्तो गुणास्तानङ्गुणकत्वप्रसङ्गात् । न च तमसो
-दर्शनम्] भाषाटीकासमेतः। ( १९७) द्रव्यबहिर्भाव इति साम्प्रतं निर्गुणस्य तस्य द्रव्यत्वासम्भवेन द्रव्यान्तरत्वस्य सुतरामसम्भवात् ॥ १८ ॥ पहिले जो कहा कि अन्धकारमें भावत्वका निषेध करते हैं सो असङ्गत है क्योंकि उसमें चार प्रकारके विवाद हो सकते हैं ( तथाहि ) मीमांसकमतावलम्बी भट्ट और वेदान्ती लोग तमको द्रव्य कहते हैं । श्रीधराचार्य नीलरूपको आरोपित कहते हैं । आलोकज्ञानाभाव तम है ऐसे प्रभाकरके अनुयायी कहते हैं । नैयायिक लोग आलोकाभावको तम कहते हैं । द्रव्यपक्ष असङ्गत है क्योंकि द्रव्य मानो तो प्रसिद्ध नवद्रव्यके अन्तर्गत मानोगे, किंवा उससे अतिरिक्त मानोगे ? अन्तर्गत मानो तो जिसमें अन्तर्भाव हो उसके सब गुण होने चाहिये परन्तु वे गुण उसमें नहीं हैं । अतिरिक्तभी नहीं मान सकते जब निर्गुण उक्त द्रव्य नहीं तो अतिरिक्तत्व कैसे होगा ॥ १८ ॥ ननु तमालश्यामलत्वेनोपलभ्यमानं तमः कथं निर्गुणं स्यादिति नीलं नभः इतिवत् भ्रान्तिरेवेत्यलं वृद्धवीवधया । अतएव नारोपितरूपं तम अधिष्ठानप्रत्ययमन्तरेणारोपायोगात् बाह्या- लोकसहकारिरहितस्य चक्षुषो रूपारोपे सामर्थ्यानुपलम्भाच्च । न चायमचाक्षुष प्रत्ययः तदनुविधानस्यानन्यथासिद्धत्वात् । न च विधिप्रत्ययवेद्यत्वायो गो भावे इति साम्प्रतं प्रलुम्विना- शावधानादिषु व्यभिचारात् । अतएव नालोकज्ञानाभावः अभावस्य प्रतियोगिग्राहकेन्द्रियग्राह्यतानियमेन मानसत्व- प्रसङ्गात् । तस्मादालोकाभाव एव तम न चाभावे भावधर्मा- ध्यारोपो दुरुपपादः । दुःखाभावे सुखत्वारोपस्य संयोगाभावे विभागत्वाभिमानस्य च दृष्टत्वात् ॥ १९ ॥ यदि कहो तमालके समान श्यामवर्ण उपलब्ध होनेसे निर्गुण कैसे है यहभी नहीं कह सकते अन्धकारमें नीलत्वकी प्रतीति केवल भ्रम है आरोपित नीलरूपभी नहीं कहसकते क्योंकि अधिष्ठानका प्रत्यक्षके बिना आरोप असम्भव है । चाक्षुष प्रत्यक्षके लिये आलोक संयोगकी अपेक्षा रहती है अन्धकार प्रत्यक्ष आलोक शून्य चक्षुसे होता है अत आरोपसहकारी निरपेक्ष चक्षुरूपके आरोपमें असमर्थ है ।
( १९८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ औलूक्य- अन्धकारका प्रत्यक्ष चक्षुरिन्द्रियादिजन्यभी नहीं मान सकता चक्षु संयोगान्तर भावी होनेसे अनन्यथासिद्ध हे । अस्ति इत्यादि विधिसत्ताप्रतीतिके अयोग्य भाव अंधकार है ऐसा कहनाभी असगत है प्रलयविनाशादिमेभी अतिप्रसक्ति हो जायगी आलोक ज्ञानाभावपक्षभी अयुक्त हे जिस इन्द्रियसे जिस वस्तुका ग्रहण होता है उसी इन्द्रियसे उसके अभावकाभी ग्रहण होता है ऐसा नियम है अतः ज्ञानको मानसप्रत्यक्ष होनेसे तद्भावरूप अन्धकारकोभी मानसत्व प्रसङ्ग होगा-अतः तमः आलोकाभावही है। यदि अभावरूप होगा तो अभावमे नीलत्वादि भावधर्मका आरोप असम्भव होगा यहभी नहीं कह सकते जिस प्रकार भारादिके उतार देनेसे दुःखाभावमें मै सुखी हूं इत्यादि सुखत्वका और सयोगके अभावमें विभागका अभि मान होता है उसी प्रकार अभावरूप अन्धकारमेंभी भावधर्मके आरोपमें बाधक नहीं है ॥ १९ ॥ न चालोकाभावस्य घटाद्यभाववद्रूपवद्भावत्वेनालोकसापेक्ष- चक्षुर्जन्यज्ञानविषयत्वं स्यादित्येपितव्यं यद्ग्रहे यदपेक्षं चक्षु- स्तदभावग्रहेऽपि तदपेक्षत इति न्यायेनालोकग्रहे आलोका- पेक्षाया अभावेन तदभावग्रहेऽपि तदपेक्षाया अभावात् । न चाधिकरणग्रहणावश्यम्भावः अभावप्रतीतावधिकरणग्रहणा- वश्यम्भावानङ्गीकारादपरथा निवृत्त कोलाहल इति शब्दप्रध्वं सप्रत्यक्षो न स्यादिति अप्रामाणिकं तव वचनम् । पर तत्सर्वम- भिसन्धाय भगवान् कणाद् प्रणिनाय सूत्रं 'द्रव्यगुणकर्मनिष्प- त्तिवैधर्म्यादभावस्तम' इति प्रत्ययवेद्यत्वेनापि निरूपितम् ॥२०॥ आलोकका अभाव तम है तो जिस प्रकार घटादि रूपवान्के प्रत्यक्षमे आलोककी अपेक्षा है उसी प्रकार आलोकाभावप्रत्यक्षमेंभी आलोककी अपेक्षा होनी चाहिये यहभी नहीं कह सकते क्योंकि जिस वस्तुके ग्रहणमें जो अपेक्षित हो उसके अभावमेंभी उसकी अपेक्षा होती है ऐसा नियम है आलोकके प्रत्यक्षमें आलोकान्तरकी अपेक्षा न होनेसे आलोकाभावके प्रत्यक्षमेंभी आलोककी अपेक्षा नही होगी अभावप्रत्यक्षमें अधिकरणप्रत्यक्षकीभी आवश्यकता नहीं है अतएव कोलाहल नष्ट होगया इत्यादि स्थलमें शब्दध्वसका प्रत्यक्ष होता है अन्यथा यह अप्रामाणिक होजायगा । इसी अभिप्रायसे भगवान् कणादमुनिनेभी द्रव्यादिके धर्मसे विलक्षण होनेके कारण तमको अभाव माना है ॥ २० ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासंमत' । ( १३९ ) अभावस्तु निषेधमुखप्रमाणगम्यः सप्तमो निरूप्यते । स चास- मवायवत्त्वे सत्यसमवायः संक्षेपतो द्विविधः संसर्गाभावान्योन्या- भावभेदात् । संसर्गाभावोऽपि त्रिविधः प्राक्प्रध्वंसात्यन्ता- भावभेदात् । तत्रानित्यो अनादितमः प्रागभावः उत्पत्तिमान् । अविनाशी प्रध्वंसः प्रतियोग्याश्रयोऽभावोत्यन्ताभावः अत्य- न्ताभावव्यतिरिक्तत्वे सत्यनवधिरभावोऽन्योन्याभाव ॥ २१ ॥ अभाव निषेध प्रमाण वोध्य है समवाय और समवायवान् दोनामे भिन्न अभाव है वह संक्षेपत संसर्गाभाव अन्योन्याभाव भेदमे दो प्रकार है । प्रागभाव प्रध्वंसाभाव अत्यन्ताभाव भेदसे प्रथम तीन प्रकार है अनित्य तथा विनाशी प्रागभाव, उत्पत्ति- मान्, अविनाशी प्रध्वंसाभाव प्रतियोगीकी अपेक्षासङ्कृत अभाव अत्यन्ताभाव है अत्यन्ताभावसे भिन्न अनवधि अभाव अन्योन्याभाव है ॥ २१ ॥ नन्वन्योन्याभाव एवात्यंताभाव इति चेत् अहो राजमार्ग एव भ्रमः । अन्योन्याभावो हि तादात्म्यप्रतियोगिकः प्रतिषेधः यथा घटः पटात्मा न भवतीति संसर्गप्रतियोगिक प्रतिषेधोऽ- त्यन्ताभावः यथा वायौ रूपसम्बन्धो नास्तीति । न चास्य पुरुषार्थोपयिकत्व नास्तीत्याशङ्कनीयं दुःखायन्तोच्छेदापरप- र्यायनि श्रेयसरूपत्वेन परमपुरुषार्थत्वात् ॥ २२ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे औलूक्यदर्शनं समाप्तम् ॥ १० ॥ शंका—अन्योन्याभावहीको अत्यन्ताभाव क्यो नही माना जाय ? उत्तर—यह स्फुटत् प्रकाश विस्तृत राजमार्गमेंभी भ्रमके समान है ? अन्योन्याभाव तादात्म्यसम्बन्ध प्रतियोगिक अभाव है यथा घट पट नहीं यहा पर तादात्म्यसे पटमें घट नहीं अर्थात् पटत्वरूपसे पटम घट नही ससर्ग ( सम्बन्ध ) प्रतियोगिक निषेध अत्यन्ताभाव है यथा वायुमें रूप नहीं अर्थात् वायु रूपसम्बन्धी नहीं है वैशेषिकशास्त्रको मांक्षानुप- योगीमी नहीं कह सकते दु खके अत्यन्तनिवृत्तिरूप मोक्षका प्रयोजक है यह शास्त्र है ॥ २२ ॥ इति सर्वदर्शनसग्रहमे वैशेषिकदर्शन समाप्त ।
( २०० ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ अक्षपाद- अथाक्षपाददर्शनम् ॥ ११ ॥ तत्त्वज्ञानाहु खात्यन्तोच्छेदलक्षणं निःश्रेयसं भवतीति समान- तन्त्रेऽपि प्रतिपादितम् तदाह सूत्रकारः 'प्रमाणप्रमेयेत्यादितत्त्व- ज्ञानान्निःश्रेयसाधिगम' इति। इदं न्यायशास्त्रस्यादिमं सूत्रं न्या- यशास्त्रञ्च पञ्चाध्यायात्मकम्, तत्र प्रत्यध्यायस्याह्निकद्वयम् । तत्र प्रथमाध्यायस्य प्रथमाह्निके भगवता गौतमेन प्रमाणादि- पदार्थनवकलक्षणनिरूपणं विधाय द्वितीये वादादिसप्तपदार्थ- लक्षणनिरूपणं कृतम् । द्वितीयस्य प्रथमे संशयपरीक्षणं प्रमाण- चतुष्टयाप्रामाण्यशङ्कानिराकरणञ्च, द्वितीये अर्थापत्त्यादेरन्त- र्भावनिरूपणम् । तृतीयस्य प्रथमे आत्मशरीरेन्द्रियार्थपरीक्षणं द्वितीये बुद्धिमनःपरीक्षणम् । चतुर्थस्य प्रथमे प्रवृत्तिदोषप्रेत्य- भावफलदुःखापवर्गपरीक्षणम्, द्वितीये दोषनिमित्तत्वानि- रूपणम् अवयव्यादिनिरूपणञ्च । पञ्चमस्य प्रथमे जातिभेदं- निरूपणम् द्वितीये निग्रहस्थानभेदनिरूपणम् ॥ १ ॥ तत्त्वज्ञानसे दुःखकी अत्यन्तनिवृत्तिरूप निःश्रेयस होता है यह समानतन्त्र ( नै यायिकसिद्धान्तमें ) भी प्रतिपादित है। सूत्रकारनेभी प्रमाणादि तत्त्वज्ञानसे निःश्रेयस- की प्राप्ति कही है यह न्यायशास्त्रका प्रथम सूत्र है । न्यायशास्त्र पञ्च अध्यायात्मक है प्रत्येकाध्यायोंमें दो दो आह्निक हैं । प्रथमाध्यायके प्रथमाह्निकमें प्रमाणादि नौ पदार्थोंका लक्षण निरूपण करके द्वितीयाह्निकमें वादादि सात पदार्थोंका लक्षणका निरूपण किया द्वितीयाध्यायका प्रथमाह्निकमें संशयपरीक्षा और प्रमाणचतुष्टयका अप्रामाण्यकी शंकाका निराकरण है । द्वितीयमें अर्थापत्त्यादिप्रमाणान्तरका उक्त प्रमाणमें अन्तर्भाव वर्णन है । तृतीध्यायके प्रथमाह्निकमें आत्मा इन्द्रिय और शरीरका विचार है द्वितीय आह्निकमें बुद्धि और मनका विचार चतुर्थके प्रथमाह्निकमें प्रवृत्तिदोष पुनर्जन्म फल, दुःख और अपवर्गका परीक्षण है । च०द्वि० दोषके निमित्त निरूपण और अवयवीकी निरूपण है । पञ्चमके प्र० जातिभेदनिरूपण है । प०द्वि० आ० निग्रहस्थानका निरूपण है ॥ १ ॥