भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 193

( १८६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ औलूक्य- प्रचण्ड वैश्वानरके सामने अन्यवस्तुका प्रकाश नहीं होता है उसी प्रकार सिद्ध ( शोधित ) पारदके सन्मुख अन्य सब रसायन निस्तेज हो जाती हैं। जिस पारदसे अभिनव शरीर प्राप्त पुरुष दूसरेको नहीं जानता है और स्वयं प्रकाशमान रहता है ओर जो पारद साक्षात् ब्रह्म है वह पारद संसार भयसे रक्षा करे ॥ १७ ॥ सर्वदर्शनसंग्रहान्तर्गत रसेश्वरदर्शन समाप्त ॥ अथौलूक्यदर्शनम् ॥ १० ॥ इह खलु निखिलप्रज्ञावन्निसर्गप्रतिकूलवेदनीयतया निखिला- त्मसंवेदनसिद्धं दुःखं जिहासुस्तद्धानोपायं जिज्ञासुः परमेश्वर- साक्षात्कारमुपायमाकलयति । “ यदा चर्मवदाकाशं वेष्टय- न्तीह मानवाः । तदा शिवमविज्ञाय दुःखान्तो न भविष्यति ॥” इत्यादिवचननिचयप्रामाण्यात् ॥ १ ॥ संसारमें समस्त विवेकियोँको प्रतिकुलरूपसे प्रसिद्ध दुःखको त्यागनेकी इच्छासे दुःखनाशका उपाय ईश्वर साक्षात्कार कहते हैं । जिस प्रकार चर्मवत् आकाशका वेष्टन असम्भव है उसी प्रकार ईश्वरज्ञानके बिना दुःखनिवृत्ति असम्भव है इत्यादि वचन उसमें प्रमाण है ॥ १ ॥ परमेश्वरसाक्षात्कारश्च श्रवणमननभावनाभिर्भावनीयः । यदा- ह-“ आगमेनानुमानेन ध्यानाभ्यासबलेन च । त्रिधा प्रकल्प- यन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् ॥ ” इति ॥ २ ॥ ईश्वरसाक्षात्कार श्रवण मनन निदिध्यासनसे होता है । कहा है आगम, अनुमान और ध्यानाभ्यास इन तीनो प्रकारोंसे प्रज्ञाको स्थिर करनेपर उत्तम योग प्राप्त होता है ॥ २ ॥ तत्र मननमनुमानाधीनम्, अनुमानञ्च व्याप्तिज्ञानाधीनम्,व्याप्ति- ज्ञानञ्च पदार्थविवेकसापेक्षम्-अतः पदार्थषट्कम् । ‘अथातो धर्मं व्याख्यास्याम’ इत्यादिकायां दशलक्षण्यां कणभक्षेण भगवता व्यवस्थापि । तत्राह्निकद्वयात्मके प्रथमेऽध्याये समवे- ताशेषपदार्थकथनमकारि । तत्रापि प्रथमाह्निके जातिमन्निरूप-