सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 192, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत.। ( १८५) पूरितोशुभम् ॥" इति । तस्मादस्मदुक्तया रीत्या दिव्यं देहं सम्पाद्य योगाभ्यासवशात् परतत्त्वे दृष्टे पुरुषार्थप्राप्तिर्भा- वति । तदा- "भ्रुयुगमध्यगतं यत् शिखिविद्युत्सूर्य्यवज्जग- द्भासि । केषाञ्चित् पुण्यदृशामुन्मीलति चिन्मयं ज्योति. ॥ १५॥ रसकी निन्दा करनेका प्रायश्चित्त कहते हैं प्रमादवश रसकी निन्दा सुने तो रसका सम्यक् प्रकार ध्यान करे और निन्दकको त्याग दे क्योंकि निन्दायुक्त अशुभ होता है । अतः हमारे कथनानुसार दिव्य शरीर प्राप्त कर योगाभ्यासद्वारा साक्षात्कार करनेसे मुक्त होते हैं पुण्यशालियोंको पुण्यवश भृकुटीके मध्यमें प्राप्त अग्नि बिजली और सूर्यके समान जगत्को प्रकाश करनेवाली चिन्मयज्योति विकसित होती है ॥ १५ ॥ परमानन्दैकरसं परं ज्योतिः स्वभावमविकल्पम् । विगलित- सकलक्लेशज्ञेयं शान्तं स्वसंवेद्यम् ॥ तस्मिन्नाधाय मन स्फुर- दसिलं चिन्मयं जगत् पश्यन् । उत्सन्नकर्मबन्धो ब्रह्मत्वमि- हैव चाप्नोति ॥" इति । श्रुतिश्च- 'रसो वै स रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' ॥ इति ॥ १६ ॥ परमानन्दैकरस परमज्योति समस्त विकल्प और समस्त क्लेशोंसे रहित स्वसंवेद्य रसतत्त्वमें ध्यानादि द्वारा चित्त लगाकर जगत्को प्रकाशमान चिन्मय देखनेवाले कर्म्मबन्धनसे रहित होकर इस संसारमेंही ब्रह्मरूप होते हैं । रस ( आस्वादन करने योग्य ) ईश्वर है रस प्राप्तिसे पुरुष आनन्दवान् होता है ॥ १६ ॥ तदित्थं भवेदन्दुःखभरतरणोपायो रस एवेति सिद्धम् । तथा च रसस्य परब्रह्मणा साम्यमिति प्रतिपादकः श्लोक । "यः स्यात् प्रावरणाविमोचनधियां साध्य प्रकृत्या पुन सम्पन्नो सहते न दीव्यति परं वैश्वानरे जाग्रति । जातो यद्यपरं न वेद- यति च स्वस्मात् स्वयं द्योतते यो ब्रह्मैव स दैन्यसंसृतिभयात् पायादसौ पारद ॥" इति ॥ १७ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे रसेश्वरदर्शनं समाप्तम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार अन्यके दुःखभारके नाश करनेम समर्थ रसही है यह सिद्ध हुआ । यह पारद संसारबन्धनसे मुक्ति चाहनेवालोंको स्वभावसे साधनीय है जिस प्रकार